मेरी प्रकाशित पुस्तकें :-


(1) एक लपाग ( गढ़वाली कविता-गीत संग्रह)- समय साक्ष्य, (2) गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा (गढ़वाली भाषा साहित्य का ऐतिहासिक क्रम )-संदर्भ एवं शोधपरक पुस्तक - विन्सर प्रकाशन, (3) लोक का बाना (गढ़वाली आलेख संग्रह )- समय साक्ष्य, (4) उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह )- उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ


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Monday, February 21, 2022

'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट ने मनाया अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस ' ©संदीप रावत, न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल।

'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट ने मनाया अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस '
              
श्रीनगर गढ़वाल (21 फरवरी 2022)- गढ़वाली भाषा -साहित्य के संरक्षण एवं सम्बर्धन हेतु प्रयासरत 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट' ने 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर ट्रस्ट के कार्यालय रावत, न्यू  डांग में कार्यक्रम आयोजित किया । इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि -हमारी मातृभाषा ही हमारी पहचान है । मातृभाषा के पक्ष में विचार रखते हुए रचनाकारों /वक़्ताओं ने गढ़वाली भाषा को बढ़ावा देने, नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोड़ने एवं इस भाषा के संरक्षण पर जोर दिया।
      आखर ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन एवं कवयित्री अंशी कमल द्वारा गढ़वाली सरस्वती वंदना से हुई। कार्यक्रम में साहित्यकार एवं शिक्षाविद डॉ.अशोक बडोनी कहा कि - गढ़वाली भाषा के जो शब्द प्रचलन से बाहर हो रहे हैं उनको संरक्षित करने की आवश्यकता है।प्रत्येक को अपनी मातृभाषा के विकास व संरक्षण हेतु आगे आना ही होगा।'
      ट्रस्ट के उपाध्यक्ष एवं हे. न. ब. ग. विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रो. नागेंद्र रावत ने कहा कि -'अपनी मातृभाषा के प्रति हमें अपने दायित्वों को समझना होगा।एकल परिवार होने के कारण, दादा -दादी, नाना -नानी आदि के साथ नई पीढ़ी के न रह पाने के कारण भी आज अपनी मातृभाषा के प्रति हम सभी के दायित्व और भी बढ़ गए हैं । इस दिवस को मनाने का कारण यह है कि -कहीं ना कहीं आमजन अपनी दुधबोली से दूर हो रहा है।
       ट्रस्ट की कोषाध्यक्ष एवं कवयित्री रेखा चमोली ने कहा कि - " हमें मातृभाषा बचाने की पहल अपने घर से करनी होगी।हमारी मातृभाषा ही हमारी असली पहचान है । " योगा तृतीय सेमिस्टर की छात्रा श्वेता पंवार ने कहा कि - " हमें अपनी मातृभाषा में बात करते हुए शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए एवं स्वयं ही बेझिझक होकर अपने से इसकी शुरुआत करनी चाहिए।अपनी मातृभाषा के संरक्षण एवं सम्बर्धन हेतु । "
      कार्यक्रम का संचालन करते हुए ट्रस्ट के अध्यक्ष संदीप रावत ने गढ़वाली भाषा की शब्द सामर्थ्य पर विचार रखे एवं कहा कि - अभिव्यक्ति की एक सशक्त माध्यम गढ़वाली भाषा के संरक्षण एवं सम्बर्धन की जिम्मेदारी हम सभी की बनती है। साथ ही संदीप रावत ने कहा कि - भाषाओं एवं बोलियों पर वैश्विक संकट को देखते हुए यूनेस्को ने वर्ष 2000 से प्रत्येक वर्ष 21फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का निर्णय लिया था। मूल रूप में यह दिवस सारे विश्व में भाषा के पहले आंदोलन जो कि ढाका में बांग्ला भाषा के लिए हुआ था उसमें कई लोग शहीद हुए थे, तो उनकी याद में भी तब से यह दिवस मनाया जा रहा है। हम सभी को अपने दैनिक जीवन में इसे व्यवहार में लाना होगा।'
      इस अवसर पर कु.कंचन पंवार,अंशी कमल, रेखा चमोली आदि ने अपनी गढ़वाली रचनाएं प्रस्तुत की। कार्यक्रम में संजय रावत,मयंक पंवार, संगीता पंवार आदि भी उपस्थित थे। अंत में ट्रस्ट की मुख्य ट्रस्टी श्रीमती लक्ष्मी रावत ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।



Saturday, May 8, 2021

"शिक्षक, शोधार्थी, शिक्षा का क्षेत्र मा नया -नया प्रयोग कन्न वळा, लेखक अर " हारा हुआ राम " पुस्तक का रचयिता श्री विश्वबंधु चंदाेला जी अब नि रैनि।"

 "शिक्षक, शोधार्थी, शिक्षा का क्षेत्र मा नया -नया प्रयोग कन्न वळा, लेखक अर " हारा हुआ राम " पुस्तक का रचयिता श्री विश्वबंधु चंदाेला जी अब नि रैनि।"

09 मई 2021(श्रीनगर गढ़वाल )-
       दगड्यो प्रणाम 🙏अब त बिल्कुल कखि बि मन नि लगणु कखि बि। दुःख भरी खबर ही सुणणाै मिलणी छन ।माफि चांदु 😭😭🙏🙏एक दुखद खबर छ कि - डॉ0 विश्वबंधु चंदोला जी जो कि 'आखर ' कि सदस्य, शिक्षिका अर कवयित्री श्रीमती सरिता चंदोला जी का हसबैंड अर कवयित्री श्रीमती उमा घिल्डियाल जी का भुला छायि,भग्यान ह्वे ग्येनि । मि तैं ब्याळी 
ब्याखुणी कै वाट्सप्प ग्रुप से पता चली कि वूं को परसि 07मई 2021 खुणी स्वर्गवास ह्वे गे अर अबारी हरिद्वार मा पोस्टेड छा अर अपणा बच्चों दगड़ा रौंदा छा। वो डिस्ट्रिक्ट कॉर्डिनेटर SSA पौड़ीअर डायट चड़ीगांव मा प्रवक्ता पद परैं बि रैनि अर वां से पैलि विकासखंड कीर्तनगर का रा0 इ0 का0 न्यूली मा सहायक अध्यापक गणित का पद पर कार्यरत छा। 
     श्री चंदोला जी पुस्तकाें अर साहित्याै गहन अध्ययन कन्न वळा, एक शोधार्थी, शिक्षा का क्षेत्र मा नै - नै प्रयोग कन्न वळा, शिक्षक होणा दगड़ा एक बढ़िया 'लेखक ' अर एक उम्मदा कलाकार(पेंटिंग /स्कैच ) बि छायि। सन 2003 मा वूं कि " हारा हुआ राम " पुस्तक रूप मा प्रकाशित एक रोचक वैचारिक कथा अभिव्यक्ति छ, जै मा वूंन भगवान श्री राम का मिथक तैं एक नयो अर्थ देणै कोशिश करी।
      मि जब जूनियर हाईस्कूल मा शिक्षक छौ अर त वूं दगड़ा  भेंट पैलि बार 
ह्वे छै अर वूंन मि तैं प्रेरित करी छौ कि - "आप कुछ नया कीजिए और यदि कुछ लिखते हैं या कुछ नया करते हैं तो उसका प्रकाशन भी जरूरी है ।" श्री चंदोला जी कि बोलीं य बात मेरा दिमाग मा बैठी गे छै। मि तैं य बात बार -बार याद आंद ।
    
    श्री चंदोला जी कु निवास न्यू डांग मा छ। वू भौत ही कर्मठ, ईमानदार अर एक प्रखर वक्ता छा। सैद भगवानै यी इच्छा छै कि -एक विद्वान,क्रिएटिव, मिलनसार, सामाजिक,मजाकिया अर खुश मिजाज मनखी इथगा जल्दी हमारा बीच बटि चली जाला 🙏। काल का अगनै क्वी बि जीति नि सकदु यीं बात तैं अपणि पुस्तक "हारा हुआ राम " का माध्यम से समाज तैं सजग कन्न वळा श्री विश्वबंधु चंदोला जी  ये नश्वर संसार मा भौतिक रूप से हारि गैनि पर वू अपणि ईं कृति रचना का माध्यम से कालजयी बण्या राला। 
    भगवान वूं कि आत्मा तैं शान्ति दियां, अपणा ठाै मा जगा दियां अर वूं का परिवार तैं ये दुःख तैं सहन कन्नै सक्या दियां ।🙏🙏🙏 विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🙏🙏
ॐ शांति.. शांति 🙏🙏🙏
                                       संदीप रावत
                             न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल।

Sunday, January 3, 2021

मनखि अर प्रकृति कि रुमैलि दुन्या का उमैला सम्बन्धों कि कथा च "औगार "(कथाकार -महेशानन्द ) -----समीक्षक ©गीतेश सिंह नेगी, सूरत, गुजरात।

मनखि अर प्रकृति कि रुमैलि दुन्या का उमैला सम्बन्धों  कि कथा च "औगार "

                          --गीतेश सिंह नेगी

पहाडै लोकजीवन मा फ्योंली भौत खास च । अजर अमर रिस्ता च फ्योंली अर पहाड़ौ । बिगैर पाड़ै फ्योंली अर बिगैर फ्योंली पाड़ै गाणि अर खूबसूरती द्वी अद्धा अधूरी सी लग्दिन । फ्योंली सिरप एक फूल नि, हमर लोकै एक भौत ही लोकप्रिय कथै एक चिंंतौलि नायिका बि च फ्योंली जैंतैं केंद्र मा रखी तैं 'औगार' जन्न बेजोड़ कथा रची फ्योंली जन्न कुंगला अर उमैला मनै चिंतौंला लिख्वार, गढ़वाळि का जण्या मण्या कथाकार महेशानंद जीन ।

'औगार ' कथा का खास चरित्र गोबिन्दु अर फ्योंली छन। कथा मा कल्पनाशीलता देखण लेक च अर या कथा, कथाकारै बेजोड़ कल्पना शक्ति को परचौ बि दिन्द अर आखिर मा या कथा यथार्थ का धरातल परै बि अपड़ि पूरी सक्या दगड़ि खड़ी दिखेन्द।

' औगार ' कथा एक आम प्रवासी जीवनै यथार्थै धरातल परै पूरी संवेदना अर प्रेम दगडी अंग्वाल बोटि हिटणी छ जैमा कथै नायिका फ्योंली , नायक गोबिन्दु मा अपड़ि 'औगार' कन्नी च। असल मा या सिरप फ्योंली 'औगार' नि या फ्योंली नौ से सर्या पाड़ै 'औगार' च अर या औगार पहाड़ै हर वे हम जन्न ग़ोबिन्दु से च जु बालापन्न मा ही अपडा प्रेम ईं फ्योंली अर ये पाड़ बटि उन्दू जैकि दूर चली ग्ये। कथा मा ग़ोबिन्दु फ्योंली तैं खोजणु पर वा वे तैं कखि दिखेणी नि । वू फ्योंली तैं धै लगौन्द पर फ्योंली वे तैं नि दिखेन्दी किलैकि फ्योंली अपड़ि बरसों बटि हुँदा जाणी उपेक्षा से खींन्न च त वा ग़ोबिन्दु समणि नि औंदी वा वे तैं या बात बिंगौंण अर जिन्दगी कु एक खास सबक सिकौण चांदी । वा वे तैं इन्ना वुना धै मारिक अटगौंणी रैन्दी पर वेका कखि हत्थ नि औंदी । आखिर मा वा अपडा मनै 'औगार' ग़ोबिन्दु मा लगै दिन्द कि वा वे से दूर क्यो छ ? वू किलै नि भेंटे सकणा छन ? वा गोबिन्दु तैं सचै दगड़ि परचौ करान्द अर वे तैं अपड़ असल उमैला मुल्क , अपड़ि रुमैलि दुन्यम लेकि जांद। यखम कथाकारन प्रकृति कु जन्न सैंदिष्ट अर सुन्दर चित्रण करयूं छ वू अफ्फम बेजोड़ छ अर कथाकारै कलमैं सक्या अर शब्द रचणै कला को भल्ली कै परचौ दियूँ च ।

फ्योंली अर ईं रौंतेली रुमैलि धर्ती तैं भेंटेंकि ग़ोबिन्दु तैं वीन्का असीम सौन्दर्य का दर्शन हूंदीन वे तैं भारी रौंस लगदी। अब फ्योंली वेतैं अपडा सबन्धों की सम्लौंण दिलोंद की या ही वा जग्गा छ जख हमरि पैली भेंट ह्वे छाई या ही च तेरि असल धर्ती अगर ज्यू तू वीं स्वार्थ अर काजोल पाणि सी धर्ती तैं छोड़िक यख सदानि कु आ सकदी त मैं प्रेम मा त्वे खुणी त्यार आण परै बाटों पर मंदरी सी पसर्ये जौलू।

' ले ईं दा बि मिन दौ त्वे फर छोड़ी यालि। धाकनाधारि आंदी छै इख बौड़ी कि ना '

वेक बाद वा ग़ोबिन्दु हत्थ छोड़ि दिन्द। ग़ोबिन्दु तैं लग्गी जन्न वू गगराट कै उंद लमडुंणु हो ।

महेशानन्द जीक औगार कथा शुरवात मा एक प्रेम कथा की सी बाण दिखेन्द, फिर या एक खुदेड कथा जन्न ऐथिर बढ़द अर आखिर मा या पलायन पीड़ा से उपजीं कथा सी महसूस ह्वे सकद पर अगर कथा तैं पूरी तरां पढ़णा बाद अगर हम अफ्फु तैं पुछला कि ग़ोबिन्दु को छ ? फ्योंली को छ ? अर आखिर ग़ोबिन्दु अर फ्योंली कु आपस मा रिश्ता नाता सम्बन्ध क्या च ? त हम सै तरां से कथा तैं समझी सक्दो कथा का मनोविज्ञान तैं समझी सक्दोंं ।

कथा कु मनोविज्ञान बतोन्द कि औगार प्रकृति अर मनखि का प्रेम सम्बन्धों अर जन्म जन्म को दगडै अंग्वाल बोटदि,धै लगौंन्दी कथा च ज्वा मनखि अर प्रकृति का बीच बढ़दि दूरी फर वेका असल कारण पर मुख्य चरित्र फ्योंली मार्फत अपणी बात मुखर ह्वेकी रखद।

कथा मनखि तैं केवल समस्या नि बतोन्दी वे तैं अद्धबाटा मा नि छोड़दि बल्कि अपड़ि ईं उमैंली अर रुमैलि धर्ती दगड़ि अपडा जलड़ों दगड़ि जुड़णौ,जीवन मा अग्वाडी बढणौ बाटु बि बतोन्द। कुल मिलैकि मनखि अर प्रकृति का रुमैलि दुन्या का उमैला सम्बन्धो की कथा च औगार। पहाड़ से अपडा जलड़ों बटि कट्याँ- छिटग्याँ मनखि तैं अपडा जलड़ों परैंं बौड़िक आणा वास्ता फ्योंलीक धै लगौन्द कथा छ औगार ।

सवाल यो च कथा कु मुख्य पात्र ग़ोबिन्दु को च अर या फ्योंली को च ? म्यार देखणन हर वू मनखि जु अपडा जलडौं बटि कटे ग्याई वू ग़ोबिन्दु छ । मि तै लगद मि ग़ोबिन्दु छौ मि ही छौ ग़ोबिन्दु जैका सुपिन्यो मा रोज आन्द या निर्दयी फ्योंली । अर फ्योंली बणिक अपड़ि औगार मैमा लगान्द यू पाड। अगर मनै बात लिखूं त औगार ग़ोबिन्दु अर फ्योंली कथा नि या म्यारा,आपका अर पाड का अजर अमर सम्बन्धो की एक भौत ही भावुक अर कलकली कथा च । कथा का बीच मा जब ग़ोबिन्दु फ्योंली का हत्थ छोड़ी आसमान बटि लमडद अर हर्बी हर्बी वींतैं धै लगान्द ...

फ्योंली ! फ्योंली !! फ्योंली !!!
मि आणू छौं मे थै जग्वाळ ।

त इन्न सी लगद कि एक सुन्दर कथा कु कतगा मार्मिक अन्त हुण वलु च सैद,एक घड़ी आँखियूँ मा असधरि सी आ जांदीन पर ऐथिर पैढिक कथाकारै बेजोड़ कल्पनाशीलता अर असल सल्लीपन्नो परचौ मिलद जब दस वर्षों एक प्रवासी नौनु विक्की जैन गढ़वाळि कब्बी नि बोली वू। स्वीणा मा खुट्टा छिबणाणु,मुम्यांणु अर छुड़ी गढ़वाळि मा बुल्द -

'फ्योंली ! फ्योंली मि आणु छौं । मैं थैं जग्वाळ'

वेका नींद बिचलणा कुछ देर बात कथा कु अन्त मा जब विक्की अर वेका परिजन गौं जाणै बात फाइनल करदीं त ईं सब्बि बात बि अफ्फु साफ ह्वे जांद कि ग़ोबिन्दु को छाई अर फ्योंली को छाई ? ग़ोबिन्दु फ्योंली तैं क्यो धै लगाणु छाई अर फ्योंलीन वेकु हत्थ अपड़ि रुमैलि उमैली धर्ती मा लिजैकि छट्ट क्यो छोड़ि अर क्या शर्त रखी ? आखिर फ्योंली चाणी क्या छाई?

कथा का आखिर मा "माजी ! येल सच्ची गढ़वाळि बोली क्या?" जन्न लैन लिखींक कथाकारन एक जोरदार अर झन्नाटेदार सवाल वू सब्यूँक् वास्ता छोड़ि जु अपडा जलडौं बटि छटगेकि अपड़ि भाषा संस्कृति से बि छटग्ये, बिंगलै ग्यीं ।

'दूर बटि टिरेने किलक्वार अर धधडाटल सब्यूक् कंदुड फोड़ी देनी '

यू अंतिम पंक्तियों का दगड़ि कथाकारन अपड़ि लेखन क्षमता अर गढ़वाळि भाषा की शब्द सम्पदा द्वी को एक दा हौरि दमदार परचौ देकि ईं सुन्दर गढ़वाळि कथा को समापन कैरिक औगार कथा संग्रै की हौरि कथाओं तैं पढ़णै सप्रेम साधिकार न्यूतों दे ।

औगार अर फ्योंली लोककथौ कथानक भले एकसार ही छन , द्वी कथाओं मा भले ही वी अनुभव वी परिस्थिति अर वी शिक्षा छन पर फिर्बी औगार कथा मा कथाकारै बेजोड़ लेखन कला अर शब्द चित्रण शैली देखणौ मिलद दगड़ा दगड़ि गढ़वाळि भाषै हर्चदि शब्द सम्पदा अर सक्या द्वी सैंदिष्ट देखणो मिल्दीन।

लोककथा फ्योंली का अपडा जलड़ों बटि कटेकि सुख सुविधाओं वळा राजसी भोग विलास अर दिखलौटी दुन्या मा जाणै अर फिर खुदे खुदेकि घुटे घुटेकि अन्तै एक मार्मिक कथा च जैमा फ्योंली मोरणा बाद अपड़ि आखिरी इच्छा से धार मा समाधि दिए जांद अर फिर सर्या घाटी मा वा पिंगला फूल बणिक फैली जांद जबकि श्री महेशानन्द जीक औगार कथा फ्योंली का प्रेम का कारण अपडा जलडौं बटि छटग्याँँ एक प्रवासी परिवारे घर बौड़णै सुखद कथा छ। एक सुखांत कथा छ त एक मार्मिक अर दुखान्त कथा छ।

लोककथा की फ्योंली का अनुभव अर सीख औगार कथै फ्योंली अनुभव प्रेम रूप मा ग़ोबिन्दु तैं (हमतैं ) दिंद साफ साफ दिखेन्द। बोले जा सकद कि लोककथै फ्योंली चरित्रे तुलना मा औगार कथै फ्योंली जादा सशक्त ,प्रखर अर अनुभवी च वा लोककथै फ्योंली सी मासूम नि लगदि।

कथाकर गढ़वाळि भाषा शब्द सम्पदा का जणगुरु छन्न ,कलमैं बेजोड़ सल्लि छन्न । युंन अपडा शब्द शिल्पन औगार कथौ द्वी मुख्य चरित्र फ्योंली अर ग़ोबिन्दु तैं दमदार ढंग से उकर्युंं च ,संवाद असरदार छन अर कम शब्दों मा गैरि चोट करण वळा छन्न ,दुर्लभ शब्दों आणा पखाणो को भौत सुन्दर इस्तमाल हुयूँ छ। औगार कथा मा ग़ोबिन्दु अर फ्योंली की धधम धै का बीच ,लुकाच्वारी का बीच प्रकृति को जन्न सैंदिष्ट चित्र महेशानन्द जिकु खैंचियूँ छ वो दुर्लभ छ।
पौड़ी का वरिष्ठ गढ़वाळि साहित्यकार अर उत्तराखण्ड ख़बरसार का संपादक , श्री विमल नेगी जीक उक्ति कि 'वो अबि रतब्योणी कु सी गैणु छ जु औंण वळा समैमा हमतैं दिना सूरजा दरसन जरूर करालो' महेशानन्द जीक पैलो कथा संग्रै कि पैली कथा 'औगार' पैढिक एकदम सै लगद अर या कथा वूंंकी कलमे सक्या को शंखनाद करद साफ देखे सुणै बि जा सकद।

   गढ़वाळि कथा साहित्य प्रेमियूं वास्ता औगार कथा अर ये कथा संग्रै कि हौरि कथा बि पढ़ण अर ससम्मान संग्रै कैरिक धरण लैक छन।

     एक भाषा साहित्य प्रेमी रूप मा औगार कथा व हौरि कथाओं तैं आपै जग्वाळ रैली।

कथा - औगार
कथा संग्रै - औगार
कथाकार - श्री महेशानन्द
प्रकाशक - ख़बरसार प्रकाशन,पौड़ी
प्रकाशन वर्ष - 2013
कथाकार सम्पर्क सूत्र : 99274 03469

  आदरणीय श्री महेशानन्द जी अर सब्बि गढ़भाषा साहित्य प्रेमियूं तैं सादर शुभकामना दगड़ि।

©गीतेश सिंह नेगी, सूरत (गुजरात )

Tuesday, December 22, 2020

"मूर्धन्य लोक साहित्यकार डॉ. गोविन्द चातक जी कि जयन्ती(19 दिसंबर 2020) परैं वूं तै आखर समिति द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित " ------ संदीप रावत, न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल

श्रीनगर गढ़वाल : 
 "मूर्धन्य  लोक साहित्यकार डॉ. गोविन्द चातक जी कि जयन्ती परैं वूं तै " आखर " समिति द्वारा  श्रद्धांजलि अर्पित "
      मूर्धन्य लोक साहित्यकार डॉ. गोविन्द चातक जी कि जयन्ती परैं  19 दिसम्बर 2020 खुणी    " आखर " समिति का सदस्यों द्वारा स्थानीय  डालमिया धर्मशाला (बद्री -केदार धर्मशाला ), श्रीनगर गढ़वाल मा सूक्ष्म कार्यक्रम आयोजित कैरिक   वूं तै श्रद्धांजलि दिये गे । 
      ये सूक्ष्म कार्यक्रमै  सुर्वात डॉ. चातक जी  का चित्र परैं माल्यार्पण अर फूल पाति  चढ़ैकि ह्वे।   बैठक मा वक्ताओंन लोक साहित्य अर  गढ़वाळि साहित्य मा   "डॉ. चातक " जीक महत्वपूर्ण योगदान पर चर्चा करी  । "आखर "समिति का अध्यक्ष   संदीप रावतन  बोलि कि - "कोरोना  (कोविड -19)  वजौ से आज  19 दिसंबर 2020  खुणी   डॉ. गोविन्द चातक जी की जयन्ती परै  "आखर "समिति  द्वारा  श्रद्धांजलि स्वरूप ही यो सूक्ष्म  कार्यक्रम  होणु  छ।  "डॉ. गोविन्द चातक स्मृति  व्याख्यान माला अर सम्मान समारोह "  आयोजित कन्नू  संभव नी ह्वे  सकी ।  डॉ. गोविन्द चातक जी जन  विभूतियों तैं याद कर्ये जाण भौत जरूरी छ ,जौंन लोक साहित्य  अर गढ़वाळि साहित्य मा अपणो अमूल्य योगदान दे । 
      मुकेश काला जीन बोली कि - "  स्थिति सामान्य होंण परै  "आखर" द्वारा आयोजित समारोह /कार्यक्रम मा या जो बि उचित होलु   ये सालौ  आखर सम्मान यानि  "डॉ.गोविन्द चातक स्मृति आखर साहित्य सम्मान- वर्ष, 2020 " श्री ललित केशवान  जी तैं दिये जालु। आखर समिति कि तरफां बटी  सम्मानित होण वळा वरिष्ठ साहित्यकार  श्री ललित केशवान  जी तैं वूंन हार्दिक बधै  दे। मुकेश काला जीन यो बि  बोली कि - आखर समिति अपणा  हिसाबन  नई सोच का दगड़ा काम कन्नी च। वूंन आखर का उपस्थित सदस्यों आभार बि व्यक्त करी। 
     डॉ. गोविन्द चातक जी कि जयन्ती परैं  ये सूक्ष्म समारोह मा वूं तैं फूल पाति अर्पित कन्न वळों मा "आखर " समिति का   श्री मुकेश काला जी,  श्री  सौरभ बिष्ट जी, श्री संदीप रावत, मयंक पंवार जी, श्रीमती अंजना घिल्डीयाल जी,  श्रीमती अनीता काला जी , श्रीमती बविता थपलियाल  मैठाणी जी,. श्रीमती रेखा चमोली जी छा।  श्रीमती बवीता थपलियाल मैठाणी जीन ये अवसर परैं  लोकगीत बि सुणायि।  संचालन संदीप रावतन करी।