मेरी प्रकाशित पुस्तकें :-


(1) एक लपाग ( गढ़वाली कविता-गीत संग्रह)- समय साक्ष्य, (2) गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा (गढ़वाली भाषा साहित्य का ऐतिहासिक क्रम )-संदर्भ एवं शोधपरक पुस्तक - विन्सर प्रकाशन, (3) लोक का बाना (गढ़वाली आलेख संग्रह )- समय साक्ष्य, (4) उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह )- उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ


Wednesday, October 13, 2021

रा.इ.कॉ.धद्दी घण्डियाल बडियारगढ़ (टिहरी गढ़वाल ) में "ATAL TINKERING LAB (ATL) " का शुभारम्भ

13 /10/2021, GIC DHADDI GHANDIYAL, BADIYARGARH (T. G.)

         बड़े हर्ष का विषय है कि आज हमारे विद्यालय रा.इ.कॉ.धद्दी घण्डियाल बडियारगढ़ (टिहरी गढ़वाल ) में  "ATAL TINKERING  LAB (ATL) " का शुभारम्भ मुख्य अतिथि माननीय खंड शिक्षा अधिकारी, कीर्तिनगर डॉ. सुरेन्द्र सिंह नेगी जी के कर - कमलों से हुआ। इस अवसर पर रा.इ.कॉ. गौनीखाल के प्रधानाचार्य श्री अनिल ममगाईं जी, पी. टी.ए. अध्यक्ष श्री रणजीत सिंह नेगी जी, दो प्रशिक्षकों एवं अन्य अथितियों सहित  समस्त विद्यालय परिवार उपस्थित रहा। "ATAL TINKERING  LAB (ATL) "की  processing से लेकर अब तक पूरे दो वर्ष पश्चात आज यह सुअवसर आया।
       विद्यालय में विद्यार्थियों एवं सभी शिक्षिकों में"Atal Tinkering Lab (ATL) "को लेकर बहुत उत्साह बना हुआ है। यह Lab सभी शिक्षकों, Class 6th से 12th तक के सभी विद्यार्थियों के लिए एवं साथ ही आस -पास के उन व्यक्तियों के लिए भी है जिनके पास विज्ञान को लेकर नए ideas हों, और उनको इस lab में मूर्त रूप दिया जा सके। यह प्रयोगशाला निश्चित रूप से आम लोगों एवं छात्र छात्राओं के बीच वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में मददगार साबित होगी।
      कार्यक्रम का संचालन भौतिक प्रवक्ता डॉ. दीपक जोशी जी ने किया। अंत में विद्यालय के प्रधानाचार्य आदरणीय श्री मोहन प्रसाद डिमरी जी ने सभी अतिथियों एवं प्रशिक्षकों का आभार एवं धन्यवाद व्यक्त किया।
Note -
   Waw...3D PRINTER, BASIC ELECTRONIC COMPONENTS, ROBOTICS & IOT,  ALL MECHANICAL DEVICES, LAP TOPS, MINI COMPUTERS, TELESCOPE,  LIGHT SIGNAL PROGRAMMING, DRONE CAMERAS,EXTRA -EXTRA..
"Atal Tinkering Lab (ATL) "is a central government of India initiative to create an environment of scientific temperament, innovation, creativity amongst Indian students. It is a step towards a new India that will embrace and encourage novel and innovative ideas and inventions.
(Photos #श्री दीवान सिंह मेवाड़ जी प्रवक्ता , राजनीति विज्ञान )

Monday, June 14, 2021

गढ़वाली गीत संग्रह "तू हिटदि जा " की समीक्षा समीक्षक - डॉ.चरणसिंह केदारखंडी

गढ़वाली गीत संग्रह "तू हिटदि जा " की समीक्षा
समीक्षक - डॉ.चरणसिंह केदारखंडी

      रसायन विज्ञान के प्रवक्ता ,लोकभाषा और साहित्य को समर्पित संस्था "आखर समिति" (श्रीनगर गढ़वाल)के संचालक/संस्थापक और गढ़वाली कविता और गद्य साहित्य में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने वाले संदीप रावत जी आज किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं...

      अब तक रावत जी गढ़वाली में पाँच क़िताबें लिख चुके हैं जिनमें 'एक लपाग'( कविता-गीत संग्रह), 'गढ़वाली भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा'(शोधपरक गढ़वाली ऐतिहासिक एवं सन्दर्भ पुस्तक ) , 'लोक का बाना'( गढ़वाली लेख संग्रह) , 'उदरोल'(गढ़वाली कथा संग्रह) और 'तू हिटदि जा'( गढ़वाली गीत संग्रह) शामिल हैं।

      'तू हिटदि जा'(तुम चलते रहो !) इस शीर्षक को पढ़ने मात्र से ही इस अँधेरे समय में भीतर एक आशावाद जन्मता है ! असल में, मंज़िल पर पहुँचने से ज़्यादा उसकी ओर 'चलते रहने' में जीवन की गुरुता और सौंदर्य छुपा हुआ है। श्री अरविन्द ने अपनी कालजयी कविता सावित्री में कहा भी है : attempt, not victory, is the charm of life.

रोबर्ट लुइस स्टीवेंसन ने अपने निबंध 'El DORADO' का अंत भी इस तरह किया है :
"...to travel hopefully is better than to arrive at..".



       क़िताब के पृष्ट आवरण पर दी गई शीर्षक कविता "तू हिटदि जा" को पढ़कर अनायास ही 'हरिऔध' जी की मशहूर कविता 'कर्मवीर' याद आती है। आप "हथयूं का रखड़ा कर्मोंन तू बदलदि जा" में "पर्वतों को काटकर सड़कें बना देते हैं वे " की अनुगूँज सुन सकते हैं।

     दुनियां में सभी सफ़ल कहानियां खून, पसीने और जीतोड़ परिश्रम की कहानियां हैं । सोशल मीडिया के इस अलसी समय में हमारी युवा पीढ़ी के लिए कवि की इससे बेहतर क्या ललकार हो सकती है :

"पौड़ बाटि ही निकल्द दगढ़या मिठ्ठू पाणी रे
मीनत करी स्वर्ग भी मिल्द , छोड़ ना गाणि -स्याणी रे !"

    'तू हिटदि जा' गीत संग्रह नहीं, समकालीन पहाड़ी 'तू हिटदि जा'जनमानस के सवालों और सरोकारों का बोलता हुआ आईना है। इसमें ख़्वाब हैं, ख़ौफ़ हैं, कुर्फ़ हैं, कैफियतें हैं, आरजू हैं, आकाश हैं और कांच के महीन टुकड़ों (shards)के मानिंद बिखरे पहाड़ी सपनों के गर्भपात का गुस्सा है। पहाड़ी जीवन के जितने रंग ढंग हो सकते हैं उतने इस कविता संग्रह में मौजूद हैं। इसमें हम सबके शरीर में धड़कन बनकर धड़कती 'ब्वे' (माँ) है( पृष्ट 32, मेरी ब्वे"), इसमें हिमालय की गोद में खिलखिलाते संदीप जी के घर गाँव (गों गोठियार) की महक है( मि वे मुल्क कु छोउँ पृष्ट 37), इसमें रूमानी प्रेम की खुशबू भी सराबोर है ( तेरी माया कि झौल पृष्ट 64 ), इसमें जात पांत में विभाजित समाज के लिए गहरी फटकार है ( गुणि नि जानि पृष्ट 72

"बनि-बन्या धरम दर्शनों को , सार नी बींगी हमुन
मनखी-मनखी मा झणी किलै ,भेद करी द्यायि हमुन ?"

         इसमें बेटी की जीवन, शिक्षा और सम्मान की चिंता है ( बेटी बचावा, बेटी पढ़ावा पृष्ट 51) तो पहाड़ की पीड़ा पढ़ते समय बरबस ही आँखे भर आती हैं । पहाड़ ख़ुद बोलता है :

"अंसधरी म्येरी क्वे नी द्यखणा
खेरी मेरी क्वे नी बिंगणा
कै मा बिंगौवु मि को छ बैरी ?
भितरै -भितर खयेंणु आज "
(इस बीस सालों में जिन लोगों ने पहाड़ को लूट खसोट का अड्डा बनाया है वो बाहरी नहीं, हमारे अपने लोग हैं। पहाड़ कहे भी तो किससे कहे ? पानी के धारे में ही आग लगने जैसे हालात हैं...)

      विकास के नाम पर सुरंगों के भीतर कैद होती गंगा की चिंता भी हमारे कवि के जेहन में है(पृष्ट 47).
गों गुठ्यार और पितरों की कुड़ी नीलाम करके देहरादून और घमतपवे भाबर हल्द्वानी में बैठे लोगों( जो रात दिन पलायन पर विमर्श करते हैं, )के लिए पहाड़ और मैदान के बीच की अस्मिता ,अहंता का जिस प्रकार का सांस्कृतिक संकट खड़ा हो गया है उस पर 'मेरा पाड़ मा'(पृष्ट 50) जैसी कविता लिखी गई है। वैचारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दोगलापन चुपके से हमारे जीवन में घुस गया है, मनखी यहाँ rolling stones यानी बेपेंदे के लोटे हो गए हैं। जिस पत्ते या पौधे में पानी की एक बूंद भी नहीं टिक पाती उसे 'पापड़ पाणी' कहा जाता है। संदीप जी ने क्या ख़ूब उपमा दी है :

"गात मा गुण नि रै ग्ये, जीभ कू स्वाद बि हर्ची ग्ये
मनखी पापड़ पाणी ह्वे ग्ये मेरा पाड़ मा "(50)

          इसके अलावा बरखा, बादल, बसंत,बग्वाल फ़ाग और फाल्गुन की भी पूरी दस्तक है इस काव्य संग्रह में । नेता जिस प्रकार जनता को चराते हैं उस पर आपको हँसाने के लिए एक करारा राजनैतिक व्यंग्य है( पृष्ट 76, मि आणु छों ! )

"आणु छौं रे आणु छौं
मि भाषण देंण आणु छौं
जाँत पाँत का फिंडका फोड़ी
तुमतैं चरौणु आणु छौं ☺️☺️

      उत्तराखंड का ही नहीं, पूरे देश का समाज जिस प्रकार धर्म जाति के व्यामोह में उलझा हुआ है उसे देखकर इस कविता का आकाश व्यापक हो जाता है। इसके अलावा हाथों में वैचारिक तलवारें लेकर समाज सुधार करने निकले इस मनमौजी समय के लिए एक दार्शनिक कविता है पृष्ट 67 पर है :
"मन की आँख्यूंन अफु तैं अफी देख सकदि त देख ले " !

      लेकिन बिडम्बना यह है कि आजकल आलोचक की नज़र से ख़ुद को देखने की फुर्सत किसे है ? फेसबुक पर एक नेगेटिव कमेंट पढ़कर लोग कुल्हाड़े लेकर पीछे दौड़ पड़ते हैं !

       20वीं सदी में अमेरिका के सबसे प्रभावशाली कवियों में एक रोबर्ट फ्रॉस्ट की कविता "ROAD NOT TAKEN" की अनायास याद आती है तू हिटदि जा की कविता "लीक से हटीक" पढ़कर। पायनियर कौन है ? जो रास्ता दिखाये भी और बनाये भी ! घिसे पिटे(charted) रास्तों पर चलने से क्या फ़ायदा ? हम यहाँ भेड़ या भीड़ का हिस्सा बनने नहीं आये हैं।
पढ़िए इस आनंद को :

"सौंगा बाटों मा सदानि मनख्यूँ का लैंजा रौंदन
औखा बाटों बि जरा तू हिटीक दिखौ !"

       सभ्य इंसानों और जंगली जानवरों से बराबर परेशान पहाड़ की पीड़ा और उस पीड़ा का निवारण "कंनक्वे रौंण ये पहाड़ मा" और "इन्क्वे रौंण ये पहाड़ मा" जैसे कविताओं में पेश किया गया है।

       48 की उम्र में(2019) में लिखी गई(प्रकाशित) इन कविताओं की 48 संख्या का यही राज है। नाज़ुक मिज़ाज और कवि से ज़्यादा एक मिलनसार आदमी और बेहद विनम्र इंसान संदीप रावत का संवेदनाओं की गहरी परतों तक जाना कतई भी आश्चर्य का विषय नहीं है। प्रकृति अपनी निर्मल आवाज़ें ख़ुद चुनती है , अपने अलंकरण ख़ुद गढ़ती है।

      मुझे ख़ुशी है कि रावत जी अभी समकालीन साहित्य विरादरी की परंपरा के उलट "साहित्य शिरोमणि" और "भारत भूषण" बनने के लिए बेचैन नहीं दीखते हैं।
आज का समय दूसरे की छाती पर सवार होकर ख़ुद की बुलंदी हासिल करने का समय है : साहित्य, सिनेमा, खेल, राजनीति, समाज सेवा-- इस तरह की होड़ सब जगह दिखती है ।
     अपनी एक बेहद मार्मिक कविता "वु बाटु" (पृष्ट 26) में रावत जी एक साफ़ सुथरे और स्वस्थ समाज की कल्पना इस प्रकार करते हैं :

"ना हो जख स्वारथ कू सांटु
ना हो जख तिकड़म कु जांठु
ना हो जख रींस कु कांडू
ना लुछु क्वी कैकू बांठु...
मी हिटण चांदू सदानी वु बाटू ।"

     चार भागों में विभाजित कुल 80 पृष्ट और 150 रुपये मूल्य की इस क़िताब का प्रकाशन *रावत डिजिटल गाजियाबाद* ने किया है। भास्कर भौर्याल और दीपक नेगी ने आवरण पृष्ट तैयार किया है और संग्रह को अपना आशीर्वाद दिया है हमारी दीदी पूर्व संगीत निदेशिका आकाशवाणी डॉ. माधुरी बड़थ्वाल ने।भूमिका (पवांण ) उत्तराखंड के एक और उदीयमान लोक साहित्य के नक्षत्र भाई गीतेश सिंह नेगी (घुर घुघति घुर क़िताब के चर्चित लेखक)ने लिखी है जिसमे उन्होंने भारतीय सौन्दर्यशास्त्र के आचार्यों से लेकर आचार्य रजनीश( ओशो) के उद्धरण देकर इस बेहद पठनीय और मननीय , महनीय ग्रन्थ का परिचय कराया है।

     इस गीत संग्रह की साहित्यिक गंभीरता, सरसता और इससे बढ़कर इसकी प्रासंगिकता को देखते हुए इसे आंचलिक भाषा के प्रश्रपत्र के अंतर्गत गढ़वाल विश्वविद्यालय सहित अन्य विद्यापीठों में युवा पीढ़ी को पढ़ाया जाना चाहिए। क़िताब को सुबह की हवा की तरह पीने वाले मेरे दोस्तों से आग्रह है कि इस तरह का साहित्य खरीदकर ही पढ़ें अन्यथा सरकारी सचिवालय संपन्न साहित्यकारों को 'विपन्न साहित्यकार' की पेंशन देता रहेगा...

संदीप रावत जी के लिए मै जो सबसे अच्छी बात कहूँगा वह यह है :

बिना आत्म सम्मोहन के मेरा दिदा,
"तू हिटदी जा" !!!

डॉ.चरणसिंह केदारखंडी
श्री अरविन्द ग्राम तुलंगा
केदारनाथ हिमालय।

नोट - यह गढ़वाली गीत संग्रह निम्न स्थानों पर उपलब्ध है --
(1) https://www.paharibazar.com/product/tu-hitdi-ja-garhwali-geet-sangrah-by-sandeep-rawat/
(2)रावत डिजिटल पब्लिकेशन, इंद्रापुरम गाजियाबाद
(3)भट्ट ब्रदर्स, बसंत विहार, देहरादून
(4)स्वयं गीतकार संदीप रावत (9411155059)
(5)ट्रांसमीडिया (रेनबो पब्लिक स्कूल के सामने )श्रीनगर गढ़वाल
 

Wednesday, June 2, 2021

"नहीं रहे उच्च संस्कारों से परिपूर्ण विद्वान लेखक , एक गृहस्थ संत , समाज सेवी एवं अनुकरणीय श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी" : संदीप रावत, श्रीनगर गढ़वाल।

 "नहीं रहे उच्च संस्कारों से परिपूर्ण विद्वान लेखक , एक गृहस्थ संत , समाज सेवी एवं अनुकरणीय  श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी"
🙏🙏अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि 😭🙏🙏

       उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र ने देश को कई यशस्वी सैनिक, साहित्यकार, विद्वान, इतिहासकार, भाषा वैज्ञानिक और चिंतक दिए हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत व प्रतिभा से ख्याति अर्जित की। उनमें एक प्रमुख नाम श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी का है जो कल 02 जून सन् 2021 को सुबह साहित्य सृजन करते हुए 94 वर्ष में अनंत यात्रा पर चले गए हैं। उनका जन्म 15 फरवरी 1928 को अपने ही गाँव देवर -खडोरा(गोपेश्वर )जिला- चमोली में हुआ था। श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत नि :संग जी अभी देवर -खड़ोरा ( गोपेश्वर ) में ही रहते थे।

             उत्तराखंड की यह दिवंगत महान विभूति हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, गढवाली भाषा पर मजबूत एवं समान अधिकार रखती थीं । कहा जा सकता है कि - उनकी हिन्दी, अंग्रेज़ी, संस्कृत एवं गढ़वाली भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ थी। वे उच्च कोटि के लेखक एवं चिंतक ही नहीं बल्कि एक तरह से हिमालय की उच्च कोटि के साधक भी थे। वे एक गृहस्थ संत थे तो साथ ही एक पत्रकार भी थे। वे एक तरह से ऋषि परम्परा एवं सहज-सरल, सौम्य व्यक्ति थे। उनके दिवंगत होने से साहित्य की ऋषि परम्परा क्षेत्र में जो स्थान रिक्त हुआ है उसकी पूर्ति असंभव है। उनके लेखन के प्रमुख विषय आध्यात्म, दर्शन,इतिहास संस्कृति, भाषा आदि थे। विपरीत परिस्थियों में एवं जीवन के अंतिम क्षणों तक भी वे साहित्य सृजन करते रहे।
       श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी पहले भारतीय सेना में सेवारत रहे तथा देश की सेवा की। सैन्य सेवा से अवकाश प्राप्त करने के पश्चात वे उत्तर प्रदेश, स्थानीय निकाय प्रशासनिक सेवा में भी रहे। ।वे ऐसे विरले एवं मूर्धन्य साहित्यकार थे जिन्होंने सैन्य सेवा के पश्चात् साहित्य सृजन किया ।सामाजिक सरोकारों से भी उनका गहरा जुड़ाव था।
       यह एक अद्भुत बात है कि जिस उम्र में व्यक्ति शिथिल हो जाता है, आराम करना चाहता है उस उम्र के पड़ाव में उन्होंने लेखन शुरू किया और समाज को उच्च कोटि का साहित्य दिया।
      यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसे मनीषी का आशीर्वाद मुझे प्राप्त हुआ। उत्तराखंड के विद्वान वरिष्ठ साहित्यकार, भाषाविद श्रद्धेय श्री ' नि:संग ' जी के साथ मेरी कई यादें जुड़ीं हैं । मैंने उन्हें प्रथम बार जून, वर्ष -2010 में पौड़ी में साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा गढ़वाली भाषा पर आयोजित कार्यक्रम में देखा था। परन्तु उनसे आमने -सामने प्रथम बातचीत 14 सितंबर 2011 को हुई। उत्तराखण्ड खबरसार एवं रंत रैबार के गढ़वाली आलेखों के माध्यम से उनसे पहले ही साहित्यिक परिचय हो चुका था। उनके द्वारा मुझे प्रेषित सुन्दर हस्त लिखित पत्र अब मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर हैं। चिठ्ठीयों के माध्यम से भी उन्होंने मेरा सदैव उत्साहवर्धन एवं मार्ग दर्शन किया।

          जब 'मानव अधिकार के मूल तत्व ' पुस्तक का लोकार्पण 12 दिसंबर,वर्ष 2012 को गढ़वाल मंडल विकास निगम, श्रीनगर गढ़वाल में प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी प्रो. डी. आर. पुरोहित एवं प्रो. रामानन्द गैरोला जी के हाथों हुआ था तो श्रद्धेय श्री नि:संग जी ने इस अवसर पर मुझे भी आमंत्रित किया था।
      11 नवम्बर,वर्ष 2016 को जब उनके गाँव ' देवर - खडोरा' ( गोपेश्वर )' जाने का सौभाग्य तो मैंने यह प्रत्यक्ष देखा एवं महसूस किया कि - वास्तव में श्रद्धेय श्री 'नि:संग ' जी इस उमर में भी एक ऋषि की तरह अपने साहित्यिक कर्म में लगे है। उनके साथ भाषा - साहित्य सम्बंधी बहुत सारी बातें हुईं थीं। मैंने उनसे उनके लेख " गाड़ म्यळैकि गंगा अर बोली म्यळैकि भाषा " के सम्बन्ध में भी चर्चा की जो कि मैंने गढ़वाली पाक्षिक 'उत्तराखंड खबरसार ' एवं गढ़वाली साप्ताहिक ' रंत रैबार ' में पढ़ा था और बाद में उन्होंने स्वयं भी मुझे वह आलेख डाक द्वारा प्रेषित किया था । यह एक गढ़वाली भाषा सम्बन्धी सार गर्भित आलेख था। वर्ष 2014 में मेरी गढ़वाली गद्य की पुस्तक 'गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा' (WINSER PUBLICATION, DEHRADUN) की भूमिका लिखकर उन्होंने मुझे कृतार्थ किया।
      डॉ. चरण सिंह 'केदारखण्डी ' जी द्वारा सम्पादित श्रद्धेय श्री नि:संग जी के 'अभिनन्दन ग्रन्थ -शिवराज सिंह रावत 'नि:संग '(प्रकाशन वर्ष 2018) में भी मेरा उनके साथ संस्मरणात्मक आलेख प्रकाशित है, जिसके कुछ अंश यहाँ पर आ चुके हैं ।
      श्रद्धेय श्री नि:संग जी बड़े धार्मिक एवं उच्च कोटि के लेखक थे। उनके द्वारा दर्जनों लिखित पुस्तकाें के विषय भी भिन्न - भिन्न थे। जिनमें महत्वपूर्ण पुस्तकें- गायत्री उपासना एवं दैनिक वंदना ,श्री बदरीनाथ धाम दर्पण, उत्तराखंड में नंदा जात, कालीमठ -काली तीर्थ ,पेशावर गोलीकांड का लोह पुरुष(वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ),भारतीय जीवन दर्शन और सृष्टि का रहस्य, केदार हिमालय और पंच केदार , षोडस संस्कार क्यों, गढ़वाली -हिंदी व्याकरण, भाषा तत्व और आर्य भाषा का विकास,भारतीय जीवनदर्शन और कर्म का आदर्श, गीता ज्ञान तरंगिणी, 'मानव अधिकार के मूल तत्व ' आदि प्रमुख हैं।
       उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा वर्ष 2010-11 के लिये उन्हें ‘गुमानी पंत साहित्य सम्मान’, वर्ष 1997 में उमेश डोभाल स्मृति सम्मान, चन्द्र कुंवर बर्त्वाल स्मृति हिन्दी सेवा सम्मान - 2005, उत्तराखण्ड सैनिक शिरोमणी सम्मान - 2008, गोपेश्वर में पहाड़ सम्मान, चमोली जिला पत्रकार परिषद द्वारा स्व. रामप्रसाद बहुगुणा स्मृति पुरस्कार, साहित्य विद्या वारिधि सम्मान सहित उन्हें अन्य कई संगठनों/संस्थाओं द्वारा समय -समय पर सम्मानित किया गया ।
         गढ़वाली साहित्य के उन्नयन में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है । अखिल गढ़वाल सभा देहरादून के सौजन्य से स्व. भगवती प्रसाद नौटियाल जी के प्रबंध संयोजन में संस्कृति विभाग, उत्तराखंड द्वारा सन -2014 में प्रकाशित' गढ़वाली-हिन्दी-अंग्रेजी ' शब्दकोश में 6000 से अधिक गढ़वाली शब्द देकर इस शब्दकोश निर्माण में उनकी अहम भूमिका रही।पहाड़ की वीरांगना तीलू रौतेली पर आधारित उनका गढ़वाली खण्डकाव्य ‘वीरबाला’, गढ़वाली गीतिकाव्य ‘माल घुघूती’ उनकी महत्वपूर्ण गढ़वाली रचनाएं हैं। गढ़वाली पाक्षिक समाचार पत्र 'उत्तराखंड खबरसार ' एवं गढ़वाली साप्ताहिक ' रंत रैबार ' में उनके बहुत सारगर्भित, शोधपरक गढ़वाली लेख छपे।
      वर्ष 2010 में प्रकाशित उनकी 'भाषा तत्व और आर्य भाषा का विकास' पुस्तक भाषा विज्ञान सम्बन्धी एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।यह पुस्तक भाषा के विकास के साथ -साथ हिंदी एवं गढ़वाली भाषा की उत्पति की नवीन अवस्थापनाओं को स्थापित करने में सफल रही है। जीवन के अंतिम दिनों में उनके द्वारा कुछ सृजित साहित्य अभी अप्रकाशित रह गया है।
       उनकी कमी जीवन में सदैव खलेगी। देश सेवा के बाद अपना सम्पूर्ण जीवन साहित्य की सेवा में लगाने वाले, साधक, समाज सेवी, हम सबके प्रेरणा श्रोत श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत नि:संग जी को मेरी एवं आखर समिति की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि एवं शत -शत नमन। ईश्वर उनकी पुण्य आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे एवं उनके परिवार को इस बड़ी वेदना को सहने की शक्ति दे। ॐ शांति, शांति 🙏 🙏😭
                                          संदीप रावत
                                न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल।


Wednesday, May 26, 2021

" गढ़वाळि लिख्वार संदीप रावत दगड़ा सुशील पोखरियाल जी कि छ्वीं - बत्थ "

"साहित्यकार संदीप रावत जी दगड़ा सुशील पोखरियाल जी कि छ्वीं - बत्थ"
🙏🌹✍️🤔🌅✍️🌳🌹🌥️✍️🌻🙏
सु.पु. --  गढ़वळि साहित्य जात्रा की सुर्वात आपल कब कर कन करि ?
सं.रा. --  बाळपन बटि गढ़वाळि गीत भला लगदा छायि, पुराणा - पुराणा गीत लगांदु छायि अर कबि - कबि त अपणा आप गीत मिसाणै कोसिस बि कर्दु छायि। जब मि दर्जा 8 मा रै होलु त मिन एक गीत लिखी छौ - " कन लोग रैना वो जो मातमा छायि, तपस्या कैरिक बि वो दुनियाम नि रायि। एक दिन हमुन बि दुनिया से चली जाण, धन - दौलत सब कुछ यखि छोड़ि जाण।" इन इन्नि कैरिक सुर्वात ह्वे। गढ़वाळि गद्य मा लिखणौ सुर्वात आदरणीय विमल नेगी जी का सम्पादन मा पौड़ी बटि छप्येण वळा गढ़वाळि साप्ताहिक समाचार पत्र 'उत्तराखंड खबरसार' अर आदरणीय ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी का सम्पादन मा छप्येण वळा गढ़वाळि साप्ताहिक समाचार पत्र 'रंत रैबार' से 2009 का वार ध्वार ह्वे। जादातर लेख मेरा गढ़वाळि भाषा साहित्य सम्बन्धी होन्दा छायि।
सु.पु.--  आपल बाळपन की बात करि त इन बथावा कि आपौ प्रारम्भिक शिक्षा कख ह्वे अर उबारि प्राथमिक विद्यालयों को सजबिज कन छाइ ?
सं.रा.--  मिन आधारिक विद्यालय बटि दर्जा पांच पास करि। दर्जा दस तक मेरी पढ़ै-लिखै वेदीखाल मा हि ह्वे। दर्जा 2-3 बटि कापी, पेंसिल .... गुरजि लोगूं मार बि खांदा छायि। उठ - बैठ, पाणि सरणु, लखड़ा ल्याणु सब्बि धाणि होंदु छौ। प्राइमरी बटि हि भारि रौंस रांदि छै कि कब आलो पंदरा अगस्त अर छब्बीस जनवरी। कब लगौंलु मि गीत।
सु.पु.--  पाटी- ब्वळख्या बटि आज हम कंप्यूटर का युग मा एग्यों। बाळपन मा गीत लगाणै रौंस अर लगन बटि सुर्वात करि आज आप एक प्रतिष्ठित साहित्यकार छन। ईं साहित्यिक जात्रा मा आपल कै उकाळ - उंदार बि बोकि ह्वेली। कुछ वांका बारा मा .....
सं.रा.--  साधुवाद आपतैं। पर मि क्वी प्रतिष्ठित साहित्यकार नि छौं। अब्बि सिखणू, बिंगणू अर गुणणै कोसिस कनू छौं। सब्या वरिष्ठ अर अग्रज साहित्यकारों से भौत कुछ सिखणौ मिलि। कतगौं न अड्योणै कोसिस बि कैरी। कतगै दौं ज्यू - पराण खट्टो बि ह्वे, पर जात्रा जारी रै। लेखन अर रचनौ मा परिपक्वता त पढ़ण - लिखण से ही आंद।
सु.पु.--  कतगा इ वरिष्ठ लिख्वार ब्वलदन कि गढ़वाली भाषा मा किताब त भौत छपेणी छन पर गुणवत्ता कम च। अर कुछ ब्वलदन कि चलो ल्यखणा त छैं छन। आप क्य स्वचदन ?
स.रा.--  सब्यूं का अपणा - अपणा मत छन। अब्बि संग्ति लिख्येणू भौत जरूरी छ, गद्य अर पद्य द्विया विधाओं मा। बाद मा बगत का दगड़ि छंटणी अपणा आप ह्वे जाली। अब्बि 80 - 85% लिख्वार कविता पर ही पिलच्यां छन। नै छ्वाळि को रुझान गद्य की तर्फां कम च।
सु.पु.--  उत्तराखंड मा अर वांसे भैर बि अनेक संस्था कवि सम्मेलन अर गीत - संगीत का कार्यक्रम उर्याणी छन। यांका बावजूद बि शहरों अर गौं का कस्बा - बाजारों मा नै छ्वाळि गढ़वळि मा बच्याण से परहेज़ कनी च। क्य बात ह्वेली ?
सं.रा.--  संस्था अपणि - अपणि तर्फां बटि काम त कनीं छन, पर बाजि - बाजि दौं त खानापूर्ति सि बि नजर आंद। जब तक धरातल परै काम नि करे जालु; आम लोग अपणि मातृभाषा का प्रति हीन भावना नि छ्वाड़ला; भाषा रोजगार से नि ज्वड़े जालि, तब तलक चुनौती त छैंयी छन। कै बि भाषौ व्यावहारिक पक्ष महत्वपूर्ण होंद। भाषा की भल्यार अर संवर्द्धन का वास्ता ब्वलदरा, बिंगदरा, लिखदरा अर पढ़दरा बि चैंणा छन।
सु.पु.--  रावत जी, आप लगातार लेखन से  गढ़वळि साहित्य भण्डार की जै बिरदि कना छौ। अबि तलक आपकि पांच पोथि प्रकाशित ह्वेगिन। कुछ वूंका बारा मा बि प्रकाश डाला।
सं.रा.--  मेरि पैलि गढ़वाळि पुस्तक 'एक लपाग' कविता - गीत संग्रै का रूप मा सन् 2013 मा छप्ये। फिर मिन 192 पेज की एक गढ़वाळि गद्य की पुस्तक 'गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा' लेखि, ज्वा सन् 2014 मा प्रकाशित ह्वे। ईं किताब मा समग्र रूप से गढ़वाली भाषा मा गद्य - पद्य, सब्बि विधाओं जनकि भाषा - विज्ञान, अनुवाद, काव्य, कथा, व्यंग्य, निबंध, नाटक, उपन्यास, व्यंग्य चित्र, चिट्ठी पतरि, समालोचना, गढ़वाळि समाचार पत्र - पत्रिकौं कु इतिहास इकबटोळ करने कोसिस कर्यीं छ। 
सन् 2016 मा 'लोक का बाना' (गढ़वाली आलेख संग्रह) प्रकाशित ह्वे। जै मा लोक संस्कृति सम्बन्धी आलेख छन। मेरी चौथि गढ़वाळि पोथि 'उदरोळ' (गढ़वाली कथा संग्रह) सन् ,2017 मा छप्ये। जैमा लोक समाज की छ्वट्टि - छ्वट्टि 34 गढ़वाळि कथा छन। अर पांचवीं किताब 'तू हिटदि जा' (गढ़वाली गीत संग्रै) 2019 मा प्रकाशित ह्वे।
सु.पु.-- गढ़वळि भाषा का आप एक कर्मठ अर सक्रिय लिख्वार छन। आशा कर्दौं कि अगनै बि गढ़वळि साहित्य भंडार मा अग्याळ देणा रैल्या। अब एक आम शिकैत लिख्वारों की या बि रैंद कि अपणि गैड़ि पैंसा खर्च करि किताब छपवाओ, फिर सप्रेम भेंट कारों। वांका बावजूद बि लोग नि पढ़दा। किताब बिकणि नि छन। क्य ब्वन च्हेल्या ?
सं.रा.--  कतगै दौं इन द्यखण अर सुणणा मा बि आयि कि गढ़वळि भाषा का लिख्वार हि एक हैंका लिख्यूं नि पढ़णा छन; आम पाठक त भौत दूरै छ्वीं‌ छन। गढ़वळि साहित्य की वितरण व्यवस्था बि अबि ठिक ढंग से नि ह्वे सकणी छ। लिख्वारों का घर मा हि चट्टा लग्यां‌ छन अपणि किताब्यूं का। कुछ - कुछ जगा मेळा - थौळों, साहित्यिक कार्यक्रमों मा गढ़वाळि साहित्य का स्टाल लगणा छन, य एक अनुकरणीय पहल छ। पर आज यांसे बि बढिक काम कन्नै जर्वत छ। सब्बि सम्पादक, प्रकाशक अर लिख्वार आपस मा मिलिक तैं क्वी कारगर योजना बणै सक्दन। , जांसे गढ़वाळि साहित्यौ प्रचार - प्रसार हो अर आम लोगूं की पौंच मा बि किताब होवुन।
सु.पु.--  गढ़वळि भाषा का प्रचार - प्रसार मा सोशल मीडिया की भूमिका का बारा मा आप क्य स्वचदन ?
सं.रा.--  भाषा का प्रचार - प्रसार मा सोशल मीडिया आज बड़ी भूमिका निभौणू छ। स्थापित साहित्यकारों का दगड़ा - दगड़ नया लिख्वारों का वास्ता बि यो एक अच्छो अर बड़ो मंच साबित होणू छ। लोग यूट्यूब अर फेसबुक मा कविता - गीतों का वीडियो द्यखणा छन, चर्चा - परिचर्चा, कवि सम्मेलन मा साहित्यकारों तैं लाइव द्यखणा छन। अमेजन, फ्लिपकार्ट, गूगल, ई बुक पर गढ़वाळि किताब बि मिलि जाणी छन। गूगल पर एक क्लिक का माध्यम से कतगै साहित्यकार अर वूंको काम समणि ए जांद।
सु.पु.-- गढ़वळि भाषा का नै लिख्वारु तैं आप क्य रैबार दींण च्हेल्या ?
सं.रा.--  नै छ्वाळि का जादातर लिखदरा बस लिखण परैं हि लग्यां छन, पढ़णा कम छन। रचनौं मा मीनत जरूरी छ, मौलिकता जरूरी छ। नै - नै विषयों पर बि लिखणै कोसिस कन्न चैंद। शार्टकट अर नकल से बचण प्वाड़लो। पद्य का दगड़ा गद्य परैं बि नै लिख्वारौं तैं ध्यान द्येण चैंद।
                ******************
                                   ...सुशील पोखरियाल।
         (रंत रैबार,अंक 24 मई 2021मा प्रकाशित )

Tuesday, May 25, 2021

श्रीनगर गढ़वाल /25 मई 2021/ "उत्तराखंड की एक और महान विभूति एवं प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ शिवप्रसाद नैथानी जी हुए दिवंगत "

श्रीनगर गढ़वाल /25 मई 2020/ बहुत ही दुःखद / "उत्तराखंड की एक और महान विभूति एवं प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ शिवप्रसाद नैथानी जी हुए दिवंगत "
😭अश्रुपूरित श्रद्धांजलि😭🙏🙏
       श्रीनगर निवासी, उत्तराखंड के प्रसिद्ध इतिहासकार, उत्तराखंड की संस्कृति पर वृहद लेखन करने वाली उत्तराखंड की महान विभूति परम आदरणीय डॉ. शिव प्रसाद नैथानी जी ( लगभग 88 वर्षीय) का आज देहावसान हो गया। यह उत्तराखंड के लिए एक अपूर्णीय क्षति है। डॉ.शिव प्रसाद नैथानी जी के निधन से हम सभी ने यहाँ के सांस्कृतिक इतिहास के एक अमूल्य रत्न को खो दिया है। अभी हाल ही में हे. न. ब. गढ़वाल केंद्रीय विश्व विद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल में कार्यरत उनके पुत्र डॉ. मोहन नैथानी जी भी अचानक दिवंगत हुए थे । अपने पुत्र की असमय मृत्यु की असहनीय पीड़ा एवं अपनी शारीरिक अस्वस्थता के कारण यह महान विभूति भी हम सभी को छोड़कर गोलोकवासी हो गई।   डॉ.शिव प्रसाद नैथानी जी पौड़ी गढ़वाल के बिलखेत गाँव के मूल निवासी थे एवं गढ़वाल विश्व विद्यालय श्रीनगर गढ़वाल परिसर से इतिहास के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक थे।
       परम आदरणीय डॉ.शिव प्रसाद नैथानी जी ने उत्तराखंड के सांस्कृतिक इतिहास सम्बंधी लगभग 12 शोधपरक पुस्तकें लिखकर लेखन के द्वारा उत्तराखंड में अपना अतुलनीय योगदान दिया है।साथ ही उनके विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में अनगिनत शोधपरक आलेख प्रकाशित हुए। काफी समय तक उन्होंने 'श्रीनगर बैकुंठ चतुर्दशी मेला स्मारिका ' के प्रधान सम्पादकत्व के दायित्व का भी बखूबी निर्वहन किया।
    कई बार  मेरी उनसे  फोन पर भी बातें होती थीं एवं इतिहास, यहाँ की संस्कृति पर भी चर्चा होती थीं । अभी भी गहन अध्ययन , कठिन परिश्रम, लेखन एवं शोधपरक कार्य के प्रति परम आदरणीय डॉ. शिव प्रसाद नैथानी जी की ऊर्जा एवं उत्साह प्रेरित कर जाता था , एक नई ऊर्जा का संचार कर जाता था। उनकी जिंदादिली, सहज -सरल, मृदु एवं सौम्य स्वाभाव से बहुत प्रेरणा मिलती थी । परम आदरणीय डॉ. शिव प्रसाद नैथानी जी को उनके आवास पर अपनी पुस्तकें भेंट करने के दौरान भी उनका सानिध्य मिला और उनका आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
        दिसंबर 2016 में "आखर " समिति के गठन के समय भी जब उनसे बातें हुईं तो उनके संरक्षक मण्डल में शामिल होने से "आखर " को भी आशीर्वाद मिला एवं "आखर "गौरवान्वित हुआ । "आखर " समिति द्वारा गढ़वाली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान डाॅ. गोविंद चातक की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम एवं प्रथम "डाॅ. गोविंद चातक आखर साहित्य सम्मान"(वर्ष -2018) समारोह में इतिहासविद् डाॅ. शिव प्रसाद नैथानी जी ने ही अध्यक्षता की थी।
 
     उत्तराखंड के पौराणिक तीर्थों एवं ऐतिहासिक स्थलों एवं प्राचीन से लेकर आधुनिक संस्कृति का उन्होंने प्रमाणिकता के साथ गहन विवेचना की । वास्तव में यहाँ के इतिहास एवं प्राचीन संस्कृति संबंधी जानकारी हेतु सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में डॉ.शिव प्रसाद नैथानी जी की पुस्तकों का अवलोकन सभी के लिए उपयोगी एवं प्रामाणिक सिद्ध होता है। उत्तराखण्ड के इतिहास एवं यहाँ की प्राचीन संस्कृति को लेकर डॉ. शिव प्रसाद नैथानी द्वारा किया गया कार्य उनको सदैव चिरस्मरणीय बनाए रखेगा।
     उनकी  कुछ  शोधपरक पुस्तके --

उत्तराखंड का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूगोल
गढ़वाल के संस्कृत अभिलेख
उत्तराखंड: संस्कृत, तीर्थ और मंदिर
गढ़वाल के प्रमुख तीर्थ और मंदिर
उत्तराखंड: श्रीक्षेत्र , श्रीनगर
ब्रह्मपुर और सातवीं सदी का उत्तराखंड
उत्तराखंड का सांस्कृतिक इतिहास भाग१
उत्तराखंड गढ़वाल का जनजीवन भाग १
उत्तराखंड गढ़वाल का जनजीवन भाग २
उत्तराखंड का सांस्कृतिक इतिहास...
     
उत्तराखंड की इस महान विभूति के दिवंगत होने पर उनको शत -शत नमन के साथ 'आखर ' की ओर से अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि।🙏 ईश्वर उनकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दे एवं शोकाकुल परिवार को यह असहनीय दुःख को सहने की शक्ति दे।
😭कनक्वै लिखण कविता अबारि, कनक्वै क्वी गीत
 वो सुरक-सुरक छोड़ि जाणा, छै जौं दगड़ी प्रीत।😭
😭 ॐ शांति शांति।🙏🙏
                                   संदीप रावत
                                अध्यक्ष - 'आखर ' 
                           न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल।





Saturday, May 8, 2021

"शिक्षक, शोधार्थी, शिक्षा का क्षेत्र मा नया -नया प्रयोग कन्न वळा, लेखक अर " हारा हुआ राम " पुस्तक का रचयिता श्री विश्वबंधु चंदाेला जी अब नि रैनि।"

 "शिक्षक, शोधार्थी, शिक्षा का क्षेत्र मा नया -नया प्रयोग कन्न वळा, लेखक अर " हारा हुआ राम " पुस्तक का रचयिता श्री विश्वबंधु चंदाेला जी अब नि रैनि।"

09 मई 2021(श्रीनगर गढ़वाल )-
       दगड्यो प्रणाम 🙏अब त बिल्कुल कखि बि मन नि लगणु कखि बि। दुःख भरी खबर ही सुणणाै मिलणी छन ।माफि चांदु 😭😭🙏🙏एक दुखद खबर छ कि - डॉ0 विश्वबंधु चंदोला जी जो कि 'आखर ' कि सदस्य, शिक्षिका अर कवयित्री श्रीमती सरिता चंदोला जी का हसबैंड अर कवयित्री श्रीमती उमा घिल्डियाल जी का भुला छायि,भग्यान ह्वे ग्येनि । मि तैं ब्याळी 
ब्याखुणी कै वाट्सप्प ग्रुप से पता चली कि वूं को परसि 07मई 2021 खुणी स्वर्गवास ह्वे गे अर अबारी हरिद्वार मा पोस्टेड छा अर अपणा बच्चों दगड़ा रौंदा छा। वो डिस्ट्रिक्ट कॉर्डिनेटर SSA पौड़ीअर डायट चड़ीगांव मा प्रवक्ता पद परैं बि रैनि अर वां से पैलि विकासखंड कीर्तनगर का रा0 इ0 का0 न्यूली मा सहायक अध्यापक गणित का पद पर कार्यरत छा। 
     श्री चंदोला जी पुस्तकाें अर साहित्याै गहन अध्ययन कन्न वळा, एक शोधार्थी, शिक्षा का क्षेत्र मा नै - नै प्रयोग कन्न वळा, शिक्षक होणा दगड़ा एक बढ़िया 'लेखक ' अर एक उम्मदा कलाकार(पेंटिंग /स्कैच ) बि छायि। सन 2003 मा वूं कि " हारा हुआ राम " पुस्तक रूप मा प्रकाशित एक रोचक वैचारिक कथा अभिव्यक्ति छ, जै मा वूंन भगवान श्री राम का मिथक तैं एक नयो अर्थ देणै कोशिश करी।
      मि जब जूनियर हाईस्कूल मा शिक्षक छौ अर त वूं दगड़ा  भेंट पैलि बार 
ह्वे छै अर वूंन मि तैं प्रेरित करी छौ कि - "आप कुछ नया कीजिए और यदि कुछ लिखते हैं या कुछ नया करते हैं तो उसका प्रकाशन भी जरूरी है ।" श्री चंदोला जी कि बोलीं य बात मेरा दिमाग मा बैठी गे छै। मि तैं य बात बार -बार याद आंद ।
    
    श्री चंदोला जी कु निवास न्यू डांग मा छ। वू भौत ही कर्मठ, ईमानदार अर एक प्रखर वक्ता छा। सैद भगवानै यी इच्छा छै कि -एक विद्वान,क्रिएटिव, मिलनसार, सामाजिक,मजाकिया अर खुश मिजाज मनखी इथगा जल्दी हमारा बीच बटि चली जाला 🙏। काल का अगनै क्वी बि जीति नि सकदु यीं बात तैं अपणि पुस्तक "हारा हुआ राम " का माध्यम से समाज तैं सजग कन्न वळा श्री विश्वबंधु चंदोला जी  ये नश्वर संसार मा भौतिक रूप से हारि गैनि पर वू अपणि ईं कृति रचना का माध्यम से कालजयी बण्या राला। 
    भगवान वूं कि आत्मा तैं शान्ति दियां, अपणा ठाै मा जगा दियां अर वूं का परिवार तैं ये दुःख तैं सहन कन्नै सक्या दियां ।🙏🙏🙏 विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🙏🙏
ॐ शांति.. शांति 🙏🙏🙏
                                       संदीप रावत
                             न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल।

Tuesday, March 23, 2021

पौड़ी, दिनांक 23 मार्च 2021--''मण्डलीय कला एवं संगीत शिक्षक सम्मान समारोह का आयोजन ''


पौड़ी, दिनांक 23 मार्च 2021--
     ''मण्डलीय कला एवं संगीत शिक्षक सम्मान समारोह का आयोजन ''
(एक बेहतरीन कार्यक्रम एवं माध्यमिक शिक्षा के अपर निदेशक महोदय जी की एक सार्थक नई पहल )
       गढ़वाल मण्डल के अपर निदेशक (माध्यमिक शिक्षा ) महोदय श्रद्धेय श्री महावीर सिंह विष्ट जी द्वारा मण्डल मुख्यालय पौड़ी के प्रेक्षागृह (ऑडिटोरियम ) में एक सम्मान समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह मे गढ़वाल मण्डल के शिक्षकों हेतु आयोजित की गई कला एवं संगीत की मंडल स्तरीय प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय, तृतीय आने वाले विजेताओं के साथ मण्डल स्तर के लिए चयनित सभी प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया।
      SCERT द्वारा शिक्षकों के लिए लोक चित्र कला, चित्र संयोजन, पोस्टर चित्रांकन ( बालिका शिक्षा ) , शास्त्रीय संगीत -गायन , अर्ध शास्त्रीय संगीत - गायन, सुगम संगीत- गायन, लोक संगीत- गायन, शास्त्रीय संगीत वादन, सुगम संगीत वादन, लोक संगीत वादन, शास्त्रीय नृत्य, सेमी क्लासिकल नृत्य और लोकनृत्य की प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसमें बड़ी संख्या में शिक्षकों ने प्रतिभाग किया गया था ।
      पौड़ी प्रेक्षागृह (ऑडिटोरियम ) में इस सम्मान समारोह से पूर्व शिक्षा संकुल में बनायी गयी सांस्कृतिक गैलरी का लोकार्पण गढ़ गौरव श्रद्धेय श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी द्वारा आज ही किया गया। 

      मुख्य अतिथि श्रद्धेय श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी, विशिष्ट अथिति के रूप में उपस्थित लोक गायक आदरणीय श्री अनिल बिष्ट जी, गढ़वाली मासिक पत्रिका 'धाद ' के यशस्वी सम्पादक व प्रसिद्ध मंच संचालक आदरणीय श्री गणेश खुगशाल 'गणी ' जी के संबोधन लोक संस्कृति,लोक कला,लोक परम्परा एवं लोक सभ्यता को प्रोत्साहित और प्रभावित करने वाले थे। विशिष्ट अथिति के रूप में आदरणीय श्रीमती उषा नेगी जी की गरिमामयी उपस्थिति भी थी।
     अपर निदेशक (माध्यमिक शिक्षा ) महोदय श्रद्धेय श्री महावीर सिंह विष्ट जी ने इस अवसर पर कहा कि - "अपनी ओर से हमारा ये विचार व प्रयास था कि कला - संगीत के प्रतिभागियों का सम्मान गढ़ गौरव नेगी जी के हाथों से हो। "
श्रद्धेय श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने इस अवसर पर कहा कि - "विद्यालयों मे शास्त्रीय संगीत के साथ -साथ लोक गीत - संगीत की शिक्षा भी दी जानी आवश्यक है। इससे लोक की समझ भी बढ़ेगी और बच्चों को पढ़ाई के साथ -साथ अपने लोक की जानकारी भी प्राप्त होगी । साथ ही जो शिक्षक विद्यालयाे मे शिक्षण कार्य के साथ -साथ इस तरह के कार्य कर रहे हैं, उनके द्वारा बच्चों को भी सिखाया जाना एवं प्रोत्साहित करना आवश्यक है। "
      विशिष्ट अतिथि एवं संगीत के विभिन्न वाद्य यंत्राे को बजाने में पारंगत व अद्भुत कलावंत श्रद्धेय पंडित श्री मोहन सिंह रावत जी ने शास्त्रीय गायन -शास्त्रीय वादन सम्बन्धी प्रेरक एवं अद्भुत वक्तव्य दिया।
        विशिष्ट अथिति के रूप में उपस्थित लोक गायक, गढ़वाली फिल्म निर्देशक श्री अनिल बिष्ट जी ने कहा कि - "लोक नृत्य की प्रस्तुति के समय उचित कॉस्ट्यूम (पहनावा) का ध्यान रखना होगा। जिस स्थान के लोक नृत्य की प्रस्तुति दी जा रही है वहां का ही कॉस्ट्यूम होना चाहिए। "
      कार्यक्रम का बेहतरीन संचालन रचनात्मक यशस्वी शिक्षक साथी श्री वीरेंद्र खखरियाल जी ने किया। GGIC PAURI व BHAGATRAM MORDERN SCHOOL PAURI के बच्चों ने लोक गीतों पर बहुत सुन्दर नृत्य प्रस्तुत किया।
      समारोह मे उन शिक्षकों को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने इस समरोह को आयोजित करने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस सम्मान समारोह में CEO बेसिक- माध्यमिक, राजकीय शिक्षक संघ के मण्डलीय अध्यक्ष श्री रवीन्द्र राणा जी, मण्डलीय महामंत्री डॉ.हेमंत पैन्यूली जी, पूर्व मण्डलीय महासचिव श्री शिव सिंह नेगी जी, शिक्षक संघ के अन्य पदाधिकारियों सहित बहुत बड़ी संख्या में शिक्षक -शिक्षिकाएं उपस्थित थीं। 

     वास्तव मे इस प्रतियोगिता से शिक्षक अत्यंत उत्साहित हैं। शिक्षकों का कहना है कि इस आयोजन इस प्रकार की प्रतियोगिता व आयोजन से उनमें एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है और अब दोगुने जोश से अपने- अपने कार्य कर सकेंगे। इस सम्मान से उनकी सामाजिक जिम्मेदारियां और भी बढ़ गई हैं।
      ज्ञातव्य है कि इस वर्ष SCERT (देहरादून ) के तत्वाधान मे ब्लॉक स्तर, जनपद स्तर, मण्डल स्तर और फिर राज्य स्तर पर इन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था और इन विभिन्न प्रतियोगिताओं में गढ़वाल मण्डल की कई शिक्षक - शिक्षिकाएं राज्य स्तर पर भी प्रथम स्थान पर रहे।
       अपर शिक्षा निदेशक महोदय माध्यमिक (गढ़वाल मण्डल ) श्री महावीर सिंह बिष्ट जी एवं का मण्डल स्तर पर की गई इस नई एवं बेहतरीन पहल हेतु हार्दिक धन्यवाद 🙏🙏साधुवाद। साथ ही उन सभी शिक्षक साथियों का भी आभार एवं धन्यवाद जिनकी इस कार्यक्रम के आयोजन मे महत्वपूर्ण भूमिका रही। 🙏🙏
                        रिपोर्ट --    संदीप रावत
                               प्रवक्ता (रसायन विज्ञान )
                      रा.इ.कॉ. धद्दी घंडियाल, बडियारगढ़
                                 (टिहरी गढ़वाल)