मेरी प्रकाशित पुस्तकें :-


(1) एक लपाग ( गढ़वाली कविता-गीत संग्रह)- समय साक्ष्य, (2) गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा (गढ़वाली भाषा साहित्य का ऐतिहासिक क्रम )-संदर्भ एवं शोधपरक पुस्तक - विन्सर प्रकाशन, (3) लोक का बाना (गढ़वाली आलेख संग्रह )- समय साक्ष्य, (4) उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह )- उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ


Sunday, November 14, 2021

विज्ञान शिक्षक स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी की जयंती पर मिला डॉ.अशोक कुमार बडोनी को प्रथम "शिवदर्शन सिंह नेगी स्मृति आखर विज्ञान शिक्षक सम्मान( वर्ष -2021)"

विज्ञान शिक्षक स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी की जयंती पर मिला डॉ.अशोक कुमार बडोनी को प्रथम "शिवदर्शन सिंह नेगी स्मृति आखर विज्ञान शिक्षक सम्मान( वर्ष -2021)"

      दिनाँक 14नवंबर(रविवार )2021 को प्रसिद्ध समाज सेवी, साहित्यकार, विज्ञान -गणित शिक्षण के नवाचारी एवं कल्पनाशील एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित एक आदर्श शिक्षक, स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी(पूर्व प्रधानाचार्य रा.उ.मा.वि. मंजाकोट, चौरास,टिहरी गढ़वाल की जयंती (15 नवम्बर )के उपलक्ष्य में 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट' द्वारा पहला कार्यक्रम एवं सम्मान समारोह उन्हीं के निवास "नेगी लॉज(गंगा गेस्ट हॉउस )" बिलकेदार (श्रीनगर गढ़वाल )में आयोजित गया ।
     इस कार्यक्रम में 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट' द्वारा स्व.शिवदर्शन सिंह नेगी जी की जयंती के उपलक्ष्य पर उनकी स्मृति में इस वर्ष "शिवदर्शन सिंह नेगी स्मृति आखर विज्ञान शिक्षक सम्मान" की शुरुआत की गई। इस वर्ष प्रथम "शिवदर्शन सिंह नेगी स्मृति आखर विज्ञान शिक्षक सम्मान, वर्ष -2021" विद्यालयी शिक्षा स्तर पर विज्ञान के क्षेत्र में नवाचारी प्रयोग करने हेतु एवं अपने छात्रों को राज्य के साथ राष्ट्रीय स्तर पर पहचान व प्रतिभाग करवाने हेतु डॉ. अशोक कुमार बडोनी जी ( प्रवक्ता, रा. इ. कॉ. मंजाकोट, चौरास)को प्रदान किया गया । सम्मान स्वरूप डॉ. बडोनी जी को अंगवस्त्र, सम्मान पत्र, आखर स्मृति चिह्न एवं पाँच हजार एक सौ (5100/-) रुपए की नगद धनराशि भेंट की गई।
कार्यक्रम की शुरुआत मंचासीन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन एवं स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी के चित्र पर माल्यार्पण /पुष्पांजलि अर्पित कर एवं ट्रस्ट की कार्यकारी सचिव श्रीमती बविता थपलियाल जी के मंगल गान से हुई। सभी मंचासीन अथितियों का स्वागत माल्यार्पण एवं बुके देकर किया गया एवं कार्यक्रम/सम्मान समारोह की स्मृति के रूप में ' आखर स्मृति चिह्न' मंचसीन अथितियों को सादर भेंट किए गए।
     कार्यक्रम के मुख्य अथिति के रूप में प्रोफेसर आर.एन गैरोला जी,(संकायाध्यक्ष , मानविकी एवं समाज विज्ञान संकाय, हे. न. ब. केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल),कार्यक्रम अध्यक्ष के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद एवं पाण्डुलिपियों पर वृहद शोध कार्य करने वाले डॉ. विष्णुदत कुकरेती जी एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में नगर पालिका परिषद श्रीनगर गढ़वाल की माननीय अध्यक्ष श्रीमती पूनम तिवाड़ी जी एवं दिवंगत शिवदर्शन सिंह नेगी जी की धर्मपत्नी व अवकाश प्राप्त शिक्षिका आदरणीय श्रीमती बिमलेश्वरी (विमला नेगी )जी की गरिमामयी उपस्थिति में यह कार्यक्रम एवं सम्मान समारोह सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य अथिति प्रोफेसर आर.एन गैरोला जी ने 'आखर ट्रस्ट' की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के वैचारिक आयोजन बहुत आवश्यक हैं और जिनका समाज में एवं शैक्षिक जगत में चिरस्मरणी योगदान है, उनको याद किया जाना बहुत आवश्यक है। साथ उन्होंने कहा कि - आखर समिति हमेशा से ही कुछ अलग आयोजन करती आ रही है।
        कार्यक्रम अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद एवं पाण्डुलिपियों पर वृहद शोध कार्य करने वाले डॉ. विष्णुदत कुकरेती जी ने स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी के जीवन दर्शन पर अपने विचार व्यक्त किए।
      आखर चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष संदीप रावत ने कहा कि - स्व. नेगी जी ने मुझे सदा प्रेरित किया एवं यह सम्मान अब उनकी जयंती पर हर वर्ष प्रदान किया जाएगा।
        विशिष्ट अतिथि नगर पालिका परिषद श्रीनगर गढ़वाल की माननीय अध्यक्ष श्रीमती पूनम तिवाड़ी जी ने कहा कि - स्व. नेगी जी का व्यक्तित्व सदा प्रेरित करने वाला रहा है एवं आखर चैरिटेबल ट्रस्ट की यह पहल बहुत सराहनीय है।
दिवंगत शिवदर्शन सिंह नेगी जी की धर्मपत्नी एवं अवकाश प्राप्त शिक्षिका आदरणीय श्रीमती बिमलेश्वरी (विमला नेगी )जी ने स्व. नेगी जी के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं को सबके सम्मुख रखा।
     प्रसिद्ध कवि जयकृष्ण पैन्यूली 'माटी 'जी ने स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी से जुड़े हुए अपने संस्मरण साझा किए। रीजनल रिपोर्टर की श्रीमती गंगा असनोड़ा थपलियाल जी ने ' आखर 'की इस पहल को ऐतिहासिक एवं सराहनीय बताया और कहा कि - 'आखर' जो भी काम कर रहा है वह भविष्य में मील के पत्थर साबित होंगे।
      कार्यक्रम का संचालन ट्रस्ट की कार्यकारी सचिव श्रीमती बविता थपलियाल जी द्वारा किया गया।
       कार्यक्रम एवं सम्मान समरोह में ट्रस्टी रेखा चमोली जी (कोषाध्यक्ष ), ट्रस्टी लक्ष्मी रावत जी, ट्रस्टी बविता थपलियाल जी (सहसचिव एवं कार्यकारी सचिव ), ट्रस्टी श्री दीवान सिंह मेवाड़ जी, ट्रस्टी श्रीमती अंजना घिल्डियाल जी, सदस्य कु. कंचन पंवार एवं कु. श्वेता, समाज सेवी एवं जन सरोकारों से जुड़े श्री अनिल स्वामी जी, श्रीमती गंगा असनोड़ा जी, श्रीमती उपासना कर्नाटक भट्ट जी,श्री मदन मोहन सिंह जी,श्री रणजीत सिंह जी श्रीमती बीना मेहरा जी, श्रीमती संगीता डोभाल जी,श्रीमती अमिता नेगी जी, श्रीमती जगदम्बा कुमाईं (सभासद कीर्तिनगर ), श्रीमती विनोद मैठाणी जी (सभासद, न. पा. परिषद श्रीनगर ),श्रीमती स्नेहा पटवाल जी, श्री आदित्य पटवाल जी, श्री तेजपाल जी,श्री बृजमोहन चमोली जी, श्रीमती ज्योति जैन मेवाड़, श्रीमती संगीता पंवार जी , श्रीमती ज्योति रावत जी, श्री लक्षमण सिंह जी,श्री मनीष चमोली जी, श्री बी. एस. भंडारी जी, श्री वी. एस. मेहरा, श्रीमती लीला बिष्ट जी,श्री मदन लाल डंगवाल जी, कु. अंजलि बुटोला सहित कई अन्य शिक्षक एवं मीडिया जगत से श्री सुधीर भट्ट जी, आदि की गरिमामयी उपस्थिति थी।
   अन्त में 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट 'के अध्यक्ष संदीप रावत ने कार्यक्रम एवं सम्मान समारोह मे उपस्थित सभी सम्मानित अतिथियों एवं मीडिया जगत का आभार व्यक्त किया। साथ ही ट्रस्ट के कार्यक्रम में उपस्थित सभी ट्रस्टियों के साथ ट्रस्टी गीतेश सिंह नेगी(सचिव ), डॉ. नागेंद्र रावत (उपाध्यक्ष ) का आभार एवं ट्रस्ट की संरक्षिका आदरणीय श्रीमती बिमलेश्वरी (विमला नेगी )जी का विशेष आभार व्यक्त किया।
      यह सम्मान समारोह "स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी" की धर्मपत्नी, अवकाश प्राप्त शिक्षिका एवं ट्रस्ट की संरक्षिका आदरणीय श्रीमती बिमलेश्वरी (विमला नेगी )जी के सहयोग से आयोजित किया गया । यह सम्मान समारोह स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी की जयंती के अवसर पर 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट ' द्वारा हर वर्ष आयोजित किया जाएगा।
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श्रीनगर में आयोजित सम्मान समारोह में प्रथम शिव दर्शन सिंह नेगी आखर विज्ञान शिक्षक सम्मान से नवाजे गए डॉ अशोक कुमार बडोनी 

संदीप रावत
(संस्थापक एवं अध्यक्ष)
आखर चैरिटेबल ट्रस्ट
श्रीनगर गढ़वाल।





Thursday, November 11, 2021

प्रयोगधर्मी एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित एक आदर्श शिक्षक थे स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी -- संदीप रावत, श्रीनगर गढ़वाल।

"प्रयोगधर्मी एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित एक आदर्श शिक्षक थे  स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी "
                          
 परिचय
जन्म - 15 नवंबर 1945 में हिमाचल प्रदेश के नहान में।
मूल निवास - कसाणी (पोखड़ा, पौड़ी गढ़वाल )
पिताजी - स्व. गंगा सिंह नेगी, अवकाश प्राप्त प्रधानाचार्य इ. कॉ. पोखड़ा। ये एक प्रतिभाशाली शिक्षक एवं कवि थे।
चर्चित 'विश्व अमर गीत " प्रबंध काव्य - 8 सर्गों में विभाजित।
पत्नी - श्रीमती बिमलेश्वरी (विमला )नेगी (अवकाश प्राप्त शिक्षिका )
शिक्षा - प्राथमिक स्तर तक नियमित विद्यालयी शिक्षा नहीं ले पाए। जुलाई 1959में योग्यता के आधार पर क्लास -7में प्रवेश। सन -1962 में हाई स्कूल। 1964में इंटरमीडिएट।
सन 1964-65 में हाई स्कूल स्तर पर एक वर्ष के लिए विज्ञान /गणित शिक्षण कार्य किया।
1967 में B. Sc(बिड़ला परिसर श्रीनगर, आगरा विश्वविद्यालय ),1969- M. Sc. (Physics )(मेरठ से )
1967 में वेदिखाल इंटर कॉलेज में भौतिक विज्ञान प्रवक्ता नियुक्त.. और फिर 1998 तक विभिन्न विद्यालयों में भौतिक विज्ञान अध्यापन कार्य किया।
सन 1998 में हाईस्कूल में प्रधानाध्यापक नियुक्त। एवं रा.उ. मा. वि. मंजाकोट, चौरास से प्रधानाध्यापक सेवा निवृत हुए।
सन 1999 में टीन शेड में चलने वाले रा.उ. मा. वि. मंजाकोट को एक आदर्श विद्यालय के रूप में स्थापित किया। अपने स्व.बेटे विपिन नेगी की याद में अपने व्यक्तिगत खर्चे से इस विद्यालय में एक बड़े हॉल 'विपिन स्मृति सभागार 'का निर्माण करवाया और साथ ही इस विद्यालय में अन्य कार्य करवाए। विज्ञान की अवधारणाओं को समझाने हेतु 'विज्ञान तरंगिनी ' का निर्माण किया और विभिन्न मंचों पर प्रस्तुति दी। शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों की अनुशंसा पर 05 सितंबर सन 2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के कर कमलों से राष्ट्रपति पूरस्कार से सम्मानित हुए। उन्होंने सम्मान में मिली धनराशि भी विद्यालय को दान कर दी थी।
प्रकाशन -
(1)शिवदर्शन सिंह नेगी जी की सन 2006 में 'विज्ञान -गणित गीतिका " महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित(प्रकाशक -भुवनेश्वरी महिला आश्रम )
(2)हिंदी कविताओं का साझा संग्रह ' सपनों के मोर पँख 'प्रकाशित।
     शिवदर्शन सिंह नेगी जी के जीवन की वास्तविक उपलब्धि - एक अध्यापक जैसा सम्मानजनक पद एवं अपने अधिकारीयों, साथी अध्यापकों, छात्र -छात्राओं का असीम प्यार उनको मिला। उन्होंने 28फरवरी सन 2007 को स्वेछिक सेवनिवृति ली।
महाप्रायाण - 14 अक्टूबर सन 2011को वेदांता हॉस्पिटल में।
      अपने शिवदर्शन (शिव के दर्शन ) नाम को सार्थक करने वाले ऐसे महान व्यक्ति  हमारे बीच नहीं हैं परन्तु हम जैसे उन हजारों छात्रों/लोगों के प्रेरणा स्रोत के रूप में जीवित रहेंगे जिन्होंने उनसे शिक्षा पायी।
    पूज्य गुरुजी " स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी" की जयंती (15नवंबर )के उपलक्ष्य में उनके आशीर्वाद एवं आप सभी की शुभकामनाओं से "आखर चैरिटेबल ट्रस्ट " अब हर वर्ष कार्यक्रम एवं सम्मान समारोह आयोजित करेगा। इस कार्यक्रम में स्कूल स्तर पर विज्ञान के क्षेत्र में नवाचारी प्रयोग हेतु एवं अपने छात्रों को राज्य के साथ -साथ राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाने हेतु आखर चैरिटेबल ट्रस्ट हर वर्ष एक विज्ञान शिक्षक को शिवदर्शन सिंह नेगी जी की स्मृति में पहला"स्व.शिवदर्शन नेगी स्मृति आखर विज्ञान शिक्षक सम्मान -2021" प्रदान करेगा। 
  Sandeep Rawat
Lec. Chemistry
GIC Dhaddi Ghandiyal 
(Tehri Garhwal)
Founder - Aakhar
Chairitable Trust

Monday, November 8, 2021

आखर समिति' से 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट ' तक का सफर



'आखर समिति' से 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट ' तक का सफर 
       
        हर्ष का विषय है  कि संदीप रावत पुत्र श्री महावीर सिंह रावत  निवासी न्यू डांग-ऐंठाणा, श्रीनगर गढ़वाल (उत्तराखंड ) एवं  श्रीमती लक्ष्मी रावत धर्म पत्नी संदीप रावत ने श्रीनगर गढ़वाल की गढ़वाली भाषा -साहित्य को समर्पित आखर समिति को वृहद रूप देते हुए "आखर चैरिटेबल ट्रस्ट " (सार्वजनिक प्रन्यास ) मुख्य न्यास कर्ता (मुख्य ट्रस्टी )के रूप में निष्पादित किया है। यह  अपने उद्देश्यों एवं अपने संविधान के अनुरूप सार्वजनिक हितार्थ (साहित्यिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक हितार्थ )एवं पुण्यार्थ  कार्य करेगा।
         मुख्य न्यास कर्ता (सेटलर /संस्थापक  )  संदीप रावत एवं श्रीमती लक्ष्मी रावत पत्नी संदीप  रावत  ने 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट ' के ट्रस्टी के रूप में अन्य  ट्रस्टी नियुक्त किए हैं, जो  'आखर बोर्ड सदस्य ' के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करेंगे।  श्री गीतेश सिंह नेगी(सचिव ),  डॉ. नागेंद्र रावत(उपाध्यक्ष ),श्री विक्रम सिंह रावत, श्री दीवान सिंह मेवाड़,श्रीमती रेखा चमोली(कोषाध्यक्ष ), श्रीमती बविता थपलियाल(सह सचिव एवं कार्यकारी सचिव ), श्रीमती अंजना घिल्डियाल आदि  'आखर बोर्ड सदस्य ' हैं।  मुख्य ट्रस्टी संदीप रावत   इस प्रन्यास के पदेन अध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएं एवं जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगे ।
       ज्ञातव्य है कि - आखर समिति की स्थापना 05 दिसम्बर 2016 को श्रीनगर गढ़वाल में इस आशय से की गई थी कि यह समिति गढ़वाली भाषा -साहित्य के क्षेत्र में एक नई सोच एवं नए विचारों के साथ कार्य करेगी। अब यह समिति वृहद रूप लेकर सार्वजनिक हितार्थ (गढ़वाली भाषा, साहित्य,संस्कृति,शैक्षणिक,  सामाजिक) एवं पुण्यार्थ "आखर चैरिटेबल ट्रस्ट " के रूप में कार्य करेगी।
        आखर " के पहले कार्यक्रम की शुरुआत 09/12/2016 को  श्री पहाड़ी ओम बहुगुणा जी द्वारा आयोजित 'डांग महोत्सव ' में गढ़वाली कवि सम्मेलन के रूप में हुई। इसके पश्चात फिर जो सिलसिला शुरू हुआ तो उतार -चढ़ाओं  के बीच अपनी स्थापना से लेकर  लगभग 04 वर्ष 09 महीनों में 'आखर समिति' की अब तक 18 बैठकें हुईं एवं छोटे -बड़े 15 बहुत महत्वपूर्ण कार्यक्रम आखर समिति द्वारा आयोजित किए गए।
कुछ महत्वपूर्ण कार्य इस प्रकार हैं -
 (1)29 अगस्त 2017 को श्रीनगर गढ़वाल में उत्तराखंड की 4 दिवगंत विभूतियों -  चंद्र कुंवर बर्त्वाल, जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा, धर्मानंद उनियाल 'पथिक ', डॉ. उमा शंकर थपलियाल जी का स्मरण कर व्याख्यान माला आयोजित की।
 (2) श्रीनगर गढ़वाल में उत्तराखण्ड के मूर्धन्य लोक साहित्यकार , दिवंगत महान विभूति ,सम्पूर्ण  गढ़वाली लोक साहित्य के पहले संग्रह कर्ता एवं अनुवाद कर्ता, भाषाविद    डॉ. गोविन्द चातक जी की जयन्ती के सुअवसर  पर 19 दिसम्बर 2017 (19/12/2017) से प्रतिवर्ष कार्यक्रम शुरू किया गया। गढ़वाली भाषा-साहित्य को समर्पित  "आखर समिति  " (श्रीनगर गढ़वाल ) द्वारा  " नगर पालिका परिषद सभागार " में एक भव्य कार्यक्रम करके "डॉ. चातक" जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम में  विद्वत वक्ताओं ने  डॉ.गोविन्द चातक जी की जीवनी पर  विस्तार से चर्चा करते हुए "डॉ.गोविन्द चातक जी का लोक साहित्य में योगदान " विषय पर भी अपनी बात रखी थी।
(3) गढ़वाली भाषा एवं लोक साहित्य में डॉ. गोविन्द चातक जी के भगीरथ योगदान से प्रेरणा लेकर " डॉ.गोविन्द चातक स्मृति व्याख्यान"  के आयोजन के साथ -साथ चातक परिवार के सहयोग से  साहित्यकार डॉ. गोविन्द चातक जी की   जयन्ती के सुअवसर पर 19 दिसम्बर वर्ष 2018 से  "डॉ.गोविन्द चातक स्मृति आखर साहित्य सम्मान "   आखर समिति द्वारा शुरू किया गया जो प्रतिवर्ष दिया जाता है और आगे भी ट्रस्ट द्वारा अनवरत जारी रहेगा।
     यह सम्म्मान अभी तक डॉ.गोविन्द चातक जी की जयन्ती पर प्रथम "डॉ.गोविन्द चातक स्मृति आखर साहित्य सम्मान " डॉ.नन्दकिशोर ढौंडियाल अरुण जी को(वर्ष 2018) श्रीनगर गढ़वाल में,द्वितीय  सम्मान गढ़वाली कथाकर गढ़वाली साहित्यकार श्री मोहन लाल नेगी एवं प्रसिद्ध गढ़वाली अनुवादक श्री  बचन सिंह नेगी जी (अब स्व.) को  देहरादून में (वर्ष -2019)संयुंक्त रूप से दिया गया एवं तृतीय सम्मान (वर्ष- 2020का )वरिष्ठ साहित्यकार श्री ललित केशवान जी को इस वर्ष 19 दिसंबर 2021को में डॉ.गोविन्द चातक जी की जयन्ती के सुअवसर पर दिया जाएगा। साथ ही वर्ष -2021 का यह सम्मान भी इसी दिवस पर किसी वरिष्ठ गढ़वाली साहित्यकार को प्रदान किया जाएगा।
    (4)  श्रीनगर गढ़वाल में " आखर समिति"  ने लगभग तीन वर्ष पूर्व   23 सितम्बर 2018 को  गढ़वाली भाषा -साहित्य के इतिहास में पहले विशुद्ध 'गढ़वाली कवयित्री सम्मेलन ' का आयोजन किया । उसी   गढ़वाली कवयित्री सम्मेलन के  विचार फलस्वरूप  ही संदीप रावत एवं गीतेश सिंह नेगी जी के सम्पादन में  गढ़- कवयित्रियों की कविताओं के पहले वृहद संकलन  "आखर "( दिसा- धियाण्यूं को पैलो वृहद गढ़वाळि कविता संग्रै) प्रकाशित हुआ । 
   (5)  गढ़- कवयित्रियों की कविताओं के पहले वृहद संकलन  "आखर" (दिसा- धियाण्यूं को पैलो वृहद गढ़वाळि कविता संग्रै ) का लोकार्पण दिनाँक 16 अगस्त 2020 को नगर पालिका सभागार (श्रीनगर गढ़वाल )
 में मातृ शक्ति की प्रतीक मुख्य अतिथि नगर पालिका परिषद की प्रथम महिला  माननीय अध्यक्ष  श्रीमती पूनम तिवाड़ी जी , कार्यक्रम अध्यक्ष  प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल जी , वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती उमा घिल्डियाल जी और डॉ.कविता भट्ट शैलपुत्री जी द्वारा आखर समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम में किया गया।
       इस ऐतिहासिक वृहद  गढ़वाली संग्रह को गढ़वाली की पहली कवयित्री एवं प्रख्यात समाज सेविका स्व.विद्यावती डोभाल जी  को समर्पित किया गया । स्व. विद्यावती डोभाल से लेकर  वर्तमान में गढ़वाली कविता के क्षेत्र जितनी भी महिलाएं कलमरत् हैं  इस वृहद "आखर" संग्रह में संकलित हैं । नई पीढ़ी अर्थात स्कूल / कॉलेज  में पढ़ने वाली  छात्राओं की गढ़वाली कविताओं को भी गढ़वाली कवयित्रियों की रचनाओं के इस वृहद संग्रह "आखर " में शामिल किया गया है । 
 (6)   "आखर समिति"  द्वारा फरवरी माह वर्ष 2021 में "उत्तराखंड मातृभाषा अभियान "चलाया गया जिसमें उत्तराखंड के  सभी रैबासी - प्रवासियों से इस अभियान में शामिल होने की धै- धाद  लगाई गई यानि आह्वान किया गया। इस अभियान की संकल्पना ' आखर ' के  गीतेश सिंह नेगी की थी। 21 फरवरी 2021 को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर आखर द्वारा महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
(7)इन कार्यक्रमों के अतरिक्त लगभग इन साढ़े चार वर्षों के दौरान 'आखर ' द्वारा गढ़वाली भाषा - साहित्य के क्षेत्र में एक नई सोच के साथ अन्य कार्य करने का पूरा प्रयास किया गया । साथ ही कुछ नए गढ़वाली लेखकों व गढ़वाली कवयित्रियों को एक मंच देने का प्रयास किया गया ।
         साथियो ,कई अनुभव  'आखर समिति' से 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट   तक ' के सफर  में हुए एवं साथ ही बहुत कुछ सीखने - समझने और देखने को मिला। इस दौरान बहुत सारे मित्रों, सुधीजनों, शुभ चिंतकों, विद्वतजनों का साथ, सानिध्य एवं आशीर्वाद प्राप्त हुआ। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि उन सभी का सानिध्य, सहयोग एवं आशीर्वाद आगे भी 'आखर चैरिटेबल ट्रस्ट' को इसी प्रकार मिलता रहेगा। उन सभी साथियों का भी हम आभार व्यक्त करते हैं जो आखर समिति के गठन से लेकर अब तक साथ बने हुए हैं एवं आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि वह आगे भी साथ बने रहेंगे। 
            अगामी 14 नवंबर को दिवंगत आदर्श शिक्षक,वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले एवं विज्ञान -गणित शिक्षण में नवाचारी प्रयोग करने वाले,समाज को एक नई दिशा देने वाले राष्ट्रपति पुरस्कार  से सम्मानित    (पूर्व प्रधानाचार्य रा.उ.मा.वि. मंजाकोट, चौरास,टि.ग.) पूज्य " स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी" की  जयंती  (15नवंबर )के उपलक्ष्य में उनके आशीर्वाद एवं आप सभी की शुभकामनाओं से "आखर चैरिटेबल ट्रस्ट "अपना पहला कार्यक्रम एवं सम्मान समारोह आयोजित करेगा। इस कार्यक्रम में स्कूल स्तर पर  विज्ञान के क्षेत्र में  नवाचारी प्रयोग हेतु एवं अपने छात्रों  को राज्य के साथ -साथ राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाने हेतु आखर चैरिटेबल ट्रस्ट एक विज्ञान शिक्षक को  शिवदर्शन सिंह नेगी जी की स्मृति में पहला"स्व.शिवदर्शन नेगी स्मृति आखर विज्ञान शिक्षक सम्मान -2021" प्रदान करेगा। यह सम्मान समारोह स्व. शिवदर्शन सिंह नेगी जी" की धर्मपत्नी एवं अवकाश प्राप्त शिक्षिका श्रीमती विमला नेगी जी के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। आगे भी यह सम्मान अब प्रतिवर्ष दिया जाएगा।
                  " आखर चैरिटेबल ट्रस्ट "
                     (सार्वजनिक प्रन्यास )
                न्यू डांग - ऐंठाणा, श्रीनगर गढ़वाल 
                 
                
           
              

Wednesday, October 13, 2021

रा.इ.कॉ.धद्दी घण्डियाल बडियारगढ़ (टिहरी गढ़वाल ) में "ATAL TINKERING LAB (ATL) " का शुभारम्भ

13 /10/2021, GIC DHADDI GHANDIYAL, BADIYARGARH (T. G.)

         बड़े हर्ष का विषय है कि आज हमारे विद्यालय रा.इ.कॉ.धद्दी घण्डियाल बडियारगढ़ (टिहरी गढ़वाल ) में  "ATAL TINKERING  LAB (ATL) " का शुभारम्भ मुख्य अतिथि माननीय खंड शिक्षा अधिकारी, कीर्तिनगर डॉ. सुरेन्द्र सिंह नेगी जी के कर - कमलों से हुआ। इस अवसर पर रा.इ.कॉ. गौनीखाल के प्रधानाचार्य श्री अनिल ममगाईं जी, पी. टी.ए. अध्यक्ष श्री रणजीत सिंह नेगी जी, दो प्रशिक्षकों एवं अन्य अथितियों सहित  समस्त विद्यालय परिवार उपस्थित रहा। "ATAL TINKERING  LAB (ATL) "की  processing से लेकर अब तक पूरे दो वर्ष पश्चात आज यह सुअवसर आया।
       विद्यालय में विद्यार्थियों एवं सभी शिक्षिकों में"Atal Tinkering Lab (ATL) "को लेकर बहुत उत्साह बना हुआ है। यह Lab सभी शिक्षकों, Class 6th से 12th तक के सभी विद्यार्थियों के लिए एवं साथ ही आस -पास के उन व्यक्तियों के लिए भी है जिनके पास विज्ञान को लेकर नए ideas हों, और उनको इस lab में मूर्त रूप दिया जा सके। यह प्रयोगशाला निश्चित रूप से आम लोगों एवं छात्र छात्राओं के बीच वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में मददगार साबित होगी।
      कार्यक्रम का संचालन भौतिक प्रवक्ता डॉ. दीपक जोशी जी ने किया। अंत में विद्यालय के प्रधानाचार्य आदरणीय श्री मोहन प्रसाद डिमरी जी ने सभी अतिथियों एवं प्रशिक्षकों का आभार एवं धन्यवाद व्यक्त किया।
Note -
   Waw...3D PRINTER, BASIC ELECTRONIC COMPONENTS, ROBOTICS & IOT,  ALL MECHANICAL DEVICES, LAP TOPS, MINI COMPUTERS, TELESCOPE,  LIGHT SIGNAL PROGRAMMING, DRONE CAMERAS,EXTRA -EXTRA..
"Atal Tinkering Lab (ATL) "is a central government of India initiative to create an environment of scientific temperament, innovation, creativity amongst Indian students. It is a step towards a new India that will embrace and encourage novel and innovative ideas and inventions.
(Photos #श्री दीवान सिंह मेवाड़ जी प्रवक्ता , राजनीति विज्ञान )

Monday, June 14, 2021

गढ़वाली गीत संग्रह "तू हिटदि जा " की समीक्षा समीक्षक - डॉ.चरणसिंह केदारखंडी

गढ़वाली गीत संग्रह "तू हिटदि जा " की समीक्षा
समीक्षक - डॉ.चरणसिंह केदारखंडी

      रसायन विज्ञान के प्रवक्ता ,लोकभाषा और साहित्य को समर्पित संस्था "आखर समिति" (श्रीनगर गढ़वाल)के संचालक/संस्थापक और गढ़वाली कविता और गद्य साहित्य में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने वाले संदीप रावत जी आज किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं...

      अब तक रावत जी गढ़वाली में पाँच क़िताबें लिख चुके हैं जिनमें 'एक लपाग'( कविता-गीत संग्रह), 'गढ़वाली भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा'(शोधपरक गढ़वाली ऐतिहासिक एवं सन्दर्भ पुस्तक ) , 'लोक का बाना'( गढ़वाली लेख संग्रह) , 'उदरोल'(गढ़वाली कथा संग्रह) और 'तू हिटदि जा'( गढ़वाली गीत संग्रह) शामिल हैं।

      'तू हिटदि जा'(तुम चलते रहो !) इस शीर्षक को पढ़ने मात्र से ही इस अँधेरे समय में भीतर एक आशावाद जन्मता है ! असल में, मंज़िल पर पहुँचने से ज़्यादा उसकी ओर 'चलते रहने' में जीवन की गुरुता और सौंदर्य छुपा हुआ है। श्री अरविन्द ने अपनी कालजयी कविता सावित्री में कहा भी है : attempt, not victory, is the charm of life.

रोबर्ट लुइस स्टीवेंसन ने अपने निबंध 'El DORADO' का अंत भी इस तरह किया है :
"...to travel hopefully is better than to arrive at..".



       क़िताब के पृष्ट आवरण पर दी गई शीर्षक कविता "तू हिटदि जा" को पढ़कर अनायास ही 'हरिऔध' जी की मशहूर कविता 'कर्मवीर' याद आती है। आप "हथयूं का रखड़ा कर्मोंन तू बदलदि जा" में "पर्वतों को काटकर सड़कें बना देते हैं वे " की अनुगूँज सुन सकते हैं।

     दुनियां में सभी सफ़ल कहानियां खून, पसीने और जीतोड़ परिश्रम की कहानियां हैं । सोशल मीडिया के इस अलसी समय में हमारी युवा पीढ़ी के लिए कवि की इससे बेहतर क्या ललकार हो सकती है :

"पौड़ बाटि ही निकल्द दगढ़या मिठ्ठू पाणी रे
मीनत करी स्वर्ग भी मिल्द , छोड़ ना गाणि -स्याणी रे !"

    'तू हिटदि जा' गीत संग्रह नहीं, समकालीन पहाड़ी 'तू हिटदि जा'जनमानस के सवालों और सरोकारों का बोलता हुआ आईना है। इसमें ख़्वाब हैं, ख़ौफ़ हैं, कुर्फ़ हैं, कैफियतें हैं, आरजू हैं, आकाश हैं और कांच के महीन टुकड़ों (shards)के मानिंद बिखरे पहाड़ी सपनों के गर्भपात का गुस्सा है। पहाड़ी जीवन के जितने रंग ढंग हो सकते हैं उतने इस कविता संग्रह में मौजूद हैं। इसमें हम सबके शरीर में धड़कन बनकर धड़कती 'ब्वे' (माँ) है( पृष्ट 32, मेरी ब्वे"), इसमें हिमालय की गोद में खिलखिलाते संदीप जी के घर गाँव (गों गोठियार) की महक है( मि वे मुल्क कु छोउँ पृष्ट 37), इसमें रूमानी प्रेम की खुशबू भी सराबोर है ( तेरी माया कि झौल पृष्ट 64 ), इसमें जात पांत में विभाजित समाज के लिए गहरी फटकार है ( गुणि नि जानि पृष्ट 72

"बनि-बन्या धरम दर्शनों को , सार नी बींगी हमुन
मनखी-मनखी मा झणी किलै ,भेद करी द्यायि हमुन ?"

         इसमें बेटी की जीवन, शिक्षा और सम्मान की चिंता है ( बेटी बचावा, बेटी पढ़ावा पृष्ट 51) तो पहाड़ की पीड़ा पढ़ते समय बरबस ही आँखे भर आती हैं । पहाड़ ख़ुद बोलता है :

"अंसधरी म्येरी क्वे नी द्यखणा
खेरी मेरी क्वे नी बिंगणा
कै मा बिंगौवु मि को छ बैरी ?
भितरै -भितर खयेंणु आज "
(इस बीस सालों में जिन लोगों ने पहाड़ को लूट खसोट का अड्डा बनाया है वो बाहरी नहीं, हमारे अपने लोग हैं। पहाड़ कहे भी तो किससे कहे ? पानी के धारे में ही आग लगने जैसे हालात हैं...)

      विकास के नाम पर सुरंगों के भीतर कैद होती गंगा की चिंता भी हमारे कवि के जेहन में है(पृष्ट 47).
गों गुठ्यार और पितरों की कुड़ी नीलाम करके देहरादून और घमतपवे भाबर हल्द्वानी में बैठे लोगों( जो रात दिन पलायन पर विमर्श करते हैं, )के लिए पहाड़ और मैदान के बीच की अस्मिता ,अहंता का जिस प्रकार का सांस्कृतिक संकट खड़ा हो गया है उस पर 'मेरा पाड़ मा'(पृष्ट 50) जैसी कविता लिखी गई है। वैचारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दोगलापन चुपके से हमारे जीवन में घुस गया है, मनखी यहाँ rolling stones यानी बेपेंदे के लोटे हो गए हैं। जिस पत्ते या पौधे में पानी की एक बूंद भी नहीं टिक पाती उसे 'पापड़ पाणी' कहा जाता है। संदीप जी ने क्या ख़ूब उपमा दी है :

"गात मा गुण नि रै ग्ये, जीभ कू स्वाद बि हर्ची ग्ये
मनखी पापड़ पाणी ह्वे ग्ये मेरा पाड़ मा "(50)

          इसके अलावा बरखा, बादल, बसंत,बग्वाल फ़ाग और फाल्गुन की भी पूरी दस्तक है इस काव्य संग्रह में । नेता जिस प्रकार जनता को चराते हैं उस पर आपको हँसाने के लिए एक करारा राजनैतिक व्यंग्य है( पृष्ट 76, मि आणु छों ! )

"आणु छौं रे आणु छौं
मि भाषण देंण आणु छौं
जाँत पाँत का फिंडका फोड़ी
तुमतैं चरौणु आणु छौं ☺️☺️

      उत्तराखंड का ही नहीं, पूरे देश का समाज जिस प्रकार धर्म जाति के व्यामोह में उलझा हुआ है उसे देखकर इस कविता का आकाश व्यापक हो जाता है। इसके अलावा हाथों में वैचारिक तलवारें लेकर समाज सुधार करने निकले इस मनमौजी समय के लिए एक दार्शनिक कविता है पृष्ट 67 पर है :
"मन की आँख्यूंन अफु तैं अफी देख सकदि त देख ले " !

      लेकिन बिडम्बना यह है कि आजकल आलोचक की नज़र से ख़ुद को देखने की फुर्सत किसे है ? फेसबुक पर एक नेगेटिव कमेंट पढ़कर लोग कुल्हाड़े लेकर पीछे दौड़ पड़ते हैं !

       20वीं सदी में अमेरिका के सबसे प्रभावशाली कवियों में एक रोबर्ट फ्रॉस्ट की कविता "ROAD NOT TAKEN" की अनायास याद आती है तू हिटदि जा की कविता "लीक से हटीक" पढ़कर। पायनियर कौन है ? जो रास्ता दिखाये भी और बनाये भी ! घिसे पिटे(charted) रास्तों पर चलने से क्या फ़ायदा ? हम यहाँ भेड़ या भीड़ का हिस्सा बनने नहीं आये हैं।
पढ़िए इस आनंद को :

"सौंगा बाटों मा सदानि मनख्यूँ का लैंजा रौंदन
औखा बाटों बि जरा तू हिटीक दिखौ !"

       सभ्य इंसानों और जंगली जानवरों से बराबर परेशान पहाड़ की पीड़ा और उस पीड़ा का निवारण "कंनक्वे रौंण ये पहाड़ मा" और "इन्क्वे रौंण ये पहाड़ मा" जैसे कविताओं में पेश किया गया है।

       48 की उम्र में(2019) में लिखी गई(प्रकाशित) इन कविताओं की 48 संख्या का यही राज है। नाज़ुक मिज़ाज और कवि से ज़्यादा एक मिलनसार आदमी और बेहद विनम्र इंसान संदीप रावत का संवेदनाओं की गहरी परतों तक जाना कतई भी आश्चर्य का विषय नहीं है। प्रकृति अपनी निर्मल आवाज़ें ख़ुद चुनती है , अपने अलंकरण ख़ुद गढ़ती है।

      मुझे ख़ुशी है कि रावत जी अभी समकालीन साहित्य विरादरी की परंपरा के उलट "साहित्य शिरोमणि" और "भारत भूषण" बनने के लिए बेचैन नहीं दीखते हैं।
आज का समय दूसरे की छाती पर सवार होकर ख़ुद की बुलंदी हासिल करने का समय है : साहित्य, सिनेमा, खेल, राजनीति, समाज सेवा-- इस तरह की होड़ सब जगह दिखती है ।
     अपनी एक बेहद मार्मिक कविता "वु बाटु" (पृष्ट 26) में रावत जी एक साफ़ सुथरे और स्वस्थ समाज की कल्पना इस प्रकार करते हैं :

"ना हो जख स्वारथ कू सांटु
ना हो जख तिकड़म कु जांठु
ना हो जख रींस कु कांडू
ना लुछु क्वी कैकू बांठु...
मी हिटण चांदू सदानी वु बाटू ।"

     चार भागों में विभाजित कुल 80 पृष्ट और 150 रुपये मूल्य की इस क़िताब का प्रकाशन *रावत डिजिटल गाजियाबाद* ने किया है। भास्कर भौर्याल और दीपक नेगी ने आवरण पृष्ट तैयार किया है और संग्रह को अपना आशीर्वाद दिया है हमारी दीदी पूर्व संगीत निदेशिका आकाशवाणी डॉ. माधुरी बड़थ्वाल ने।भूमिका (पवांण ) उत्तराखंड के एक और उदीयमान लोक साहित्य के नक्षत्र भाई गीतेश सिंह नेगी (घुर घुघति घुर क़िताब के चर्चित लेखक)ने लिखी है जिसमे उन्होंने भारतीय सौन्दर्यशास्त्र के आचार्यों से लेकर आचार्य रजनीश( ओशो) के उद्धरण देकर इस बेहद पठनीय और मननीय , महनीय ग्रन्थ का परिचय कराया है।

     इस गीत संग्रह की साहित्यिक गंभीरता, सरसता और इससे बढ़कर इसकी प्रासंगिकता को देखते हुए इसे आंचलिक भाषा के प्रश्रपत्र के अंतर्गत गढ़वाल विश्वविद्यालय सहित अन्य विद्यापीठों में युवा पीढ़ी को पढ़ाया जाना चाहिए। क़िताब को सुबह की हवा की तरह पीने वाले मेरे दोस्तों से आग्रह है कि इस तरह का साहित्य खरीदकर ही पढ़ें अन्यथा सरकारी सचिवालय संपन्न साहित्यकारों को 'विपन्न साहित्यकार' की पेंशन देता रहेगा...

संदीप रावत जी के लिए मै जो सबसे अच्छी बात कहूँगा वह यह है :

बिना आत्म सम्मोहन के मेरा दिदा,
"तू हिटदी जा" !!!

डॉ.चरणसिंह केदारखंडी
श्री अरविन्द ग्राम तुलंगा
केदारनाथ हिमालय।

नोट - यह गढ़वाली गीत संग्रह निम्न स्थानों पर उपलब्ध है --
(1) https://www.paharibazar.com/product/tu-hitdi-ja-garhwali-geet-sangrah-by-sandeep-rawat/
(2)रावत डिजिटल पब्लिकेशन, इंद्रापुरम गाजियाबाद
(3)भट्ट ब्रदर्स, बसंत विहार, देहरादून
(4)स्वयं गीतकार संदीप रावत (9411155059)
(5)ट्रांसमीडिया (रेनबो पब्लिक स्कूल के सामने )श्रीनगर गढ़वाल
 

Wednesday, June 2, 2021

"नहीं रहे उच्च संस्कारों से परिपूर्ण विद्वान लेखक , एक गृहस्थ संत , समाज सेवी एवं अनुकरणीय श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी" : संदीप रावत, श्रीनगर गढ़वाल।

 "नहीं रहे उच्च संस्कारों से परिपूर्ण विद्वान लेखक , एक गृहस्थ संत , समाज सेवी एवं अनुकरणीय  श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी"
🙏🙏अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि 😭🙏🙏

       उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र ने देश को कई यशस्वी सैनिक, साहित्यकार, विद्वान, इतिहासकार, भाषा वैज्ञानिक और चिंतक दिए हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत व प्रतिभा से ख्याति अर्जित की। उनमें एक प्रमुख नाम श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी का है जो कल 02 जून सन् 2021 को सुबह साहित्य सृजन करते हुए 94 वर्ष में अनंत यात्रा पर चले गए हैं। उनका जन्म 15 फरवरी 1928 को अपने ही गाँव देवर -खडोरा(गोपेश्वर )जिला- चमोली में हुआ था। श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत नि :संग जी अभी देवर -खड़ोरा ( गोपेश्वर ) में ही रहते थे।

             उत्तराखंड की यह दिवंगत महान विभूति हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, गढवाली भाषा पर मजबूत एवं समान अधिकार रखती थीं । कहा जा सकता है कि - उनकी हिन्दी, अंग्रेज़ी, संस्कृत एवं गढ़वाली भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ थी। वे उच्च कोटि के लेखक एवं चिंतक ही नहीं बल्कि एक तरह से हिमालय की उच्च कोटि के साधक भी थे। वे एक गृहस्थ संत थे तो साथ ही एक पत्रकार भी थे। वे एक तरह से ऋषि परम्परा एवं सहज-सरल, सौम्य व्यक्ति थे। उनके दिवंगत होने से साहित्य की ऋषि परम्परा क्षेत्र में जो स्थान रिक्त हुआ है उसकी पूर्ति असंभव है। उनके लेखन के प्रमुख विषय आध्यात्म, दर्शन,इतिहास संस्कृति, भाषा आदि थे। विपरीत परिस्थियों में एवं जीवन के अंतिम क्षणों तक भी वे साहित्य सृजन करते रहे।
       श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी पहले भारतीय सेना में सेवारत रहे तथा देश की सेवा की। सैन्य सेवा से अवकाश प्राप्त करने के पश्चात वे उत्तर प्रदेश, स्थानीय निकाय प्रशासनिक सेवा में भी रहे। ।वे ऐसे विरले एवं मूर्धन्य साहित्यकार थे जिन्होंने सैन्य सेवा के पश्चात् साहित्य सृजन किया ।सामाजिक सरोकारों से भी उनका गहरा जुड़ाव था।
       यह एक अद्भुत बात है कि जिस उम्र में व्यक्ति शिथिल हो जाता है, आराम करना चाहता है उस उम्र के पड़ाव में उन्होंने लेखन शुरू किया और समाज को उच्च कोटि का साहित्य दिया।
      यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसे मनीषी का आशीर्वाद मुझे प्राप्त हुआ। उत्तराखंड के विद्वान वरिष्ठ साहित्यकार, भाषाविद श्रद्धेय श्री ' नि:संग ' जी के साथ मेरी कई यादें जुड़ीं हैं । मैंने उन्हें प्रथम बार जून, वर्ष -2010 में पौड़ी में साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा गढ़वाली भाषा पर आयोजित कार्यक्रम में देखा था। परन्तु उनसे आमने -सामने प्रथम बातचीत 14 सितंबर 2011 को हुई। उत्तराखण्ड खबरसार एवं रंत रैबार के गढ़वाली आलेखों के माध्यम से उनसे पहले ही साहित्यिक परिचय हो चुका था। उनके द्वारा मुझे प्रेषित सुन्दर हस्त लिखित पत्र अब मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर हैं। चिठ्ठीयों के माध्यम से भी उन्होंने मेरा सदैव उत्साहवर्धन एवं मार्ग दर्शन किया।

          जब 'मानव अधिकार के मूल तत्व ' पुस्तक का लोकार्पण 12 दिसंबर,वर्ष 2012 को गढ़वाल मंडल विकास निगम, श्रीनगर गढ़वाल में प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी प्रो. डी. आर. पुरोहित एवं प्रो. रामानन्द गैरोला जी के हाथों हुआ था तो श्रद्धेय श्री नि:संग जी ने इस अवसर पर मुझे भी आमंत्रित किया था।
      11 नवम्बर,वर्ष 2016 को जब उनके गाँव ' देवर - खडोरा' ( गोपेश्वर )' जाने का सौभाग्य तो मैंने यह प्रत्यक्ष देखा एवं महसूस किया कि - वास्तव में श्रद्धेय श्री 'नि:संग ' जी इस उमर में भी एक ऋषि की तरह अपने साहित्यिक कर्म में लगे है। उनके साथ भाषा - साहित्य सम्बंधी बहुत सारी बातें हुईं थीं। मैंने उनसे उनके लेख " गाड़ म्यळैकि गंगा अर बोली म्यळैकि भाषा " के सम्बन्ध में भी चर्चा की जो कि मैंने गढ़वाली पाक्षिक 'उत्तराखंड खबरसार ' एवं गढ़वाली साप्ताहिक ' रंत रैबार ' में पढ़ा था और बाद में उन्होंने स्वयं भी मुझे वह आलेख डाक द्वारा प्रेषित किया था । यह एक गढ़वाली भाषा सम्बन्धी सार गर्भित आलेख था। वर्ष 2014 में मेरी गढ़वाली गद्य की पुस्तक 'गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा' (WINSER PUBLICATION, DEHRADUN) की भूमिका लिखकर उन्होंने मुझे कृतार्थ किया।
      डॉ. चरण सिंह 'केदारखण्डी ' जी द्वारा सम्पादित श्रद्धेय श्री नि:संग जी के 'अभिनन्दन ग्रन्थ -शिवराज सिंह रावत 'नि:संग '(प्रकाशन वर्ष 2018) में भी मेरा उनके साथ संस्मरणात्मक आलेख प्रकाशित है, जिसके कुछ अंश यहाँ पर आ चुके हैं ।
      श्रद्धेय श्री नि:संग जी बड़े धार्मिक एवं उच्च कोटि के लेखक थे। उनके द्वारा दर्जनों लिखित पुस्तकाें के विषय भी भिन्न - भिन्न थे। जिनमें महत्वपूर्ण पुस्तकें- गायत्री उपासना एवं दैनिक वंदना ,श्री बदरीनाथ धाम दर्पण, उत्तराखंड में नंदा जात, कालीमठ -काली तीर्थ ,पेशावर गोलीकांड का लोह पुरुष(वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ),भारतीय जीवन दर्शन और सृष्टि का रहस्य, केदार हिमालय और पंच केदार , षोडस संस्कार क्यों, गढ़वाली -हिंदी व्याकरण, भाषा तत्व और आर्य भाषा का विकास,भारतीय जीवनदर्शन और कर्म का आदर्श, गीता ज्ञान तरंगिणी, 'मानव अधिकार के मूल तत्व ' आदि प्रमुख हैं।
       उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा वर्ष 2010-11 के लिये उन्हें ‘गुमानी पंत साहित्य सम्मान’, वर्ष 1997 में उमेश डोभाल स्मृति सम्मान, चन्द्र कुंवर बर्त्वाल स्मृति हिन्दी सेवा सम्मान - 2005, उत्तराखण्ड सैनिक शिरोमणी सम्मान - 2008, गोपेश्वर में पहाड़ सम्मान, चमोली जिला पत्रकार परिषद द्वारा स्व. रामप्रसाद बहुगुणा स्मृति पुरस्कार, साहित्य विद्या वारिधि सम्मान सहित उन्हें अन्य कई संगठनों/संस्थाओं द्वारा समय -समय पर सम्मानित किया गया ।
         गढ़वाली साहित्य के उन्नयन में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है । अखिल गढ़वाल सभा देहरादून के सौजन्य से स्व. भगवती प्रसाद नौटियाल जी के प्रबंध संयोजन में संस्कृति विभाग, उत्तराखंड द्वारा सन -2014 में प्रकाशित' गढ़वाली-हिन्दी-अंग्रेजी ' शब्दकोश में 6000 से अधिक गढ़वाली शब्द देकर इस शब्दकोश निर्माण में उनकी अहम भूमिका रही।पहाड़ की वीरांगना तीलू रौतेली पर आधारित उनका गढ़वाली खण्डकाव्य ‘वीरबाला’, गढ़वाली गीतिकाव्य ‘माल घुघूती’ उनकी महत्वपूर्ण गढ़वाली रचनाएं हैं। गढ़वाली पाक्षिक समाचार पत्र 'उत्तराखंड खबरसार ' एवं गढ़वाली साप्ताहिक ' रंत रैबार ' में उनके बहुत सारगर्भित, शोधपरक गढ़वाली लेख छपे।
      वर्ष 2010 में प्रकाशित उनकी 'भाषा तत्व और आर्य भाषा का विकास' पुस्तक भाषा विज्ञान सम्बन्धी एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।यह पुस्तक भाषा के विकास के साथ -साथ हिंदी एवं गढ़वाली भाषा की उत्पति की नवीन अवस्थापनाओं को स्थापित करने में सफल रही है। जीवन के अंतिम दिनों में उनके द्वारा कुछ सृजित साहित्य अभी अप्रकाशित रह गया है।
       उनकी कमी जीवन में सदैव खलेगी। देश सेवा के बाद अपना सम्पूर्ण जीवन साहित्य की सेवा में लगाने वाले, साधक, समाज सेवी, हम सबके प्रेरणा श्रोत श्रद्धेय श्री शिवराज सिंह रावत नि:संग जी को मेरी एवं आखर समिति की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि एवं शत -शत नमन। ईश्वर उनकी पुण्य आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे एवं उनके परिवार को इस बड़ी वेदना को सहने की शक्ति दे। ॐ शांति, शांति 🙏 🙏😭
                                          संदीप रावत
                                न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल।


Wednesday, May 26, 2021

" गढ़वाळि लिख्वार संदीप रावत दगड़ा सुशील पोखरियाल जी कि छ्वीं - बत्थ "

"साहित्यकार संदीप रावत जी दगड़ा सुशील पोखरियाल जी कि छ्वीं - बत्थ"
🙏🌹✍️🤔🌅✍️🌳🌹🌥️✍️🌻🙏
सु.पु. --  गढ़वळि साहित्य जात्रा की सुर्वात आपल कब कर कन करि ?
सं.रा. --  बाळपन बटि गढ़वाळि गीत भला लगदा छायि, पुराणा - पुराणा गीत लगांदु छायि अर कबि - कबि त अपणा आप गीत मिसाणै कोसिस बि कर्दु छायि। जब मि दर्जा 8 मा रै होलु त मिन एक गीत लिखी छौ - " कन लोग रैना वो जो मातमा छायि, तपस्या कैरिक बि वो दुनियाम नि रायि। एक दिन हमुन बि दुनिया से चली जाण, धन - दौलत सब कुछ यखि छोड़ि जाण।" इन इन्नि कैरिक सुर्वात ह्वे। गढ़वाळि गद्य मा लिखणौ सुर्वात आदरणीय विमल नेगी जी का सम्पादन मा पौड़ी बटि छप्येण वळा गढ़वाळि साप्ताहिक समाचार पत्र 'उत्तराखंड खबरसार' अर आदरणीय ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी का सम्पादन मा छप्येण वळा गढ़वाळि साप्ताहिक समाचार पत्र 'रंत रैबार' से 2009 का वार ध्वार ह्वे। जादातर लेख मेरा गढ़वाळि भाषा साहित्य सम्बन्धी होन्दा छायि।
सु.पु.--  आपल बाळपन की बात करि त इन बथावा कि आपौ प्रारम्भिक शिक्षा कख ह्वे अर उबारि प्राथमिक विद्यालयों को सजबिज कन छाइ ?
सं.रा.--  मिन आधारिक विद्यालय बटि दर्जा पांच पास करि। दर्जा दस तक मेरी पढ़ै-लिखै वेदीखाल मा हि ह्वे। दर्जा 2-3 बटि कापी, पेंसिल .... गुरजि लोगूं मार बि खांदा छायि। उठ - बैठ, पाणि सरणु, लखड़ा ल्याणु सब्बि धाणि होंदु छौ। प्राइमरी बटि हि भारि रौंस रांदि छै कि कब आलो पंदरा अगस्त अर छब्बीस जनवरी। कब लगौंलु मि गीत।
सु.पु.--  पाटी- ब्वळख्या बटि आज हम कंप्यूटर का युग मा एग्यों। बाळपन मा गीत लगाणै रौंस अर लगन बटि सुर्वात करि आज आप एक प्रतिष्ठित साहित्यकार छन। ईं साहित्यिक जात्रा मा आपल कै उकाळ - उंदार बि बोकि ह्वेली। कुछ वांका बारा मा .....
सं.रा.--  साधुवाद आपतैं। पर मि क्वी प्रतिष्ठित साहित्यकार नि छौं। अब्बि सिखणू, बिंगणू अर गुणणै कोसिस कनू छौं। सब्या वरिष्ठ अर अग्रज साहित्यकारों से भौत कुछ सिखणौ मिलि। कतगौं न अड्योणै कोसिस बि कैरी। कतगै दौं ज्यू - पराण खट्टो बि ह्वे, पर जात्रा जारी रै। लेखन अर रचनौ मा परिपक्वता त पढ़ण - लिखण से ही आंद।
सु.पु.--  कतगा इ वरिष्ठ लिख्वार ब्वलदन कि गढ़वाली भाषा मा किताब त भौत छपेणी छन पर गुणवत्ता कम च। अर कुछ ब्वलदन कि चलो ल्यखणा त छैं छन। आप क्य स्वचदन ?
स.रा.--  सब्यूं का अपणा - अपणा मत छन। अब्बि संग्ति लिख्येणू भौत जरूरी छ, गद्य अर पद्य द्विया विधाओं मा। बाद मा बगत का दगड़ि छंटणी अपणा आप ह्वे जाली। अब्बि 80 - 85% लिख्वार कविता पर ही पिलच्यां छन। नै छ्वाळि को रुझान गद्य की तर्फां कम च।
सु.पु.--  उत्तराखंड मा अर वांसे भैर बि अनेक संस्था कवि सम्मेलन अर गीत - संगीत का कार्यक्रम उर्याणी छन। यांका बावजूद बि शहरों अर गौं का कस्बा - बाजारों मा नै छ्वाळि गढ़वळि मा बच्याण से परहेज़ कनी च। क्य बात ह्वेली ?
सं.रा.--  संस्था अपणि - अपणि तर्फां बटि काम त कनीं छन, पर बाजि - बाजि दौं त खानापूर्ति सि बि नजर आंद। जब तक धरातल परै काम नि करे जालु; आम लोग अपणि मातृभाषा का प्रति हीन भावना नि छ्वाड़ला; भाषा रोजगार से नि ज्वड़े जालि, तब तलक चुनौती त छैंयी छन। कै बि भाषौ व्यावहारिक पक्ष महत्वपूर्ण होंद। भाषा की भल्यार अर संवर्द्धन का वास्ता ब्वलदरा, बिंगदरा, लिखदरा अर पढ़दरा बि चैंणा छन।
सु.पु.--  रावत जी, आप लगातार लेखन से  गढ़वळि साहित्य भण्डार की जै बिरदि कना छौ। अबि तलक आपकि पांच पोथि प्रकाशित ह्वेगिन। कुछ वूंका बारा मा बि प्रकाश डाला।
सं.रा.--  मेरि पैलि गढ़वाळि पुस्तक 'एक लपाग' कविता - गीत संग्रै का रूप मा सन् 2013 मा छप्ये। फिर मिन 192 पेज की एक गढ़वाळि गद्य की पुस्तक 'गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा' लेखि, ज्वा सन् 2014 मा प्रकाशित ह्वे। ईं किताब मा समग्र रूप से गढ़वाली भाषा मा गद्य - पद्य, सब्बि विधाओं जनकि भाषा - विज्ञान, अनुवाद, काव्य, कथा, व्यंग्य, निबंध, नाटक, उपन्यास, व्यंग्य चित्र, चिट्ठी पतरि, समालोचना, गढ़वाळि समाचार पत्र - पत्रिकौं कु इतिहास इकबटोळ करने कोसिस कर्यीं छ। 
सन् 2016 मा 'लोक का बाना' (गढ़वाली आलेख संग्रह) प्रकाशित ह्वे। जै मा लोक संस्कृति सम्बन्धी आलेख छन। मेरी चौथि गढ़वाळि पोथि 'उदरोळ' (गढ़वाली कथा संग्रह) सन् ,2017 मा छप्ये। जैमा लोक समाज की छ्वट्टि - छ्वट्टि 34 गढ़वाळि कथा छन। अर पांचवीं किताब 'तू हिटदि जा' (गढ़वाली गीत संग्रै) 2019 मा प्रकाशित ह्वे।
सु.पु.-- गढ़वळि भाषा का आप एक कर्मठ अर सक्रिय लिख्वार छन। आशा कर्दौं कि अगनै बि गढ़वळि साहित्य भंडार मा अग्याळ देणा रैल्या। अब एक आम शिकैत लिख्वारों की या बि रैंद कि अपणि गैड़ि पैंसा खर्च करि किताब छपवाओ, फिर सप्रेम भेंट कारों। वांका बावजूद बि लोग नि पढ़दा। किताब बिकणि नि छन। क्य ब्वन च्हेल्या ?
सं.रा.--  कतगै दौं इन द्यखण अर सुणणा मा बि आयि कि गढ़वळि भाषा का लिख्वार हि एक हैंका लिख्यूं नि पढ़णा छन; आम पाठक त भौत दूरै छ्वीं‌ छन। गढ़वळि साहित्य की वितरण व्यवस्था बि अबि ठिक ढंग से नि ह्वे सकणी छ। लिख्वारों का घर मा हि चट्टा लग्यां‌ छन अपणि किताब्यूं का। कुछ - कुछ जगा मेळा - थौळों, साहित्यिक कार्यक्रमों मा गढ़वाळि साहित्य का स्टाल लगणा छन, य एक अनुकरणीय पहल छ। पर आज यांसे बि बढिक काम कन्नै जर्वत छ। सब्बि सम्पादक, प्रकाशक अर लिख्वार आपस मा मिलिक तैं क्वी कारगर योजना बणै सक्दन। , जांसे गढ़वाळि साहित्यौ प्रचार - प्रसार हो अर आम लोगूं की पौंच मा बि किताब होवुन।
सु.पु.--  गढ़वळि भाषा का प्रचार - प्रसार मा सोशल मीडिया की भूमिका का बारा मा आप क्य स्वचदन ?
सं.रा.--  भाषा का प्रचार - प्रसार मा सोशल मीडिया आज बड़ी भूमिका निभौणू छ। स्थापित साहित्यकारों का दगड़ा - दगड़ नया लिख्वारों का वास्ता बि यो एक अच्छो अर बड़ो मंच साबित होणू छ। लोग यूट्यूब अर फेसबुक मा कविता - गीतों का वीडियो द्यखणा छन, चर्चा - परिचर्चा, कवि सम्मेलन मा साहित्यकारों तैं लाइव द्यखणा छन। अमेजन, फ्लिपकार्ट, गूगल, ई बुक पर गढ़वाळि किताब बि मिलि जाणी छन। गूगल पर एक क्लिक का माध्यम से कतगै साहित्यकार अर वूंको काम समणि ए जांद।
सु.पु.-- गढ़वळि भाषा का नै लिख्वारु तैं आप क्य रैबार दींण च्हेल्या ?
सं.रा.--  नै छ्वाळि का जादातर लिखदरा बस लिखण परैं हि लग्यां छन, पढ़णा कम छन। रचनौं मा मीनत जरूरी छ, मौलिकता जरूरी छ। नै - नै विषयों पर बि लिखणै कोसिस कन्न चैंद। शार्टकट अर नकल से बचण प्वाड़लो। पद्य का दगड़ा गद्य परैं बि नै लिख्वारौं तैं ध्यान द्येण चैंद।
                ******************
                                   ...सुशील पोखरियाल।
         (रंत रैबार,अंक 24 मई 2021मा प्रकाशित )