मेरी प्रकाशित पुस्तकें :-


(1) एक लपाग ( गढ़वाली कविता-गीत संग्रह)- समय साक्ष्य, (2) गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा (गढ़वाली भाषा साहित्य का ऐतिहासिक क्रम )-संदर्भ एवं शोधपरक पुस्तक - विन्सर प्रकाशन, (3) लोक का बाना (गढ़वाली आलेख संग्रह )- समय साक्ष्य, (4) उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह )- उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ


Thursday, January 7, 2021

* स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर शास्त्री "प्रमुख "जी की पुण्यतिथि (07 जनवरी) पर " उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित *


*स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर शास्त्री "प्रमुख "जी की पुण्यतिथि(07 जनवरी) पर "सम्मान समारोह "का आयोजन* 

      दिवंगत प्रसिद्ध समाजसेवी, कर्म निष्ठ एवं लगभग 27 साल तक निरंतर कोट ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रहने वाले स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर "प्रमुख "जी की पुण्य तिथि (07 जनवरी ) पर श्रीनगर गढ़वाल में (अंजलि मेडिकल के ऊपर शगुन वेडिंग पॉइंट में )हिलांस" व "देवप्रयाग प्रकाश पुंज" सामाजिक संस्था द्वारा एक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। साथ ही स्व. बाबुलकर जी के चित्र पर माल्यार्पण कर सभी के द्वारा पुष्पांजली एवं श्रद्धांजलि दी गई।  स्व. बाबुलकर 
  जी की धर्मपत्नी श्रीमती चंद्रकांता डबराल बाबुलकर जी ने स्मृति चिह्न प्रदान किए। 
       इस कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विष्णु दत्त कुकरेती जी ने की। विशिष्ट अथिति के रूप में गंगा आरती, श्रीनगर के अध्यक्ष श्री प्रेम बल्लभ नैथानी जी, प्रसिद्ध समाज सेवी श्री अनिल स्वामी जी, प्रसिद्ध आंदोलनकारी  श्री मदन मोहन नौटियाल जी की गरिमामयी उपस्थिति थी। इस अवसर पर  श्री सुभाष चंद्र भट्ट जी, 'आखर ' के अध्यक्ष संदीप रावत, स्व.अनिल काला जी की पत्नी एवं शिक्षिका श्रीमती अनीता काला जी आदि ने भी विचार व्यक्त किए। इस सम्मान समारोह में श्री मुकेश काला जी, स्व. बाबुलकर जी के सुपुत्र श्री आदित्य नारायण बाबुलकर जी एवं 
श्री सुधाकर बाबुलकर जी , श्री मदन लाल  डंगवाल जी, डॉ. सुभाष पांडेय जी, शगुन टैण्ट   हॉउस व शगुन रेस्टोरेंट के श्री उनियाल जी,  श्री राकेश पालीवाल जी  , श्री जय बल्लभ ध्यानी जी  , बैंक ऑफ़ इंडिया के मैनेजर - श्री यमुना प्रसाद डोभाल जी आदि की गरिमामयी उपस्थिति रही। 
      इस सम्मान समारोह में 2020 की इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा में बहुत ही  अच्छा प्रदर्शन  करने के लिए छात्र सिद्धांत कोटियाल व अभिसार काला को सम्मानित किया गया । साथ ही प्रसिद्ध समाज सेवी श्रद्धेय श्री अनिल स्वामी जी एवं प्रसिद्ध आंदोलनकारी श्रद्धेय श्री मदन मोहन नौटियाल जी को भी  सम्मानित किया गया। 
        कार्यक्रम का संचालन स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर "प्रमुख "जी के सुपुत्र पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष श्री प्रभाकर जी ने किया।
          
       स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर "शास्त्री " जी 25 साल की उम्र में   कोट ब्लॉक के  प्रमुख बन गए थे  और 26 - 27 साल तक लगातार वहां के   ब्लाक प्रमुख रहे। (1962 से 1988 तक हुए कोर्ट ब्लॉक की प्रमुख रहे) और उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। उनकी जन्मस्थली एवं कर्मस्थली दोनों ही माता सीता जी के स्थान हैं जो कि दिव्य स्थान हैं। स्व.सुन्दर लाल बाबुल कर जी वर्ष 1960 में अपनी ग्राम सभा मुछीयाली (कोट ब्लॉक ) गांव के प्रधान बने और वर्ष 1962 में जब पहला पंचायत चुनाव हुआ तो वे कोर्ट ब्लॉक के प्रमुख पहली बार में ही चुने गए। कहा जा सकता है कि वे कोट ब्लॉक के प्रथम प्रमुख थे और वर्ष 1988 तक ब्लॉक प्रमुख रहे। स्व. बाबुल कर जी स्व.हेमवती नंदन बहुगुणा जी के निकटस्थ लोगों में से थे। ज्ञातव्य है कि स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर जी उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध दिवंगत साहित्यकार स्व.मोहनलाल बाबुलकर जी के बड़े भाई थे। 
       स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर जी सदस्य -जिला परिषद पौड़ी गढ़वाल, सदस्य- श्री बद्रीनाथ /केदारनाथ मंदिर समिति, सदस्य- गढ़वाल विश्वविद्यालय स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति, सदस्य- इंजीनियरिंग कॉलेज घुड़दौडी, सदस्य- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, अध्यक्ष - स्वास्थ्य समिति जिला परिषद पौड़ी गढ़वाल, अध्यक्ष- जनता इंटर कॉलेज भल्ले गांव एवं देहलचौरी, अध्यक्ष- श्री रघुनाथ कीर्ति आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, प्रबंधन समिति देवप्रयाग रहे। 
          कर्मयोगी, स्पष्टवादी, संयमी दिवंगत विभूति सुन्दरलाल बाबुलकर "  "जी को विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत -शत नमन। 🙏🙏🙏🙏               
                                     संदीप रावत 
                               अध्यक्ष - आखर समिति 
                               न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल। 

Wednesday, January 6, 2021

"लोक का बाना" पुस्तक बटि आलेख-- " लोक बटि हर्चदा जाणू छ लोक साहित्य "©संदीप रावत,न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाळ, मोबैल 09720752367

 " लोक बटि हर्चदा जाणू छ लोक साहित्य "
                    ©संदीप रावत, न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाळ
                                         
      कै बि समाज, क्षेत्र, जाति या देशा जीवन मा लोक साहित्य अर लोक संस्कृत्यो बड़ो महत्व होंद। एक तरौं  यो कै समाजै लोक जीवना बारा मा बतौंदन।   लोकसाहित्यै क्वी निश्चित परिभाषा देण कठिन छ। लोक  को सम्बन्ध आत्मिक होंद अर यो प्रकृति से प्रभावित होंद। अगर लोक बटि प्रकृति तैं हटै द्यूंला त साहित्य अर लोकसाहित्य मा हम फर्क नि करी सकदां। लोक साहित्य लोकमानस कि सहज अर स्वाभाविक अभिव्यक्ति होंद। ये मा दिखलौट बिल्कुल बि नि होंद। यो अलिखित होंद अर अपणि मौखिक या वाचिक परम्परा से एक पीढ़ि बटि हैंका पीढ़ि  मा जाणो रैंद। यु मन्ये जांद कि लोक साहित्य का रचनाकार अज्ञात होंदन।
     मोहनलाल बाबुलकर जीक् अनुसार- ‘लोक कि वु सब्या अभिव्यक्ति जौं मा लोक रचना शक्ति का दर्शन होंदन वु लोक साहित्य  छ।’ वास्तौ मा लोक साहित्य वा मौखिक अभिव्यक्ति छ क्वी न क्वी मनखी रचद,गढ़द पर वे तैं आम लोक समूह अपणु समझद किलैकि वो लोक हृदय मा रचि- बस जांद।  लोक साहित्य कि क्वी एक निश्चित विधा नि होंदि , यो त आचार- बिचार, लोकोक्ति, लोककथा,लोकगाथा, लोक गीत्वूं का  रूप मा एक पीढ़ि बटि हैंकि पीढ़ि मा जाणी रांद।
       प्रसिद्ध समालोचक अर साहित्यकार भगवती प्रसाद नौटियाल जीक् अनुसार-
‘‘लोकसाहित्य कि वास्तविक जैड़  लोक संस्कृत्या भितर होंद। लोक साहित्य केवल साहित्य नी बल्कि यांका अलौ धर्म, इत्यास , समाजशास्त्र,पुराण,आख्यान यानि सब्या कुछ यांका भितर छिप्यूं होंद।  लोकसाहित्य लोकसांस्कृतिक वैविध्य को समग्र रूप छ अर यो लोकजीवन को ऐना होंद।’’
लोकसाहित्य कख्या बि हो ,वो समृद्ध होंद अर वेकि अपणी सक्या होंद। हमारो लोक साहित्य बि भौत समृद्ध छ अर येको भण्डार झक्क भ्वर्यूं छ। लोकसाहित्य मा सब्या भावना, खुद को चित्रण, प्रकृति को चित्रण, लोककथा, लोकगाथा-जागर, पवाड़ा, लोक गीत, आणा-पखाणा,भ्वीणा-मैणा, जंत्र-तंत्र, लोक आस्था, सब्या कुछ ऐ जांद। पर लोकसाहित्यौ काम  केवल लोकगीत ,लोककथा या कहावतों तें इकबटोळ कन्न नि होंद बल्कि या त् आदिकाल बटि अनन्त काल तक मनख्यूं कि जीवन जात्राम् संग्ति ब्वगणी वळी धारा छ। लोक साहित्य कि या विशेषता छ कि भाषागत अलग-अलग होण पर्बि भावों कि नजर से सब्या जगौं या एक जन लगद । लोकसाहित्यम् खराब, बुरो अर अमंगल का वास्ता क्वी जगा नी।
      इतिहासकार डाॅ0शिवप्रसाद नैथानीक् अनुसार-‘‘ लोक साहित्य अर लोकसंस्कृति मा ब्वे अर औलादौ रिश्ता होंद।जन औलाद अपणी ब्वे कि बोली याने मातृभाषौ पैलो शब्द सुण्द या सिख्द,ये ही तरौं से साहित्य अपणा जल्मदै ही सबसे पैलि अपणि लोक संस्कृत्यौ परिचय द्येण चांद। पैलि लोक साहित्य वाचिक होंदु छौ,फिर पढ़ेण बैठि अर आज त सुणण अर द्यखणै चीज ह्वेग्ये। देव सिंह पोखरिया भाषा संस्थान उत्तराखण्ड कि शोध पत्रिका ‘उद् गाथा-2010’ मा अपणा लेख मा लिखदन कि-‘‘ लोक साहित्य लोक धर्म तैं दगड़ा लेकि चल्द। जो जंत्र-मंत्र ब्वल्ये जांदा छा पैलि त वां से बिमार आदिम बि ठिक ह्वे जांदो छौ, इथगा शक्ति होंदि छै लोकमंत्रों मा।’’  उत्तराखण्डा उंचा-निसा पयार, पहाड़ै चुलंखी अर नीस गाड-गदिन्या गैरी घाटि, धारा-पंद्यरा,रौंत्येळा डांडा-कांठा,चखुल्यों  च्वींच्याट, सुकेली हव्वा,यखै लैरी-खैरी हमारा जीवन तैं एक अलग द्यखणौ देंदन। अप्रत्यक्ष रूप मा यो सब हमारा जीवन मा समोदर जन गैरै अर धर्ति जन धीरज देंदन, टक्क लगैकि मीनत अर काम कन्नै सक्या देंदन। यखै लोक साहित्य अर परम्परा ये पहाड़ी समाज मा ही ज्यूंदो रैंद, कखि दूर गौं-गौळौंम् ज्यूंदो रैंद। हमारा जीवन कि सब्या अभिव्यक्ति लोकगीत ,लोककथौं या कहावतोंक् रूप मा बिकसित ह्वेनि अर यों से ही फिर हमारि लोक परम्परा, रीति रिवाज बणीन। लोक मा भौत कुछ छिप्यूं या दब्यूं
रैंद,फ्वळ्यूं रैंद पर अब आम लोग पहाड़ बटि स्यकंुद यानि सैर-बजारों तर्फां सटगणा छन त इलै लोक बि हर्चदा जाणू छ अर लोक साहित्य बि  कम होंदा जाणू छ। लोक साहित्य कखि दूर पहाड़ों   अर वख बस्यां गौंम् उपजि,जख मनखीन् भेळ-भंकार अर पाखा द्यखनी, डांग या ढुंगो जन कठोर जमीन मा अभौ का बीच बि हैंसदा-हैंसदा केवल ज्यूंदो नि रै बल्कि जीवन तैं भली कैरिक् जीणो सीख। वख ही लोकरंग,लोक साहित्य अर लोकसंस्कृति को जन्म व्हे । लोक साहित्य पैलि आम लोख्वूं जीवन मा ज्यूंदो छौ,रैंदो छौ,फ्वल्यूं छौ। जन जन समौ बदल्य हर्बि-हर्बि लोकसाहित्य बि कम होंदा ग्ये। आज लोकसाहित्य पढ्येणू छ, दिखाये जाणू छ पर आज यो लोक बटि हर्चदा जाणू छ। अबारि लोक साहित्य बस कखि-कखि ही दूर गौं-गळों  मा जयूंदो छ।
    यो  सब्या जणदन कि गीत,साहित्य कि सर्वव्यापी विधा छ अर गीत लोख्वूं बीच जल्दी प्रचारित-प्रसारित ह्वे जांदिन। इन्नि लोकगीत धर्तीक् उपज होंदन अर यों मा पूरो लोक समाजौ योगदान होंद। यो लोकजीवन मा जल्दी ही प्रचारित ह्वे जांदा छा अर लोकप्रिय बि। हमारा लोक कि सबसे बड़ी खासियत या छ कि-येको हृदय मयळु छ,प्राण क्वांसो छ, यखै धर्ति गीत लगौंद,गाड-गदेरा सब गीत लगौंदन एक तरौं से। लोकमानस कि पीड़ा,यकुलांस,विरह-वेदना,अभौ लोक गीत्वूं रूप मा भैर  ऐनि, उपजिन। यांका बारा मा त हमारा यख प्वथडा़ का प्वथड़ा भ्वर्यां छन,साहित्यकारोंक् बिज्यां लेख्यूं छ लोकगीत्वूं बारा मा। आज यो चिन्ता को विषय छ कि अब लोकगीत्वूं स्वरूप बि बदलेणू छ, लोकगीत
आज अपणा मूल स्वरूप मा नि छन। डाॅ राजेश्वर प्रसाद उनियाल को ब्वन छ कि-‘‘ जब लोकगीत लिखित रूप मा  सामणि औंद अर छपेंद त वेको मूल स्वरूप यानि मौखिक रूप मा थ्वड़ा भौत बदलौ ऐ जांद अर कतिबेर त वेको मूलस्वरूप ही हर्चि जांद। जब अलग-अलग लोग लोकगीत्वूं तैं इकबटोळ कर्दन अर  लिप्यांकन कर्दन त या त लोकगीत अपणा पूर्ण रूप मा नि होंद, अद्धा- अधूरो होंद अर आखरी बि नि होंद।वेको कारण यो छ कि लोकगीत्वूं तैं इकबटोळ कन्नौ टैम अलग-अलग होंद, अलग-अलग जगा होंदन अर जख बटि कै लोकगीतौ सूद-भेद लिये ग्ये वेको स्रोत क्या छ।’’ वास्तौ मा लोकगीत्वूं असली अर ज्यूंदो रूप त लोक मा  प्रवाहित   होणू रांद।
      उत्तराखण्ड का लोकसाहित्य तैं समृद्ध अर बिकसित कन्न मा यखा शिल्पकार भै-बन्धोंन् यानि औजी,धामी, जागरी,बेड़ा-बद्योंन् सबचुले ज्यादा योगदान दे। ऐक तरौं से यों तैं आशु कवि ब्वले जै सकेंद। समसामयिक विषयों पर दिल तैं घैल कन्न वळा,जिकुड़ी मा छपछपी लगौण वळा गीत्वूं कि रचना कन्न वळा सल्लि छा यो। यखै जादातर लोकोक्तियों-मुहावरों याने औखाणा-पखाणौं तैं बि यों ही लोख्वूंन बणैनी। लोक संगीत, लोकगाथा-जागर,पवाड़ा, अर लोकनृत्यों से यों को जुड़ होंदु छौ। ब्वल्ये जै सकेंद कि एक तरौं से  औजी,धामी, जागरी,बेड़ा-बद्योंक् वजौ से ही लोक साहित्य परम्पराओं मा ज्यंदी छै पण आजै समौ मा यों लोख्वूंन उपेक्षा कि वजौ से यों चीजों अर लोक वाद्यों से इक दूरी बणैयालि,यों परम्पराओं तैं छ्वडण पर लग्यां छन। या बि एक वजौ छ जां से हमारो लोक साहित्य बि हर्बि-हर्बि लोक बटि हर्चदा जाणू छ।
      जब लोक बचाणै बात होंद त लोक साहित्यक् सैंक-सम्भाल कन्नै छ्वीं-बत्थ बि होंदन। लोक साहित्य तैं बचैणा वास्ता वे तैं वाचिक परम्परा याने मौखिक परम्परा मा बि ज्यूंदो रखणो जरूरी छ,लोक मा ज्यूंदो रखणो जरूरी छ। केवल किताब्यूं ,आॅडियो-वीडियो सीडी या हौरि आधुनिक उपकरणों भितर समेटिक भौत ज्यादा  कुछ नि होण्या। सबसे पैली बात या छ कि लोकसाहित्य अर लोकसंस्कृति लोक भाषा माध्यम से ही ज्यूंदो रै सकद्।  लोक साहित्य तैं वेका वास्तविक रूप याने लोकम् अपणा मूल रूप मा ज्यूंदो रखण प्वाड़लो, तब जैकि ये कि अर परम्पराओं कि सार्थकता छ,यां से मयळदु अर संवेदनशील समाज बणलु।
लोकसाहित्य तैं सम्मान देणौ जर्वत छ अर अबारि ये तैं स्कूली पाठ्यक्रम मा बि रखणै भारी जर्वत छ ।
      जुगल किशोर पेटशाली भाषा संस्थान,देहरादून कि शोध पत्रिका ‘उद्गाथा-2011,अंक दो मा अपणा लेख- ‘उत्तराखण्ड के लोकसाहित्य की मौखिक परम्परा’ मा ठीक ही लिखदन कि-‘‘ लोकसाहित्य अर जो वेकि विधा छन वो इतगा जीवंत छन कि वो हमारा लोक मा,समाज मा चाहे वो लोक  अब पलायना वजौ से शहर-बजारों मा बसीग्ये पर साख्यूं कि जात्रा बाद बि वो ज्यंूदी छन अर वो अनन्त काल तक लोकमानस का हृदय मा अनन्त काल तक ज्यूंदी रालि।’’ वास्तौ मा कालै उथल-पुथल बि यों तैं खत्म नि कैरी सक्दि। जादातर विद्वान ईं बात से सहमत छन कि - जै टैम पर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान नि छौ,तब बि समाज छौ अर वे टैम पर वे मा केवल लोकसाहित्य ही छौ जैमा आम मनखी अफुतैं द्यख्दो छौ, अपणि सब्बि गाणि-स्याण्यूं तैं वे मा रळै देंदो छौ। आज विज्ञानौ टैम छ अर अज्यूं बि लोक साहित्य कै ना कै रूप मा ज्यूंदो छ अर जब विज्ञान ऐंच टुक्क पर होलु अर वांका बाद पत्त भुय्यां प्वड़ण वळो होलु त तब बि लोक साहित्य कखि ना कखि ज्यूंदो रालो, यो कब्बि खत्म नि ह्वे सक्दु। 

नोट -  अपणि गढ़वाळि आलेखों  पुस्तक "लोक का बाना " बटि।  (पृष्ठ 74-78)
ये आलेख का क्वी बि अंश लेखक कि अनुमति बिना 
नि लिए जै सकदा। 
                   ©संदीप रावत, न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाळ
                    

Sunday, January 3, 2021

मनखि अर प्रकृति कि रुमैलि दुन्या का उमैला सम्बन्धों कि कथा च "औगार "(कथाकार -महेशानन्द ) -----समीक्षक ©गीतेश सिंह नेगी, सूरत, गुजरात।

मनखि अर प्रकृति कि रुमैलि दुन्या का उमैला सम्बन्धों  कि कथा च "औगार "

                          --गीतेश सिंह नेगी

पहाडै लोकजीवन मा फ्योंली भौत खास च । अजर अमर रिस्ता च फ्योंली अर पहाड़ौ । बिगैर पाड़ै फ्योंली अर बिगैर फ्योंली पाड़ै गाणि अर खूबसूरती द्वी अद्धा अधूरी सी लग्दिन । फ्योंली सिरप एक फूल नि, हमर लोकै एक भौत ही लोकप्रिय कथै एक चिंंतौलि नायिका बि च फ्योंली जैंतैं केंद्र मा रखी तैं 'औगार' जन्न बेजोड़ कथा रची फ्योंली जन्न कुंगला अर उमैला मनै चिंतौंला लिख्वार, गढ़वाळि का जण्या मण्या कथाकार महेशानंद जीन ।

'औगार ' कथा का खास चरित्र गोबिन्दु अर फ्योंली छन। कथा मा कल्पनाशीलता देखण लेक च अर या कथा, कथाकारै बेजोड़ कल्पना शक्ति को परचौ बि दिन्द अर आखिर मा या कथा यथार्थ का धरातल परै बि अपड़ि पूरी सक्या दगड़ि खड़ी दिखेन्द।

' औगार ' कथा एक आम प्रवासी जीवनै यथार्थै धरातल परै पूरी संवेदना अर प्रेम दगडी अंग्वाल बोटि हिटणी छ जैमा कथै नायिका फ्योंली , नायक गोबिन्दु मा अपड़ि 'औगार' कन्नी च। असल मा या सिरप फ्योंली 'औगार' नि या फ्योंली नौ से सर्या पाड़ै 'औगार' च अर या औगार पहाड़ै हर वे हम जन्न ग़ोबिन्दु से च जु बालापन्न मा ही अपडा प्रेम ईं फ्योंली अर ये पाड़ बटि उन्दू जैकि दूर चली ग्ये। कथा मा ग़ोबिन्दु फ्योंली तैं खोजणु पर वा वे तैं कखि दिखेणी नि । वू फ्योंली तैं धै लगौन्द पर फ्योंली वे तैं नि दिखेन्दी किलैकि फ्योंली अपड़ि बरसों बटि हुँदा जाणी उपेक्षा से खींन्न च त वा ग़ोबिन्दु समणि नि औंदी वा वे तैं या बात बिंगौंण अर जिन्दगी कु एक खास सबक सिकौण चांदी । वा वे तैं इन्ना वुना धै मारिक अटगौंणी रैन्दी पर वेका कखि हत्थ नि औंदी । आखिर मा वा अपडा मनै 'औगार' ग़ोबिन्दु मा लगै दिन्द कि वा वे से दूर क्यो छ ? वू किलै नि भेंटे सकणा छन ? वा गोबिन्दु तैं सचै दगड़ि परचौ करान्द अर वे तैं अपड़ असल उमैला मुल्क , अपड़ि रुमैलि दुन्यम लेकि जांद। यखम कथाकारन प्रकृति कु जन्न सैंदिष्ट अर सुन्दर चित्रण करयूं छ वू अफ्फम बेजोड़ छ अर कथाकारै कलमैं सक्या अर शब्द रचणै कला को भल्ली कै परचौ दियूँ च ।

फ्योंली अर ईं रौंतेली रुमैलि धर्ती तैं भेंटेंकि ग़ोबिन्दु तैं वीन्का असीम सौन्दर्य का दर्शन हूंदीन वे तैं भारी रौंस लगदी। अब फ्योंली वेतैं अपडा सबन्धों की सम्लौंण दिलोंद की या ही वा जग्गा छ जख हमरि पैली भेंट ह्वे छाई या ही च तेरि असल धर्ती अगर ज्यू तू वीं स्वार्थ अर काजोल पाणि सी धर्ती तैं छोड़िक यख सदानि कु आ सकदी त मैं प्रेम मा त्वे खुणी त्यार आण परै बाटों पर मंदरी सी पसर्ये जौलू।

' ले ईं दा बि मिन दौ त्वे फर छोड़ी यालि। धाकनाधारि आंदी छै इख बौड़ी कि ना '

वेक बाद वा ग़ोबिन्दु हत्थ छोड़ि दिन्द। ग़ोबिन्दु तैं लग्गी जन्न वू गगराट कै उंद लमडुंणु हो ।

महेशानन्द जीक औगार कथा शुरवात मा एक प्रेम कथा की सी बाण दिखेन्द, फिर या एक खुदेड कथा जन्न ऐथिर बढ़द अर आखिर मा या पलायन पीड़ा से उपजीं कथा सी महसूस ह्वे सकद पर अगर कथा तैं पूरी तरां पढ़णा बाद अगर हम अफ्फु तैं पुछला कि ग़ोबिन्दु को छ ? फ्योंली को छ ? अर आखिर ग़ोबिन्दु अर फ्योंली कु आपस मा रिश्ता नाता सम्बन्ध क्या च ? त हम सै तरां से कथा तैं समझी सक्दो कथा का मनोविज्ञान तैं समझी सक्दोंं ।

कथा कु मनोविज्ञान बतोन्द कि औगार प्रकृति अर मनखि का प्रेम सम्बन्धों अर जन्म जन्म को दगडै अंग्वाल बोटदि,धै लगौंन्दी कथा च ज्वा मनखि अर प्रकृति का बीच बढ़दि दूरी फर वेका असल कारण पर मुख्य चरित्र फ्योंली मार्फत अपणी बात मुखर ह्वेकी रखद।

कथा मनखि तैं केवल समस्या नि बतोन्दी वे तैं अद्धबाटा मा नि छोड़दि बल्कि अपड़ि ईं उमैंली अर रुमैलि धर्ती दगड़ि अपडा जलड़ों दगड़ि जुड़णौ,जीवन मा अग्वाडी बढणौ बाटु बि बतोन्द। कुल मिलैकि मनखि अर प्रकृति का रुमैलि दुन्या का उमैला सम्बन्धो की कथा च औगार। पहाड़ से अपडा जलड़ों बटि कट्याँ- छिटग्याँ मनखि तैं अपडा जलड़ों परैंं बौड़िक आणा वास्ता फ्योंलीक धै लगौन्द कथा छ औगार ।

सवाल यो च कथा कु मुख्य पात्र ग़ोबिन्दु को च अर या फ्योंली को च ? म्यार देखणन हर वू मनखि जु अपडा जलडौं बटि कटे ग्याई वू ग़ोबिन्दु छ । मि तै लगद मि ग़ोबिन्दु छौ मि ही छौ ग़ोबिन्दु जैका सुपिन्यो मा रोज आन्द या निर्दयी फ्योंली । अर फ्योंली बणिक अपड़ि औगार मैमा लगान्द यू पाड। अगर मनै बात लिखूं त औगार ग़ोबिन्दु अर फ्योंली कथा नि या म्यारा,आपका अर पाड का अजर अमर सम्बन्धो की एक भौत ही भावुक अर कलकली कथा च । कथा का बीच मा जब ग़ोबिन्दु फ्योंली का हत्थ छोड़ी आसमान बटि लमडद अर हर्बी हर्बी वींतैं धै लगान्द ...

फ्योंली ! फ्योंली !! फ्योंली !!!
मि आणू छौं मे थै जग्वाळ ।

त इन्न सी लगद कि एक सुन्दर कथा कु कतगा मार्मिक अन्त हुण वलु च सैद,एक घड़ी आँखियूँ मा असधरि सी आ जांदीन पर ऐथिर पैढिक कथाकारै बेजोड़ कल्पनाशीलता अर असल सल्लीपन्नो परचौ मिलद जब दस वर्षों एक प्रवासी नौनु विक्की जैन गढ़वाळि कब्बी नि बोली वू। स्वीणा मा खुट्टा छिबणाणु,मुम्यांणु अर छुड़ी गढ़वाळि मा बुल्द -

'फ्योंली ! फ्योंली मि आणु छौं । मैं थैं जग्वाळ'

वेका नींद बिचलणा कुछ देर बात कथा कु अन्त मा जब विक्की अर वेका परिजन गौं जाणै बात फाइनल करदीं त ईं सब्बि बात बि अफ्फु साफ ह्वे जांद कि ग़ोबिन्दु को छाई अर फ्योंली को छाई ? ग़ोबिन्दु फ्योंली तैं क्यो धै लगाणु छाई अर फ्योंलीन वेकु हत्थ अपड़ि रुमैलि उमैली धर्ती मा लिजैकि छट्ट क्यो छोड़ि अर क्या शर्त रखी ? आखिर फ्योंली चाणी क्या छाई?

कथा का आखिर मा "माजी ! येल सच्ची गढ़वाळि बोली क्या?" जन्न लैन लिखींक कथाकारन एक जोरदार अर झन्नाटेदार सवाल वू सब्यूँक् वास्ता छोड़ि जु अपडा जलडौं बटि छटगेकि अपड़ि भाषा संस्कृति से बि छटग्ये, बिंगलै ग्यीं ।

'दूर बटि टिरेने किलक्वार अर धधडाटल सब्यूक् कंदुड फोड़ी देनी '

यू अंतिम पंक्तियों का दगड़ि कथाकारन अपड़ि लेखन क्षमता अर गढ़वाळि भाषा की शब्द सम्पदा द्वी को एक दा हौरि दमदार परचौ देकि ईं सुन्दर गढ़वाळि कथा को समापन कैरिक औगार कथा संग्रै की हौरि कथाओं तैं पढ़णै सप्रेम साधिकार न्यूतों दे ।

औगार अर फ्योंली लोककथौ कथानक भले एकसार ही छन , द्वी कथाओं मा भले ही वी अनुभव वी परिस्थिति अर वी शिक्षा छन पर फिर्बी औगार कथा मा कथाकारै बेजोड़ लेखन कला अर शब्द चित्रण शैली देखणौ मिलद दगड़ा दगड़ि गढ़वाळि भाषै हर्चदि शब्द सम्पदा अर सक्या द्वी सैंदिष्ट देखणो मिल्दीन।

लोककथा फ्योंली का अपडा जलड़ों बटि कटेकि सुख सुविधाओं वळा राजसी भोग विलास अर दिखलौटी दुन्या मा जाणै अर फिर खुदे खुदेकि घुटे घुटेकि अन्तै एक मार्मिक कथा च जैमा फ्योंली मोरणा बाद अपड़ि आखिरी इच्छा से धार मा समाधि दिए जांद अर फिर सर्या घाटी मा वा पिंगला फूल बणिक फैली जांद जबकि श्री महेशानन्द जीक औगार कथा फ्योंली का प्रेम का कारण अपडा जलडौं बटि छटग्याँँ एक प्रवासी परिवारे घर बौड़णै सुखद कथा छ। एक सुखांत कथा छ त एक मार्मिक अर दुखान्त कथा छ।

लोककथा की फ्योंली का अनुभव अर सीख औगार कथै फ्योंली अनुभव प्रेम रूप मा ग़ोबिन्दु तैं (हमतैं ) दिंद साफ साफ दिखेन्द। बोले जा सकद कि लोककथै फ्योंली चरित्रे तुलना मा औगार कथै फ्योंली जादा सशक्त ,प्रखर अर अनुभवी च वा लोककथै फ्योंली सी मासूम नि लगदि।

कथाकर गढ़वाळि भाषा शब्द सम्पदा का जणगुरु छन्न ,कलमैं बेजोड़ सल्लि छन्न । युंन अपडा शब्द शिल्पन औगार कथौ द्वी मुख्य चरित्र फ्योंली अर ग़ोबिन्दु तैं दमदार ढंग से उकर्युंं च ,संवाद असरदार छन अर कम शब्दों मा गैरि चोट करण वळा छन्न ,दुर्लभ शब्दों आणा पखाणो को भौत सुन्दर इस्तमाल हुयूँ छ। औगार कथा मा ग़ोबिन्दु अर फ्योंली की धधम धै का बीच ,लुकाच्वारी का बीच प्रकृति को जन्न सैंदिष्ट चित्र महेशानन्द जिकु खैंचियूँ छ वो दुर्लभ छ।
पौड़ी का वरिष्ठ गढ़वाळि साहित्यकार अर उत्तराखण्ड ख़बरसार का संपादक , श्री विमल नेगी जीक उक्ति कि 'वो अबि रतब्योणी कु सी गैणु छ जु औंण वळा समैमा हमतैं दिना सूरजा दरसन जरूर करालो' महेशानन्द जीक पैलो कथा संग्रै कि पैली कथा 'औगार' पैढिक एकदम सै लगद अर या कथा वूंंकी कलमे सक्या को शंखनाद करद साफ देखे सुणै बि जा सकद।

   गढ़वाळि कथा साहित्य प्रेमियूं वास्ता औगार कथा अर ये कथा संग्रै कि हौरि कथा बि पढ़ण अर ससम्मान संग्रै कैरिक धरण लैक छन।

     एक भाषा साहित्य प्रेमी रूप मा औगार कथा व हौरि कथाओं तैं आपै जग्वाळ रैली।

कथा - औगार
कथा संग्रै - औगार
कथाकार - श्री महेशानन्द
प्रकाशक - ख़बरसार प्रकाशन,पौड़ी
प्रकाशन वर्ष - 2013
कथाकार सम्पर्क सूत्र : 99274 03469

  आदरणीय श्री महेशानन्द जी अर सब्बि गढ़भाषा साहित्य प्रेमियूं तैं सादर शुभकामना दगड़ि।

©गीतेश सिंह नेगी, सूरत (गुजरात )

Saturday, January 2, 2021

कोटद्वार में "आखर संस्था" के अध्यक्ष व गढ़वाली साहित्य सेवी संदीप रावत को मिला "हिमाद्रि रत्न -वर्ष 2020 " सम्मान

**गढ़वाली भाषा -  साहित्य में दिए जा रहे योगदान  हेतु  आखर संस्था के अध्यक्ष एवं साहित्य सेवी संदीप रावत को   मिला  वर्ष 2020 का  "हिमाद्रि  रत्न "  सम्मान**
    
    कोटद्वार गढ़वाल की  वर्षों पुरानी एवं प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था "साहित्यांचल ",  द्वारा    गढ़वाली भाषा - साहित्य  के सम्बर्धन  हेतु किए जा रहे कार्यों को देखते हुए 
 आखर संस्था के अध्यक्ष व  गढ़वाली लेखक  संदीप रावत को   "हिमाद्रि  रत्न -वर्ष 2020 "सम्मान से नवाजा गया। यह सम्मान "स्व.सीताराम ढौंडियाल  " की स्मृति में प्रतिवर्ष दिया जाता है, जो कि विगत 23 वर्षों से निरन्तर सुप्रसिद्ध साहित्यकारों, समाज में विशिष्ट योगदान देने वालों को दिया जा रहा है। "हिमाद्रि रत्न सम्मान "की संचालिका डॉ. मनोरमा ढौंडियाल हैं। 
      यह सम्मान समारोह देवी मंदिर रोड, संगम रिसोर्ट, कोटद्वार मे  नए वर्ष के प्रथम दिवस यानि 01 जनवरी 2021 को आयोजित  हुआ  । सम्मान समारोह  का संचालन साहित्यकार श्री  चंद्र प्रकाश नैथानीने किया एवं  अर अध्यक्षता "साहित्यांचल साहित्यिक संस्था " के  वर्तमान अध्यक्ष   श्री एस. पी. कुकरेती ने की ।  
    इस अवसर पर "आखर "  के अध्यक्ष  संदीप रावत ने कहा कि - यह सम्मान गढ़वाली भाषा - साहित्य का सम्मान है ,  गढ़वाली भाषा -साहित्य को समर्पित "आखर " समिति का सम्मान है । संदीप रावत ने इस सम्मान हेतु डॉ. 
नन्दकिशोर ढौंडियाल , हिमाद्रि रत्न सम्मान की संचालिका डॉ. मनोरमा ढौंडियाल एवं साहित्यांचल साहित्यिक संस्था,  कोटद्वार  का आभार एवं  व्यक्त किया। 
     इस कार्यक्रम मे   वरिष्ठ साहित्यकार व  इतिहासकार डॉ . रणवीर सिंह चौहान  ,  साहित्यकार  डॉ. ख्यात सिंह चौहान , साहित्यांचल साहित्यिक संस्था के  संस्थापक सदस्य 91 वर्षीय   श्री चक्रधर प्रसाद कमलेश जी,   श्री जनार्दन  बुड़ाकोटी,  वरिष्ठ  साहित्यकार श्री अनुसूया प्रसाद डंगवाल , डॉ. श्रीविलास बुड़ाकोटी,  श्री  लल्लन   बुड़ाकोटी,  कवयित्री  रिद्धि भट्ट संगीता उनियाल , जयदीप उनियाल, मंजुल ढौंडियाल , हिमाद्रि प्रिंटिंग प्रेस के  मोहित रावत, कोटद्वार के संदीप रावत,  डॉ. नन्द किशोर ढौंडियाल के परिवारिक   सदस्यों के  साथ  कोटद्वार के अन्य प्रबुद्धजन व लेखक  उपस्थित थे। 
     इस अवसर पर डॉ. नन्द किशोर ढौंडियाल को भी उनकी सेवानिवृति पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। आखर के अध्यक्ष व गढ़वाली भाषा -साहित्य सेवी संदीप रावत ने अपने गुरु डॉ. नन्दकिशोर ढौंडियाल के हाथों से यह प्रतिष्ठित सम्मान ( हिमाद्रि रत्न ) प्राप्त होने पर खुद को बहुत गौरवान्वित महसूस किया। 

Sunday, December 27, 2020

Satire in Garhwali Poems by Sandeep Rawat -----Bhishma Kukreti Copyright © Bhishma Kukreti 24/4/2013

    Satire in Garhwali Poems by Sandeep Rawat


                                   Bhishma Kukreti
Copyright@ Bhishma Kukreti 24/4/2013


                    Sandeep Rawat is critics and poet of modern Garhwali literature.

Recently, Sandeep published his first Garhwali poetry collection ‘Ek Lapang’.

There are many satirical poems as Ultant, Vyvstha, Bhrastachar, Kab Ali bari , Ajkayalai halat,Ucchedi Bathaun, Kuttak, Cunau, Teen Bhai, March Fainal and many more in the collection.

 From the striking the culprit point of view, the Satirical Poems by Sandeep Rawat are sharp, middle and mild.  

 Sandeep is worried about the wrong happenings in the society as he dpicts that leech like worms are now stronger and are sucking the resources.

उलटंत  
 
गंडेळो  का सिंग पैना ह्वेगैनी 
जूंका का हडका कटगड़ा ह्वेगैनी  
 Sandeep shows his concern for the strong coalition between politics and administration for  looting India.
व्यवस्था
नेता अर अफसरों हाथ बिंडी खज्याणा छन
सरकर्या खजानों की
यूँ बांठी लगै खाणा छन
Sandeep is expert in using symbols for creating sharp satire
भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार
जन ल्वे को अंश ह्वेगे
Sandeep Rawat tactically uses animals as human beings for showing worsening India and is good example of personification in satirical poems.
कब आली बारी
कुकुर लग्यां छन पत्यला चटण पर
बिरळा  मिस्या छन थाळी  

अजक्यालै हालत
गळसट्या , गलादर अर चकडैत
आज संड मुसंड बण्या छन   
The poet uses symbols successfully for creating  desired images.
उछेदी बथों
मनखी आज उडणा छन
मनख्यात रखीं च ढुंगा मा

Most of Indians are aware that the government agencies do not spend money on developmental works till February but due to fear of not getting budget for next year, the government officials spend money on non developmental works to show the uses of budget.
मार्च फैनल
मार्च फैनल ऐग्ये भैजी 
मार्च फैनल ऐग्ये
सरकार बजट बल
सफाचट ह्वेगे 
Sandeep Rawat has been successful in ridiculing the wrongs.

 The poet is successful in showing the differences between incorrect and right through his satirical verses.

In his satirical poems, Rawat shows his concern for justice, morality and virtue.

Copyright@ Bhishma Kukreti 24/4/2013

---- Regards
Bhishma  Kukreti

Wednesday, December 23, 2020

"गढ़वाळि भाषा अर साहित्य की विकास जात्रा "एक उपादेय ग्रन्थ समीक्षक-- * डाॅ0 अचलानन्द जखमोला* (विन्सर पब्लिकेशन, देहरादून से वर्ष -2014 में प्रकाशित पुस्तक )


पुस्तक समीक्षा --
*गढ़वाळि भाषा अर  साहित्य की विकास जात्रा* एक उपादेय ग्रन्थ 
 *समीक्षक- डाॅ0 अचलानन्द जखमोला*
                 
                 अप्रितम अभिव्यंजनाशक्ति, प्रभावोत्पादकता, संप्रेषणीयता,   गूढ़ अर्थवता तथा अनेकार्थता को व्यक्त करने की अद्भुद क्षमता वाली गढ़वाली भाषा पुराकाल से ही अनेक विद्वतजनों के आकर्षण का केन्द्र बनी रही।
         सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘काव्यमीमांसा’ के रचयिता काश्मीर निवासी आचार्य राजशेखर ने गढ़वाल क्षेत्र के भ्रमण के दौरान यहां के निवासियों को ‘सानुनासिक भाषिणः’ तथा यहां की बोलियों में कृदन्तों का प्राधान्य दखते हुए इन्हें ‘कृतप्रिया उदीच्या’ घोषित किया था। इस भाषा की महत्ता को महापंडित राहुल सांकृत्यायन् तथा शीर्षस्थ भाषाविज्ञों यथा- डाॅ0 धीरेन्द्र वर्मा, डाॅ0उदय नारायण तिवारी, डाॅ0 हरदेव बाहरी, डाॅ0 भोलाशंकर व्यास, डाॅ0 टी0 एन0 दवे आदि ने स्वीकारते हुए अपनी मान्यताएं प्रस्तुत की। व्याकरणविद् पादरी एस0एस0 केलाॅग को गढ़वाली की रूपगत विशिष्टताओं ने मुख्यतः प्रभावित किया। ‘गढ़वालि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा ’के रचयिता श्री संदीप रावत मूलतः रसायन शास्त्र के अध्येयता और अध्यापक हैं। सौभाग्यवश उनका क्रियाक्षेत्र अधिकांशतः टिहरी, श्रीनगर और पौड़ी के समीपस्थ रहा है। स्मर्तव्य है कि श्रीनगर और टिहरी को दीर्घ अवधि तक गढ़वाल की राजधानी बनने का गौरव प्राप्त रहा। कालान्तर में यह श्रेय पौड़ी को भी मिला। बौद्धिक प्राचुर्य तथा सम्पर्क एंव साथ ही राजाश्रय की सुलभता से समस्त क्षेत्र की माटी साहित्यिक गतिविधियों के लिए उर्वरक सिद्ध हुई। स्वाभाविक था कि गढ़वाली की उत्कृष्ट प्रारंभिक रचनाएं इसी भू-भाग में पल्लवित और पुिष्पत हुईं। इस साहित्यिक बयार ने संदीप रावत के अन्तस में सुप्त रचनाकार को झंझावित किया। फलतः रसायन शास्त्री की लेखनी से उनका प्रथम काव्य संग्रह ‘एक लपाग’ उद्भूत हुआ, जिसका सर्वत्र स्वागत किया गया। ‘गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा’ उनकी द्वितीय गद्यमयी रचना है। क्योंकि पिछले दो-तीन दशकों से उत्तराखण्ड के साहित्य जगत में काव्य ग्रन्थों का सैलाब सा आ गया है। गद्य रचनाएं विरल ही मिलतीं हैं। गद्य ही भाषा का वास्तविक निकस याने कसौटी है-‘गद्य कवींना निकषं वदन्ति’ यह इस पुस्तक से सिद्ध हो जाता है।
       आकर्षक साज-सज्जा में संवरी 192 पृष्ठों की इस लुभावनी कृति की प्रभावी सामाग्री चार भागों में विभक्त है। प्रथम भाग गढ़वाली भाषा की विशिष्टताओं विषयक है। द्वितीय भाग में गढ़वाली भाषा के व्याकरण तथा भाषिक स्वरूप पर चर्चा है। पृष्ठ 69 से पृष्ठ 148 में समाहित तृतीय भाग ग्रंथ का महत्वपूर्ण अंश है जिसमें भाषा और साहित्य की विकास यात्रा सविस्तार एंव सोदाहरण वर्णित की गई है। अंतिम चतुर्थ अध्याय में गढ़वाली साहित्य की विधाओं एवं विशेषताओं का विवरण तथा मानकीकरण समबन्धी मान्यताओं का उल्लेख है। संक्षिप्ततः श्रमशील लेखक ने गढ़वालि भाषा तथा साहित्य के प्रायः सभी पक्षों पर पूर्व में किये गए अवदान का समाहार और एकीकरण प्रभावी शैली में करते हुए जिज्ञासु पाठकों के समक्ष एक उपादेय ग्रंथ प्रस्तुत किया है। पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य गढ़वालि भाषा के विकास और समग्र प्रकाशित साहित्य पर प्रकाश डालना है। इन पक्षों पर पूर्व में भी अनेक विद्वानों ने श्लाघनीय कार्य किया। गढ़वाली बोलियों के ऐतिहासिक, भाषिक, शास्त्रीय, तात्विक, वैज्ञानिक, व्याकरणिक तथा व्यावहारिक, पक्षों के प्रति स्वातंत्रत्योत्तर काल के उपरान्त ही कुछ अनुसंधित्सुओं का ध्यान आकर्षित हो गया था जिनमें गोविन्द सिंह कण्डारी याने गोविन्द चातक-रवांल्टी बोली का लोकसाहित्य, जनार्दन प्रसाद काला -गढ़वाली भाषा और उसका लोकसाहित्य तथा गुणानन्द जुयाल-मध्य पहाड़ी गढ़वाली, कुमाउंनी का अनुशीलन शोध प्रबन्ध प्रमुखतः उल्लेख्य हैं जिनपर डाॅक्टरेट की डिग्रियां प्रदान की गईं। सत्तर के दशक में उत्तर प्रदेश शासन के प्रयास से डाॅ0 हरि दत्त भट्ट शैलेश द्वारा रचित ‘गढ़वाली भाषा और उसका साहित्य’ तथा स्वप्रेरणा से निर्मित अबोध बहुगुणा रचित ‘गाड म्यटेकि गंगा’ अपनी गुणवत्ता और परिपूर्णता के कारण स्वागत योग्य बने। गोविन्द चातक जी का गढ़वाली भाषा और साहित्य के प्रति समर्पण अनेक गवेषणात्मक आलेखों के अतरिक्त उनकी प्रकाशित दो पुस्तकों -‘मध्य पहाड़ी की भाषिक परम्परा और हिन्दी’ तथा ‘हिमालयी भाषाःसामथ्र्य और संवेदना’ से पता चलता है। शोधपरक ग्रन्थों में अनिल इबराल प्रणीत ‘गढ़वाली गद्य परम्परा’ तथा जगदम्बा प्रसाद कोटनाला कृत ‘गढ़वाली काव्य का उद्भव, विकास और वैशिष्ट्य’ क्रमशः 2007 व 2011 मे प्रकाशित विशेष उल्लेखनीय हैं। इनके अलावा अन्य विद्वानों द्वारा दिए गए अवदान का विवरण इस पुस्तक में मिल जाता है।
      लेखक ने गढ़वालि भाषा-साहित्य की विकास यात्रा को सात कालखण्डों मे वर्गीकृत किया है। ‘काल’ अथवा ‘युग’ मे वर्गीकरण सामान्यतः ‘आदि’ अथवा ‘आधुनिक’ को छोड़कर, अधिकांश लेखकों ने उस कालावधि में रचित साहित्य की विशिष्ट प्रवृति या प्रकृति अथवा उस पर प्रभाव डालने वाले महान साहित्य रचयिता के नाम पर आधारित किया है, यथा-वीरगाथाकाल, भक्तिकाल, श्रृंगारकाल, भारतेन्दु युग, क्लासिकल सज, रोमांटिक सज, पांथरी युग, सिंह युग आदि-आदि। संदीप रावत द्वारा समस्त गढ़वाली साहित्य को 25-25 वर्षों के समूह में वर्गीकृत करने का सरल उपाय अपनाया है। समीक्षाधीन ग्रन्थ में भाषा के ऐतिहासिक विकास क्रम मे समाचार पत्र-पत्रिकाओं एवं ब्यंग्य चित्र, चिट्ठी पत्री, पर्चा पोस्टर, इलेक्टानिक मीडिया, चलचित्र, पुरस्कार, सम्मान आदि के महत्व को उल्लिखित करना एक स्तुत्य प्रयास है। पुस्तक के अन्त में भाग चार के अन्तर्गत गढ़वाली भाषा के अति चर्चित, घपरौळी व चुनौतीपूर्ण विषय-मानकीकरण पर विवरण है। अन्य 17 मनीषियों के विचार उद्धृत करने के पश्चात लेखक स्वयं इस अन्तहीन विवाद में न फंसते हुए शान्ति सहित निकल गए कि ‘मानकीकरण कि बात त बादै बात छ। ’फलतः पुस्तक में वर्तनी और विन्यास समबन्धी व्यतिक्रम कुछ स्थलों पर दिखाई देता है। समबन्ध कारक निर्दिष्ट करने के लिए गढ़वाली भाषिक प्रवृति के अनुसार कहीं स्वर परिवर्तन का आश्रय लिया गया जैसे-साहित्यै, भाषै, भाषौ, तो अन्यत्र परसर्गों का जैसे-साहित्यक, साहित्य कि, भाषा कि। वैसे व्याकरणिक दृष्टि से दोनों सही हैं। लेखक ने पूर्ण प्रयास किया है कि समस्त पुस्तक में वर्तनी समबन्धी एकरूपता का परिपालन हो तथापि थोड़ी सी भा्रन्तियां रह गईं हैं। उच्चारण का अनुसरण करते हुए पुस्तक में भी कई स्थलों पर उदारता से हल् याने हलन्त का प्रयोग है, जैसे-शैलेश जीन्, पोथिक् समाीक्षा कैरिक्, मणदन्, जणदन्, शब्दोंक्, नदियोंम्, भाषौन्, सकेंद् आदि आदि। मेरा विनम्र सुझाव है कि हल् चिह्न का प्रयोग संसुक्ताक्षर तथा केवल उन्हीं शब्दों तक सीमित रखा जाय जहां इसके बिना अर्थ में भ्रम उत्पन्न होने की सम्भावना हो।
        समग्रतः श्री संदीप रावत ने बड़े मनोयोग, निष्ठा और श्रमशीलता से पुस्तक की रचना की है। गढ़वाली भाषा, साहित्य तथा रचनाकारों सम्बन्धी विस्तीर्ण सागर को लेखक ने इस गागर में समाविष्ट कर दिया है। अत्यधिक प्रयास करने के उपरान्त भी सुधी पाठक को ऐसे न्यूनतम अंश मिलेंगे जिन्हें अनावश्यक समझ कर हटाया जा सके। महाभारत के सम्बन्ध में कहा गया है -‘यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नैहास्ति न तत् क्वचित़् ’ अर्थात जो इसमें उपलब्ध है वह अन्यत्र भी मिल सकता है परन्तु जो यहां नहीं है वह अन्य कहीं कदाचित ही मिलेगा। प्रस्तुत पुस्तक में अब तक के सभी साहितयकारों तथा कृतियों का विवरण प्रायः मिल जाता है, कोई विरला ही छूटा होगा। यह बति प्रश्ंसनीय प्रयास है। ऐसी संग्रहणीय एवं एवं उपादेय पुस्तक की रचना के लिए श्री संदीप रावत को हार्दिक बधाई ओर शुभांक्षसा। मैं उनके भावी साहित्यिक अवदान के लिए अभ्यर्थना करता हूँ । 
       पुस्तक - गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा
                                      लेखक- संदीप रावत
                                       मूल्य -  रु. 275 मात्र
                             प्रकाशक -  विनसर पब्लिकेशन,देहरादून
                              समीक्षक- डॉ0अचलानन्द जखमोला
नोट (1)-   सुप्रसिद्ध भाषाविद आदरणीय "डॉ.अचलान्द जखमोला  जी की  यह समीक्षा गढ़ जागर, शैलवाणी,  रिजनल रिपोर्टर ,चैनल माउंटेन आदि में प्रकाशित हुई । 
नोट (2)- पुस्तक प्राप्ति के स्थान -
   1- भट्ट ब्रदर्स देहरादून
   2- समय साक्ष्य देहरादून
   3- विन्सर पब्लिकेशन देहरादून
    4- ट्रांसमीडिया,श्रीनगर गढ़वाल (रेनबो पब्लिक स्कूल के सामने )
     5- जय अम्बे पुस्तक भण्डार ( अगस्त्यमुनि)
     6- रावत डिजिटल (Anoop Rawat ), इन्द्रापुरम, गाजियाबाद 
    7- संदीप रावत(मोबाइल -9411155059,   9720752367) श्रीनगर गढ़वाल

Tuesday, December 22, 2020

"मूर्धन्य लोक साहित्यकार डॉ. गोविन्द चातक जी कि जयन्ती(19 दिसंबर 2020) परैं वूं तै आखर समिति द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित " ------ संदीप रावत, न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल

श्रीनगर गढ़वाल : 
 "मूर्धन्य  लोक साहित्यकार डॉ. गोविन्द चातक जी कि जयन्ती परैं वूं तै " आखर " समिति द्वारा  श्रद्धांजलि अर्पित "
      मूर्धन्य लोक साहित्यकार डॉ. गोविन्द चातक जी कि जयन्ती परैं  19 दिसम्बर 2020 खुणी    " आखर " समिति का सदस्यों द्वारा स्थानीय  डालमिया धर्मशाला (बद्री -केदार धर्मशाला ), श्रीनगर गढ़वाल मा सूक्ष्म कार्यक्रम आयोजित कैरिक   वूं तै श्रद्धांजलि दिये गे । 
      ये सूक्ष्म कार्यक्रमै  सुर्वात डॉ. चातक जी  का चित्र परैं माल्यार्पण अर फूल पाति  चढ़ैकि ह्वे।   बैठक मा वक्ताओंन लोक साहित्य अर  गढ़वाळि साहित्य मा   "डॉ. चातक " जीक महत्वपूर्ण योगदान पर चर्चा करी  । "आखर "समिति का अध्यक्ष   संदीप रावतन  बोलि कि - "कोरोना  (कोविड -19)  वजौ से आज  19 दिसंबर 2020  खुणी   डॉ. गोविन्द चातक जी की जयन्ती परै  "आखर "समिति  द्वारा  श्रद्धांजलि स्वरूप ही यो सूक्ष्म  कार्यक्रम  होणु  छ।  "डॉ. गोविन्द चातक स्मृति  व्याख्यान माला अर सम्मान समारोह "  आयोजित कन्नू  संभव नी ह्वे  सकी ।  डॉ. गोविन्द चातक जी जन  विभूतियों तैं याद कर्ये जाण भौत जरूरी छ ,जौंन लोक साहित्य  अर गढ़वाळि साहित्य मा अपणो अमूल्य योगदान दे । 
      मुकेश काला जीन बोली कि - "  स्थिति सामान्य होंण परै  "आखर" द्वारा आयोजित समारोह /कार्यक्रम मा या जो बि उचित होलु   ये सालौ  आखर सम्मान यानि  "डॉ.गोविन्द चातक स्मृति आखर साहित्य सम्मान- वर्ष, 2020 " श्री ललित केशवान  जी तैं दिये जालु। आखर समिति कि तरफां बटी  सम्मानित होण वळा वरिष्ठ साहित्यकार  श्री ललित केशवान  जी तैं वूंन हार्दिक बधै  दे। मुकेश काला जीन यो बि  बोली कि - आखर समिति अपणा  हिसाबन  नई सोच का दगड़ा काम कन्नी च। वूंन आखर का उपस्थित सदस्यों आभार बि व्यक्त करी। 
     डॉ. गोविन्द चातक जी कि जयन्ती परैं  ये सूक्ष्म समारोह मा वूं तैं फूल पाति अर्पित कन्न वळों मा "आखर " समिति का   श्री मुकेश काला जी,  श्री  सौरभ बिष्ट जी, श्री संदीप रावत, मयंक पंवार जी, श्रीमती अंजना घिल्डीयाल जी,  श्रीमती अनीता काला जी , श्रीमती बविता थपलियाल  मैठाणी जी,. श्रीमती रेखा चमोली जी छा।  श्रीमती बवीता थपलियाल मैठाणी जीन ये अवसर परैं  लोकगीत बि सुणायि।  संचालन संदीप रावतन करी।