मेरी प्रकाशित पुस्तकें :-


(1) एक लपाग ( गढ़वाली कविता-गीत संग्रह)- समय साक्ष्य, (2) गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा (गढ़वाली भाषा साहित्य का ऐतिहासिक क्रम )-संदर्भ एवं शोधपरक पुस्तक - विन्सर प्रकाशन, (3) लोक का बाना (गढ़वाली आलेख संग्रह )- समय साक्ष्य, (4) उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह )- उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ


Friday, May 8, 2020

रचना - लोग © संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल

                         " लोग "
              
झूटी- सच्ची बुज्याड़ि जिकुड़ी धरदन लोग
मुखड़ी देखी सामणि  टुकड़ी डलदन लोग ।

हुणत्यळि डाळी का मौळंदा पात देखीक
झट्ट जलड़ौंम छांछ  संग्ती डलदन लोग ।

दूधौ-दूध ,  पाण्यो- पाणि द्यिख्येंद  सब्यूं
पिछनै बाघ सामणि बिराळि बणदन लोग ।

सब्बि जगौं क्वी बण्यां रौंदन भौत पर्वाण
हैंका  तैकम  झट्ट पक्वड़ी तलदन लोग ।

जणदा नी बल मंत्र द्येखा बिच्छी को
सर्प द्वलणी हत्थ  फिर्बी कुचदन लोग।

मिल्द जब हे स्याळ ददा वळो पट्टा "संदीप "
अफ्वी औतारी अफ्वी पुजारी बणदन लोग।
               © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

Saturday, April 11, 2020

रचना - आपदा की सीख © संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल

*आपदा की सीख*

अमीर हो या गरीब
राजा हो या रंक  ,
लड़ रहे हैं मिलके सब
" कोरोना" से  जंग ।
                ना, जात-पात का भेद काेई
                ना ,राजनीति का रंग ,
                गिरे, पड़े ,फिर हुए खड़े सब
                दिखे 'एका ' के रंग ।
गंगा निर्मल हो रही
पवन बह रही  मंद ,
दूर हो रही आज स्वयंम्
थी इनमें जो गंध ।
                       पशु-पक्षी भी कर रहे
                       अब ,विचरण स्वछ्न्द ,
                        सिखा रही ये 'आपदा '
                        फिर जीने के ढंग ।
मानव हैं बस! हम सभी
ना ,प्रभु के मानिन्द ,
नहीं है करना ,अब प्रकृति से
अति छेड़छाड़ ,छल-छन्द ।
                              'लालच' और 'ज़रूरत ' में
                              बस! अन्तर समझें हम ,
                              ना समझे,तो होगी ही
                              ये 'उछल-कूद ' सब बन्द ।

10/04/2020,                       © संदीप रावत
                                    न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल  ।

 

Wednesday, April 1, 2020

इक महान विभूति छायि श्रीरामचरित मानस जना महाकाव्य को गढ़वाळि अनुवाद कन्न वळा अर 17 किताब्यूं का रचयिता वरिष्ठ साहित्यकार बचन सिंह नेगी जी ©संदीप रावत

  *उत्तराखण्ड कि इक महान विभूति अर गढ़वाळि भाषा -साहित्य मा अनुवाद विधा का पुरोधा  छायि श्रद्धेय  बचन सिंह नेगी जी*
    (जलम  04 नवम्बर 1932 - भग्यान 21मार्च 2020 )
           हिन्दी अर गढ़वाळि  का  सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार , धार्मिक ग्रन्थों कु गढ़वाळि मा अनुवाद कन्न वळा  जण्या -मण्या  अनुवादकर्ता श्री बचन सिंह नेगी का दिवंगत होण गढ़वाळि भाषा-साहित्य का वास्ता इन क्षति छ जै कि भरपै कब्बि नि कर्ये जै सकेंद  | तबियत भौत खराब होणा  वजौ से 12 मार्च 2020 बटि स्व.बचन सिंह नेगी जी देहरादून इक अस्पताल (वेड मेड अस्पताल ) मा  ICU मा छायि अर वखि  21 मार्च 2020 खुणी  राति लगभग 9.35 परैं वूं को स्वर्गवास ह्वे ग्ये छौे |  22 मार्च खुणी लॉक डाउन की वजौ से 23 मार्च खुणी वूं कि अंत्येष्टि हरिद्वार मा ह्वे | पिछला चार  साल बटि  वूं कि तबियत खराब  छै | य सूचना  वूं का सुपुत्र  डॉ. विनोद सिंह नेगी जीन् संदीप रावत ( अध्यक्ष -आखर समिति) तैं  द्ये छै  | सोशल मीडिया का माध्यम से श्रीनगर बटि संदीप रावत   द्वारा  य सूचना हौरि लोगूं अर साहित्यकारों तैं द्यिये ग्ये |
        एक तपस्वी कि तरौं श्रद्धेय श्री बचन सिंह नेगी जी चुपचाप सदानि अपणि साहित्य साधना कन्ना रैनि | वूंन  पाँच बड़ा-बड़ा  धार्मिक ग्रन्थों को  गढ़वाळि मा अनुवाद करी  अर अपणा  संसाधनों से प्रकाशित कैरिक गढ़वाळि भाषा-साहित्य मा अपणो  अमूल्य अर ऐतिहासिक योगदान द्ये | गढ़वाळि अनुवाद साहित्य मा स्व.बचन सिंह नेगी जी का योगदान तैं कबि बि  अर कै बि तरौं से नि बिसर्ये जै सकेंद | गढ़वाळि कवितौं परैं बि वूंन कलम चलै |
      वूं को अपणि मातृभाषा गढ़वाळि भाषा का प्रति भौत ही ज्यादा पिरेम  वूं द्वारा लिख्यीं यों पंक्तियों से सिद्ध होंद---

"वेद पुराण उपनिषद रामैण ,बिटि सारलीक तुलसीन मथे
अपणा अन्तर तैं सुख देणक ,अवधी मा मानस ग्रन्थ रचे  |
वे ग्रंथ कि भाव मैं क्या समझू ,या नन्हि च चोंच छ सागर मा
गढ़वाल भूमिम जन्म लिने स्यु कथा लिखणू गढ़वाळि हि मा ||"
                            --- बचन सिंह नेगी
               श्रीरामचरित मानस (गढ़वाली भाषा ) बटि

           वूंन श्रीरामचरित मानस,महाभारत ग्रन्थसार, बाल्मीकि रामायण भाग-1 व भाग-2,श्रीमद्भगवतगीता,  ब्रह्म -सूत्र(वेदान्त दर्शन) जना बड़ा-बड़ा  धार्मिक ग्रन्थों को  अनुवाद करी  | यो गढ़वाळि अनुवाद, गढ़वाली भाषा-साहित्य का वास्ता अनमोल धरोहर छन  | वाकै मा इना कालजयी महाकाव्यों  को गढ़वाळि मा अनुवाद कन्नौ वास्ता साधना चयेंद , तपस्या चयेंद,भौत ज्यादा टैम चैंद  | वूं कि 12 हौरि  पुस्तक   प्रकाशित छन अर  कुल मिलैकि वूंकि  17 (सत्रह) पुस्तक प्रकाशित छन |    
         श्रद्धेय बचन सिंह नेगी जी को जलम  04 नवम्बर 1932 मा जिला-  टिहरी , सारज्यूला पट्टी का  बागी गौं  (भागीरथी पुरम  का नजीक) मा   ह्वे  छौ अर वूं को  स्वर्गवास   21मार्च 2020 खुणी देहरादून मा ह्वे ग्ये | वूंका छ्वट्टा छौंद यानि बाळपन मा हि  बचन सिंह नेगी जी का  पिताजि को स्वर्गवास ह्वे ग्ये छौ | सन् 1950 मा प्रताप इण्टर कॉलेज (टिहरी) बटि वूंन इण्टर करि छौ | सन् 1952 मा डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून बटि बी.ए.करि अर साहित्य रत्न ,प्रयाग यानि इलाहाबाद बटि करी |  सरकारी नौकरी परैं वु सन् 1954 मा  कृषि विभाग मा श्रद्धेय बचन सिंह नेगी जी कि नियुक्ति ह्ले छै अर वु सन् 1990 मा जिला परिषद का  अपर मुख्य अधिकारी पद बटि रिटैर ह्वेनि  |
           गढ़वाळि भाषा-साहित्य तैं समर्पित  "आखर" समिति(श्रीनगर गढ़वाल) का वास्ता य गौरव कि बात रै कि- डॉ.गोविन्द चातक जी कि जयन्ती परैं (19 दिसम्बर 2019)गढ़वाळि साहित्य मा अपणो अमूल्य योगदान द्येणा वास्ता   स्व. बचन सिंह नेगी जी तैं श्री मोहन लाल नेगी जी दगड़ा *डॉ.गोविन्द चातक स्मृति आखर साहित्य सम्मान- 2019* से सम्मानित करी छौ |  वूंकि तबियत खराब होणा वजौ से 19 दिसम्बर 2019 खुणी देहरादून का हिन्दी भवन मा आखर समिति द्वारा वीर्येयां ये  कार्यक्रम मा   श्रद्धेय बचन सिंह नेगी जी कि सुपुत्री निर्मला विष्ट जीन वूं को  सम्मान  ल्ये छौ | इन विभूतियों तैं सम्मानित कैरिक क्वी बि संस्था या समिति अफुतैं गौरवान्वित मैसूस कर्द अर इलैई एक  तरौं से "आखर" समिति बि इन विभूति तैं सम्मानित कैरिक अपणा आप सम्मानित ह्वे |  
         वूं तैं जो सम्मान मिला छा ,वो -
(1)सन्  2001 मा उत्तराखण्ड क्षत्रिय कल्याण समिति बटि  सम्मानित |
(2) सन् 2016 मा  "महानायक भक्त दर्शन सम्मान"  (काफल पाको  फाउंडेशन) |
(3) सन् 2007 मा राष्ट्रीय हिंदी परिषद ,मेरठ  द्वारा " हिन्दी गौरव सम्मान "
(4)  सन् 2019 मा  "डॉ.गोविन्द चातक स्मृति आखर साहित्य सम्मान -2019 "(आखर समिति,श्रीनगर गढ़वाल) |
        वूं कि साहित्य साधना अर काम द्यखण से यो मैसूस होन्द कि - जै सम्मान अर पच्छ्याण का श्रद्धेय बचन सिंह नेगी जी हकदार छायि वो  वूं तैं अपणा राज्य अर गढ़वाळि भाषा- साहित्य विरादरी मा नि मिली | अर ! य बि आश्चर्य  कि बात छ पैलि बटि ज्वा जगा (देहरादूण)   साहित्यिक गतिविधियूं काे केन्द्र रायि  वखि इना महान  साहित्य साधक  गुमनाम रैनि |
             "आखर " समितिन्   श्री बचन सिंह नेगी जी का भग्यान( दिवंगत )होण परैं  वूं तैं सादर श्रद्धांजलि द्ये  अर वीं  घड़ी मा  वूं का शोक -संतप्त परिवार का प्रति संवेदना व्यक्त करी |   सब्या जगौं मा लॉकडाउन (कोरोना वाइरस द्वारा फैलण वळि महामारी का वजौ से) होण से   फोन कांफ्रेंस का जरिया इक  श्रद्धाजंली सभा को  आयोजन बि   पत्रकार/लेखक शीशपाल गुसाईं  (देहरादून) द्वारा कर्ये ग्ये  |  डॉ.अरुण कुकसाल (श्रीकोट/श्रीनगर )  ,साहित्यकार श्री महावीर रवांल्टा( अराकोट),  पत्रकार महिपाल सिंह नेगी (टिहरी ) ,वरिष्ठ साहित्यकार श्री नरेन्द्र कठैत (पौड़ी ) , युगवाणी के संजय कोठियाल , मैती आन्दोलन के पद्म श्री कल्याण सिंह रावत , संदीप रावत( आखर ,श्रीनगर) , श्री शूरवीर रावत (देहरादून ) , डॉ.सत्यानन्द बडोनी , श्री जय सिंह रावत , श्री चन्दन सिंह नेगी ,श्री चन्द्रदत्त सुयाल  द्वारा  ईं फोन कांफ्रेंस का माध्यम से स्व.बचन सिंह नेगी जी तैं श्रद्धांजलि द्यिये ग्ये |     
प्रकाशित पुस्तक--
                 पुस्तक.                            - प्रकाशन वर्ष
    1.  रामचरित मानस (गढ़वाली अनुवाद)-- 2001
    2.  बाल्मीकि रामैण (गढ़वाली भाषा )-- - 2008
    3.  श्रीमद् भगवत गीता (गढ़वाली भाषा अनुवाद)-2002
    4. ब्रह्म- सूत्र (गढ़वाली भाषा)-- 2009
     5. महाभारत ग्रन्थसार (गढ़वाली भाषा)- --2007
     6. गढ़वाली कविताएं ----2009
      7.गढ़गौरव महाराणी कर्णावती (गढ़वाली काव्य)- 2010
      8. प्रभा खंडकाव्य (हिंदी)--2001
      9.  गंगा का मायका (केदारखण्ड गढ़वाल- हिंदी गद्य )          --2002
      10. डूबता शहर टिहरी (उपन्यास)--2004
       11.आशा किरण (हिंदी काव्य) --- 2005
      12. वेद संहिताएं (सामान्य परिचय) ---2010
      13. मेरी कहानी --- 2009
      14. गढ़वाल के इतिहास पर कुछ लेख --2010
      15.  देवभूमि उत्तराखण्ड -- 2014
      16. भाव वीथिका (काव्य संग्रह ) --2005
       17. गद्य मंजूषा (गद्य रचनाएं ) --2009
    कुछ -कुछ साहित्य अब्बि बि अप्रकाशित  छ |
      महान साहित्य साधक  स्व. बचन सिंह नेगी जी तैं  शत-शत नमन  अर  विनम्र श्रद्धांजलि  |
                                               © संदीप रावत
                                  (न्यू डांग,श्रीनगर गढ़वाल )

      
      

Wednesday, March 25, 2020

संदीप रावत ,न्यू डांग,श्रीनगर गढ़वाल 26/03/2020

       आप सब्यूं तैं सादर प्रणाम | आजकल ज्वा "कोरोना " कि मार  सैर्या दुन्या  मा होणी छ ,वां से अफुतैं बि बचौण अर हौर्यूं तैं बि बचौण , बस! फिलहाल अपणा-अपणा घौर मा रौण | भयों ! सैन-सफै कु ध्यान रखण अर  दगड़ा-दगड़ि सरकार द्वारा आजकल जो निर्देश दिये जाणा छन वूं तैं मनण हम सब्यूं कि जिन्दगी का वास्ता भौत जरूरी छ | माँ भगवती कि  कृपा अर हम सब्यूं कि सावधानी से सब ठिक ह्वे जालु | ये टैम परैं --
         " दगड्या "
दिदा ! दुन्या मा
कु अपड़ो ?
अर कैको दगड़ो ?
बस, एक दगड़्या खास
अर वा छ तेरी आस
नि होण निरास !
        © संदीप रावत , न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

Friday, November 8, 2019

कविता -*उत्तराखण्ड बणिगे* © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

                 *उत्तराखण्ड बणिगे*

'हम कोदू - झंग्वारू खौंला
पर उत्तराखण्ड बणौला '
ये नारा का दगड़ी
लोगुन सड़क्यूं परैं लड़ी लड़ै
भूख -तीस सै ,
अपणा हडग्यूं तुड़वै
कैsन अपणी ज्यान द्ये
तब जै कि  उत्तराखण्ड पै |
पर !
तब क्या ह्वे ?
हमारा सुपिन्या
कुर्च्येणा छन ,
जल- जंगल-जमीन का पुस्तैनी हक
हमुसे लुच्छ्येणा छन  |
           "एक लपाग " बटि  © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

Thursday, October 24, 2019

आलेख - *बी. मोहन नेगी विविध आयामी व्यक्तित्व के धनी एवं उत्तराखण्ड की अनमोल धरोहर थे * ©संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

   प्रसिद्ध चित्रकार स्व.बी. मोहन नेगी जी की द्वितीय पुण्य तिथि ( 25 अक्टूबर ) पर विनम्र श्रद्धांजलि --

*बी.मोहन जी विविध आयामी व्यक्तित्व के धनी एंव उत्तराखण्ड की अनमोल धरोहर थे | *
             © संदीप रावत ,न्यूं डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
        गढ़वाल की इस उर्वरा भूमि में देश की कई असाधारण प्रतिभाओं ने जन्म लिया ,जिन्होंने अपूर्व ख्याति अर्जित की | बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी प्रसिद्ध चित्रकार उत्तराखण्ड की ऐसी धरोहरों में से एक थे जिन्होंने  निरन्तर अपने प्रयासों से, रंग-लेखनी ,कोलाजों के माध्यम से ,चित्रकारी के माध्यम से  ,कविता पोस्टरों के माध्यम से अपनी एक  अलग पहचान बनाई  और उत्तराखण्ड की संस्कृति,भाषा-साहित्य  को विभिन्न कोलाजों ,चित्रकारी/ रेखांकनों के माध्यम से उजागर करने एंव प्रचार-प्रसार करने में सदैव अग्रणीय भूमिका निभाई |
       बी.मोहन जी के व्यक्तित्व या उनकी बहुआयामी रचना शीलता पर लिखना बहुत कठिन है , कि उनकी रचना धर्मिता के किस पहलू पर विस्तार पूर्वक लिखा जाए -  "उनके द्वारा बनाए गए कविता पोस्टरों के बारे में लिखा जाए या बनाए गए व्यंग्य चित्रों पर , उत्तराखण्ड की ज्वलन्त समस्याओं यथा पलायन, यहां की विलुप्त होती संस्कृति को समय-समय पर अपनी चित्रकारी व कोलाजों के  माध्यम से उजागर करने पर लिखा जाए या फिर यहां की लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार पर , उनके द्वारा बनाए  गए रेखाचित्रों पर लिखा जाए  या फिर उनके द्वारा बनाए गए अनगिनत साहित्यकारों की पुस्तकों के मुखपृष्ठों अर्थात पुस्तक आवरणों पर , उनके पेपरमैसी के काम पर लिखा जाए या फिर बनाए गए मुखौटों पर  , उनके साहित्य प्रेम पर लिखा जाए या फिर उनके कवित्व पहलू पर , उनके द्वारा संकलित/संग्रहित किए गए बहुत पहले बंद पड़े पत्र-पत्रिकाओं के शुरुआती अंको ,दुर्लभ रचनाओं और दुर्लभ पुस्तकों पर या  फिर दुर्लभ पुस्तकों व रचनाओं को अपनी चित्रकारी या कला से नया कलेवर देने पर  , या फिर उनके गढ़वाली भाषा- साहित्य के  संरक्षण एंव प्रचार-प्रसार में योगदान देने पर लिखा जाए | " उनके बारे में एक पूरी पुस्तक भी लिखी जाए तो शायद कम पड़ेगी | 
          बी.मोहन जी की जिस बिधा या प्रतिभा से सभी सबसे ज्यादा परिचित थे वो है कवियों की कविताओं पर उनके द्वारा बनाए गए   "कविता पोस्टर "  |  उत्तराखण्ड में इस विधा को बी.मोहन नेगी ने एक ऊंचाई प्रदान की |    उन्होंने  गढ़वाली, कुमांउनी,जौनसारी ,रवांल्टी ,नेपाली के अलावा  देश- दुनिया के अन्य कवियों की कविताओं पर कविता पोस्टर बनाए | उन्होंने देश-दुनिया के न जाने कितने कवियों की कविताओं को अपनी रंग-लेखनी के माध्यम से यानि चित्रकारी के माध्यम से एक बड़ा फलक दिया | यह मेरा भी सौभाग्य है कि बी.मोहन जी ने मेरी  भी पांच- छह छोटी कविताओं पर कविता पोस्टर बनाकर मुझे कृतार्थ किया | उन्होंने मेरी कविताओं पर बनाए गए कविता पोस्टरों को पत्र-पत्रिकाओं में छपने हेतु स्वंय  भेज दिया था  और साथ ही मुझे भी डाक से बनाए गए कविता पोस्टर भेज दिए थे , ऐसी थी बी.मोहन जी की सरलता, सहजता |
          श्री नरेन्द्र कठैत जी द्वारा कई हिन्दी कवियों की कविताओं के लगभग 500 गढ़वाली अनुवाद  किए गए हैं और इन गढ़वाली अनुवादों में से  बी0 मोहन जी ने लगभग 200 अनुवादों पर   रेखांकन किया यानि कविता पोस्टर बनाए | यह जुगलबंदी बहुत चर्चित रही है | नरेन्द्र कठैत जी द्वारा हिमवंत कवि चन्द्र कुंवर बर्त्वाल जी की  गढ़वाली अनुवादित लगभग 70 -72 कविताओं पर   बी.मोहन जी ने कविता पोस्टर पोस्टर बनाए  और इन सहित चन्द्र कुंवर बर्त्वाल की रचनाओं पर उन्होंने लगभग 100  कविता पोस्टर बनाए |
        उत्तराखण्ड की  भाषाओं के कविता पोस्टरों की जगह- जगह प्रदर्शनी लगाकर इसके माध्यम से उन्होंने यहां भाषा आन्दोलन में भी सक्रिय व अग्रणीय भूमिका निभाई | उनके बनाए गए कविता पोस्टरों से गढ़वाली-कुमांउनी भाषाओं का खूब प्रचार-प्रसार हुआ ,क्योंकि कविता पोस्टरों को देखकर लोग कवि की पूरी कविता जरूर पढ़ते | अब कई लोगों ने उन से प्रेरित होकर चित्र कला और कविता पोस्टर को अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है  , जिनमें अतुल गुसांईं "जाखी " , दीपक नेगी , आशीष नेगी आदि प्रमुख हैं |
         बी.मोहन जी ने लगभग सौ पुस्तकों व पत्रिकाओं के मुख पृष्ठ यानि पुस्तक आवरण/कवर पेज बनाए हैं | मेरी चारों प्रकाशित गढ़वाली पुस्तकों के मुख पृष्ठ उन्हीं के द्वारा बनाए गए हैं | मेरे निजी संकलन में लगभग 35 पुस्तकें  ऐसी हैं जिनके मुख पृष्ठ बी.मोहन जी द्वारा बनाए गए हैं | उनके द्वारा सबसे पहला मुख पृष्ठ गढ़ गौरव श्रद्धेय नरेन्द्र सिंह नेगी जी की पुस्तक "खुचकण्डी " के लिए बनाया गया था | प्रसिद्ध साहित्यकार श्री नरेन्द्र कठैत जी की प्रकाशित सभी 14 पुस्तकों के मुखपृष्ठ   बी.मोहन जी द्वारा ही बनाए गए हैं |
              मेरा  बी.मोहन जी से आमने-सामने परिचय सन् 2008 में श्री विमल नेगी जी के सम्पादकत्व में प्रकाशित होने वाले गढ़वाली पाक्षिक " उत्तराखण्ड खबरसार" के पौड़ी अवस्थित कार्यालय में हुआ था | बाद में पौड़ी ,श्रीनगर रोड़ के नीचे उनके निवास पर भी कई बार जाने का मौका मिला | उनके निवास पर जाने पर उनकी कलाकृति या रचना धर्मिता व साहित्य प्रेम उनके निवास के प्रवेश द्वार  पर ही दिख जाता है | उनके हाथों से बहुत सुन्दर ढंग से लिखी हुईं तारादत्त गैरोला द्वारा रचित "सदेई " की ये पंक्तियां - " हे ऊंची डांड्यो तुम निसी ह्वावा "  गेट के सामने याने प्रवेश द्वार के अन्दर  की दाईं तरफ वाली दीवार पर लिखी हुईं हैं |
        गढ़वाली भाषा-साहित्य की दुर्लभ और पुरानी पुस्तकों व रचनाओं ,बहुत पहले बंद हो चुके अखबारों के पहले अंको का उन्होंने संग्रह किया ,उन्हें सहेज कर रखा | साथ ही अपनी चित्रकारी व रेखांकन से कई दुर्लभ रचनाओं को नया कलेवर देकर प्रचार-प्रसार करने के साथ ही कई दुर्लभ रचनाअों को लुप्त होने से बचाया |
       सन्  2013 में  गढ़वाली गद्य की पुस्तक "गढ़वाली भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा " ( सन 2014 में प्रकाशित) लेखन के दौरान  जब कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाने मैं उनके आवास पर गया तो उन्होंने मुझे भीमराज सिंह कठैत द्वारा लिखित गढ़वाली उपन्यास "शेरू " की फोटो स्टेट व बाइंड की हुई  प्रति भेंट की | इस उपन्यास की प्रतियां उन्होंने स्वयं फोटो स्टेट की थीं एवं स्वयं बाइंड करके कई साहित्यकाराें को मुफ्त में भेंट की थी | गढ़वाली साहित्य की  पहली  गढ़वाली कथा "गढ़वाळि ठाठ " ( सदानन्द कुकरेती जी द्वारा लिखित) जोकि सन् 1913 में "विशाल कीर्ति" मासिक पत्र में प्रकाशित हुई थी, उस कथा का आधा भाग मैंने बी0मोहन जी के घर में उनके नये-पुराने गढ़वाली साहित्य के संकलन में शामिल "विशाल कीर्ति " के "अगस्त-सितम्बर-अक्टूबर, सन् 1913" के अंक में स्वयं देखा व पढ़ा | उसका उद्धरण /संदर्भ मैंने अपनी पुस्तक में भी दिया है  | ऐसे ही अनगिनत दुर्लभ पत्र-पत्रिकाओं एवं  पुस्तकों  का उन्होंने रख रखाव किया था |
          बी.मोहन जी के संकलन में  मैंने  गढ़वाली भाषा में छपे हुए पॉम्पलेट/पर्चे, पोस्टर ,शादी के कार्ड ,निमंत्रण पत्र देखे जिनमें से कछ-कुछ का जिक्र भी मैंने अपनी पुस्तक (गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा ,सन् 2014 में प्रकाशित)में किया हुआ है |  गढ़वाली भाषा-साहित्य में व्यंग्य चित्रों की शुरुवात भी बी.मोहन जी ने ही की थी |
         उनकी सहजता व सरलता ऐसी थी कि वे सभी के साथ एक जैसा व्यवहार रखते थे -  चाहे कोई वरिष्ठ साहित्यकार हो या नया लेखक /कवि | अपने मजाकिया अंदाज में बी0 मोहन जी नए कवि एवं लेखकों को गम्भीर सीख दे जाते थे | जून 2015 में  जब वे श्रीनगर रेनबो पब्लिक स्कूल के पास एक कोचिंग सैंटर में बच्चों को "पेपरमेसी " सम्बन्धी जानकारी देने आए थे तो उन्होंने वहां पर मुझे भी फोन करके बुला लिया | साथ ही पौड़ी में गढ़वाली कथाकार श्री महेशानन्द जी के एक कथा संग्रह "डडवार" के लोकार्पण अवसर पर बी0मोहन जी के साथ मंच पर बैठने का सौभाग्य  प्राप्त हुआ था |  वे   क्षण भी मेरे लिए अदभुद थे | वास्तव में  बी0मोहन जी एक निष्काम कर्मयोगी , असाधारण प्रतिभा के धनी परन्तु सहज-सरल व संवेदनशील  व्यक्ति थे |    
      उनके अवसान से गढ़वाली भाषा -साहित्य जगत एंव रंग-लेखन /चित्रकला जगत में जो खालीपन आया है उसे भरना फिलहाल बहुत मुश्किल है |  सुकृत्यों के लिए जिनका नाम , यश और कीर्ति होती है ,वे सदैव जीवित रहते हैं | उनके द्वारा बनाए गए  कविता -पोस्टरों , पुस्तकों के बनाए गए मुख पृष्ठों, कोलाजों , रेखांकनों  के रूप में बी.मोहन जी  सदैव जीवित रहेंगे | गढ़वाली भाषा- साहित्य की विकास यात्रा में उनके अतुलनीय एवं अमूल्य योगदान को सदैव याद किया जाएगा |इस महान विभूति को विनम्र श्रद्धांजलि एंव श्रद्धा सुमन अर्पित!

  (नोट - यह आलेख वरिष्ठ गढ़वाली साहित्यकार श्री नरेन्द्र कठैत द्वारा  बी.मोहन नेगी जी पर सम्पादित स्मृति ग्रंथ * सृजन विशेष एवं स्मृति शेष* मे प्रकाशित है | )

© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल  |

  

   

Monday, October 21, 2019

आलेख - **भारत में आम जन जीवन की एक आदर्श स्तिथि * * © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

आलेख- *भारत में आम जनजीवन की एक आदर्श स्तिथि *
                  
            © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
    
         यहां पर अपने देश में  सभी के जीवन की आदर्श स्तिथि के बारे में कुछ लिखने की शुरुआत सभी लोगों की मँगल कामना हेतु मैं अपनी ही गढ़वाली रचना की दो पंक्तियों से करता हूं -

**ना भूखू रौवु ना तीसू क्वी ,ना नांगू ना रूदों रुफड़ाणू क्वी ,
मेरी जन्मभूमि हे भारत माता ! गौ-गँगा माता ईं धरती मा**
        
       जब हम जिंदगी के एक आदर्श स्तिथि की बात करते हैं तो सोच-विचार करना लाजमी है |  हर एक हाथ को काम यानि रोजगार ,सभी के लिए शिक्षा ,सबके लिए स्वास्थ्य सुविधा , सबके लिए अच्छा सा  घर (छोटा हो या बड़ा ,  ये प्रश्न नहीं ),सबकी सुरक्षा , शांति और साथ-साथ कुछ उम्मीदें |
         हमारे देश ने  विज्ञान ,टेक्नोलॉजी एवं औद्योगिकीकरण में काफी उपलब्धियां हासिल कर ली हैं ,परन्तु अभी भी कई चुनौतियां शेष हैं |  हर किसी की जुबान पर आज *विकास* शब्द है और देश से लेकर राज्य तक ,शहर से लेकर गाँव तक विकास की चर्चा होती है | साथ ही इस शब्द के साथ उम्मीदें जग रही हैं और उम्मीदें बढ़ रही हैं | इस दिशा में पूरे देश में प्रयास हो रहे हैं  और देश में विकास कुछ हद तक हो भी रहा है ,परन्तु सभी के सपने साकार होने में वक्त लग सकता है | देश के प्रत्येक नागरिक को अपने सपनों में मानवीयता एवं संवेदनाओं को भी जगह देने की आवश्यकता है और साथ ही  प्रत्येक नागरिक द्वारा राष्ट्र की मजबूती के लिए नि:स्वार्थ भाव से योगदान देने की आवश्यकता है |
       यह भी सोचना आवश्यक है कि -अपने देश में विभिन्न वर्गों के  क्या सभी परिवारों में विकास हो रहा होगा ? क्या सभी लोगों की सोच में परिवर्तन हो रहा है ? क्या  पूरे देश, हर राज्य , हर शहर एवं घर-गाँवों में महिलाओं की स्तिथि वास्तव में बेहतर हो चुकी है? क्या देश में अभी भी सभी जगह स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो पा रही हैं?
         यह माना जा रहा है कि  भारत एक सबसे युवा देश है  और युवा शक्ति हमारे देश की उम्मीद है | परन्तु नई पीढ़ी के प्रति उत्तरदायित्व भी बहुत हैं |  जो समाज अपनी नई पीढ़ी के प्रति उत्तरदा़यित्वों का सही ढंग से निर्वाह नहीं करेगा तो उस समाज की गतिशीलता कम होती जाएगी और वह समाज  पिछड़ सकता है  | आज के समय में शिक्षा की सर्वांगीणता, गुणवत्ता एवं उपयोगिता बढ़ाने की आवश्यकता  है | नई पीढ़ी को पथभ्रष्ट होने से बचाना होगा और उसको अपनी जड़ों से जोड़ना भी आवश्यक है |
       आज हमारे देश में शिक्षा का ग्राफ काफी बढ़ा है | परन्तु सामने यह सवाल भी खड़ा है कि जो अपनी शिक्षा पूर्ण कर चुके हैं ,क्या उन्हें काम मिल गया है? रोजगार मिल गया है? वास्तविकता यह है कि यहां बढती हुई जनसंख्या के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार नहीं बढ़े हैं | सभी सरकारी नौकरी की चाह रखते हैं ,परन्तु यह संभव भी नहीं कि सभी को सरकारी नौकरी के अवसर मिल जाएं |
        निजी क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की आज आवश्यकता है |उद्योगों को बढ़ाने की बहुत आवश्यकता है , परन्तु अत्यधिक मुनाफाखोरी पर लगाम भी आवश्यक है | देश की प्रगति के लिए सभी को स्वार्थ से किनारा करना आवश्यक है | जिसका भी अपना रोजगार है ,उसे अपने रोजगार हेतु संसाधन उपलब्ध हो सकें यह आवश्यक है | हमारे देश में जो अन्नदाता (किसान) हैं उनकी समस्याओं की ओर भी ध्यान देना उतना ही जरूरी है ,जितनी अन्य बातें |
            कभी गर्मी में लू बहुत जिन्दगियां लील जाती है | अब सर्दी का आगमन हो चुका है , दिसम्बर-जनवरी  माह में ठण्ड का प्रकोप बढ़ जाता है | यह बिडम्बना है कि कई बेघर लोगों के लिए ठण्ड जानलेवा साबित हो जाती है | अत: सभी के लिए बुनियादी आवश्यकताओं की मांग को नकारा नहीं जा सकता | अतीत से सबक लेना आवश्यक है और सभी का साथ-साथ  चलना आवश्यक है ,उदारवाद की आवश्यकता है |
        अति भौतिकता की चकाचौंध में वस्तुओं को जोड़ते-जोड़ते ,इकट्ठा करते-करते हम लोग ही इक सामान बन गए हैं | ईश्वर तक को इक सामान मान चुके हैं |सांसारिक जंजाल बढ़ चुका है और अति लोभ के कारण हम सभी वस्तुओं का गुलाम बनते जा रहे हैं | वस्तुओं  के अनियंत्रित उपभोग पर नियंत्रण भी आवश्यक है तभी मानसिक शांति आ पाएगी | इस संदर्भ में महाकवि गोपालदास नीरज की ये पंक्तियां याद आती हैं-      

"जितना कम सामान रहेगा
उतना सफर आसान रहेगा |
जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू  हैरान रहेगा |
          सब खुशहाल रहें ,सभी आगे बढ़ें , आवो साथ चलें |
      © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |