मेरी प्रकाशित पुस्तकें :-


(1) एक लपाग ( गढ़वाली कविता-गीत संग्रह)- समय साक्ष्य, (2) गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा (गढ़वाली भाषा साहित्य का ऐतिहासिक क्रम )-संदर्भ एवं शोधपरक पुस्तक - विन्सर प्रकाशन, (3) लोक का बाना (गढ़वाली आलेख संग्रह )- समय साक्ष्य, (4) उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह )- उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ


Showing posts with label संदीप रावत की कविताएं. Show all posts
Showing posts with label संदीप रावत की कविताएं. Show all posts

Saturday, July 18, 2020

कविता - प्लास्टिक का फूल रे !©संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल

प्लास्टिक का फूल रे !
****************
भलो दिख्येंदि भैर-भैर
रंगीलो , हाइ-फाइ , दन ,
पण! कख रंगै सकदि तू
कैकु बि मन ?
कब दे सकदि हव्वा तैं
जरा-सी बि गन्ध ?
प्लास्टिक का फूल रे !
तेरी कानि सदानि काणी
ना तेरी जैड़, ना क्वी धरती,
ना खाद-पाणी !
 
18/07/2020                © संदीप रावत ,
                                  न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल

Sunday, July 12, 2020

रचना - इना सूण © संदीप रावत,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

                        इना सूण

इना सूण  ,इना सूण , मेरा दिदा इना सूण
कख बोकणी छैयि सुद्दि अति गाण्यूं कि दूण  ।

मनख्यात बिन मनखीन् चिफळि गिच्चि को क्या कन्न
मैनों बटि नह्ये- धुये ना हो बल सूट- बूट को क्या कन्न
भली नि लग्दि साग- भुज्जि- दाल- रैठो बिना लूण    ।

अफुतैं भलि क्वे देख पैलि कर्मोन् अपणो भाग लेख
ईं दुनिया मा अफूं ही चलण  सबसे पैलि  अक्वेंक 
  ना छिरकौ तू सुद्दि -सुद्दि ,वचन-प्रवचनों कि स्यूण  ।

नखरी छ्वीं-बत्थूंम किलै अच्छ्याणा धरीं तेरि मूण
मनै मैली चदरी हटौ ,भलि छ्वींयूं कि कम्बळि बूण
तू द्यवता ना बस मनखी छै ,ईं बात तैं भलि क्वे गूण  ।

काल का गाल  सब समायि जान्द एक दिन
करम रैयि जान्द  बस अग्वाड़ि आन्द एक दिन 
बहम -अहम छोड़ दे तू ,बिस्वासै चदरी भलि क्वे बूण  ।
              
             © संदीप रावत , न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल

Friday, June 5, 2020

रचना - भली छ्वीं-बत्थ ©संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

                  "भलि छ्वीं -बत्थ "
पौड़  बटि ही   निकल्द दगड्या, मिठ्ठू- मिठ्ठू  पाणी रे
बिन अफूं म्वर्यां स्वर्ग नि मिल्दू ,कैर ना सुद्दि कि स्याणी रे   ।

मीनत का करड़ा हथ्यूंन तू , जीवन की कूड़ी-बाड़ी बणै
सगोर का छप्यला भला ढुंग्योंन ,अपणी तू ब्यौहारी बणै
धर्ती मा औण सुफल ह्वे जावु गूणी ले इन क्वी गाणी रे   ।

भली छ्वीं-बत्थ -कर्मों का रँगोंन, जीवन कि तिबारी सजै
क्वाँसो- सुकेला मन-मंदिर मा ,ईमान कि फूल-पाती चढ़ै जिकुड़ि कि तौली मा भ्वरि ले दगड्या प्यार-पिरेमौ पाणी रे  ।

सुकेला विचारों का मोळ-माटन लीपि मनऽ चुलखाँदी रे
सुद्दि खत्येणि नि द्येयि दगड्या जीवन कि पणदारी रे
द्यखण-भलण सब दुनिया मा ,पण काणी छ्वीं नि लाणी  रे  ।
          © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल ।

Saturday, April 11, 2020

रचना - आपदा की सीख © संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल

*आपदा की सीख*

अमीर हो या गरीब
राजा हो या रंक  ,
लड़ रहे हैं मिलके सब
" कोरोना" से  जंग ।
                ना, जात-पात का भेद काेई
                ना ,राजनीति का रंग ,
                गिरे, पड़े ,फिर हुए खड़े सब
                दिखे 'एका ' के रंग ।
गंगा निर्मल हो रही
पवन बह रही  मंद ,
दूर हो रही आज स्वयंम्
थी इनमें जो गंध ।
                       पशु-पक्षी भी कर रहे
                       अब ,विचरण स्वछ्न्द ,
                        सिखा रही ये 'आपदा '
                        फिर जीने के ढंग ।
मानव हैं बस! हम सभी
ना ,प्रभु के मानिन्द ,
नहीं है करना ,अब प्रकृति से
अति छेड़छाड़ ,छल-छन्द ।
                              'लालच' और 'ज़रूरत ' में
                              बस! अन्तर समझें हम ,
                              ना समझे,तो होगी ही
                              ये 'उछल-कूद ' सब बन्द ।

10/04/2020,                       © संदीप रावत
                                    न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल  ।

 

Wednesday, March 25, 2020

संदीप रावत ,न्यू डांग,श्रीनगर गढ़वाल 26/03/2020

       आप सब्यूं तैं सादर प्रणाम | आजकल ज्वा "कोरोना " कि मार  सैर्या दुन्या  मा होणी छ ,वां से अफुतैं बि बचौण अर हौर्यूं तैं बि बचौण , बस! फिलहाल अपणा-अपणा घौर मा रौण | भयों ! सैन-सफै कु ध्यान रखण अर  दगड़ा-दगड़ि सरकार द्वारा आजकल जो निर्देश दिये जाणा छन वूं तैं मनण हम सब्यूं कि जिन्दगी का वास्ता भौत जरूरी छ | माँ भगवती कि  कृपा अर हम सब्यूं कि सावधानी से सब ठिक ह्वे जालु | ये टैम परैं --
         " दगड्या "
दिदा ! दुन्या मा
कु अपड़ो ?
अर कैको दगड़ो ?
बस, एक दगड़्या खास
अर वा छ तेरी आस
नि होण निरास !
        © संदीप रावत , न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

Friday, November 8, 2019

कविता -*उत्तराखण्ड बणिगे* © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

                 *उत्तराखण्ड बणिगे*

'हम कोदू - झंग्वारू खौंला
पर उत्तराखण्ड बणौला '
ये नारा का दगड़ी
लोगुन सड़क्यूं परैं लड़ी लड़ै
भूख -तीस सै ,
अपणा हडग्यूं तुड़वै
कैsन अपणी ज्यान द्ये
तब जै कि  उत्तराखण्ड पै |
पर !
तब क्या ह्वे ?
हमारा सुपिन्या
कुर्च्येणा छन ,
जल- जंगल-जमीन का पुस्तैनी हक
हमुसे लुच्छ्येणा छन  |
           "एक लपाग " बटि  © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

Thursday, October 24, 2019

आलेख - *बी. मोहन नेगी विविध आयामी व्यक्तित्व के धनी एवं उत्तराखण्ड की अनमोल धरोहर थे * ©संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

   प्रसिद्ध चित्रकार स्व.बी. मोहन नेगी जी की द्वितीय पुण्य तिथि ( 25 अक्टूबर ) पर विनम्र श्रद्धांजलि --

*बी.मोहन जी विविध आयामी व्यक्तित्व के धनी एंव उत्तराखण्ड की अनमोल धरोहर थे | *
             © संदीप रावत ,न्यूं डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
        गढ़वाल की इस उर्वरा भूमि में देश की कई असाधारण प्रतिभाओं ने जन्म लिया ,जिन्होंने अपूर्व ख्याति अर्जित की | बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी प्रसिद्ध चित्रकार उत्तराखण्ड की ऐसी धरोहरों में से एक थे जिन्होंने  निरन्तर अपने प्रयासों से, रंग-लेखनी ,कोलाजों के माध्यम से ,चित्रकारी के माध्यम से  ,कविता पोस्टरों के माध्यम से अपनी एक  अलग पहचान बनाई  और उत्तराखण्ड की संस्कृति,भाषा-साहित्य  को विभिन्न कोलाजों ,चित्रकारी/ रेखांकनों के माध्यम से उजागर करने एंव प्रचार-प्रसार करने में सदैव अग्रणीय भूमिका निभाई |
       बी.मोहन जी के व्यक्तित्व या उनकी बहुआयामी रचना शीलता पर लिखना बहुत कठिन है , कि उनकी रचना धर्मिता के किस पहलू पर विस्तार पूर्वक लिखा जाए -  "उनके द्वारा बनाए गए कविता पोस्टरों के बारे में लिखा जाए या बनाए गए व्यंग्य चित्रों पर , उत्तराखण्ड की ज्वलन्त समस्याओं यथा पलायन, यहां की विलुप्त होती संस्कृति को समय-समय पर अपनी चित्रकारी व कोलाजों के  माध्यम से उजागर करने पर लिखा जाए या फिर यहां की लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार पर , उनके द्वारा बनाए  गए रेखाचित्रों पर लिखा जाए  या फिर उनके द्वारा बनाए गए अनगिनत साहित्यकारों की पुस्तकों के मुखपृष्ठों अर्थात पुस्तक आवरणों पर , उनके पेपरमैसी के काम पर लिखा जाए या फिर बनाए गए मुखौटों पर  , उनके साहित्य प्रेम पर लिखा जाए या फिर उनके कवित्व पहलू पर , उनके द्वारा संकलित/संग्रहित किए गए बहुत पहले बंद पड़े पत्र-पत्रिकाओं के शुरुआती अंको ,दुर्लभ रचनाओं और दुर्लभ पुस्तकों पर या  फिर दुर्लभ पुस्तकों व रचनाओं को अपनी चित्रकारी या कला से नया कलेवर देने पर  , या फिर उनके गढ़वाली भाषा- साहित्य के  संरक्षण एंव प्रचार-प्रसार में योगदान देने पर लिखा जाए | " उनके बारे में एक पूरी पुस्तक भी लिखी जाए तो शायद कम पड़ेगी | 
          बी.मोहन जी की जिस बिधा या प्रतिभा से सभी सबसे ज्यादा परिचित थे वो है कवियों की कविताओं पर उनके द्वारा बनाए गए   "कविता पोस्टर "  |  उत्तराखण्ड में इस विधा को बी.मोहन नेगी ने एक ऊंचाई प्रदान की |    उन्होंने  गढ़वाली, कुमांउनी,जौनसारी ,रवांल्टी ,नेपाली के अलावा  देश- दुनिया के अन्य कवियों की कविताओं पर कविता पोस्टर बनाए | उन्होंने देश-दुनिया के न जाने कितने कवियों की कविताओं को अपनी रंग-लेखनी के माध्यम से यानि चित्रकारी के माध्यम से एक बड़ा फलक दिया | यह मेरा भी सौभाग्य है कि बी.मोहन जी ने मेरी  भी पांच- छह छोटी कविताओं पर कविता पोस्टर बनाकर मुझे कृतार्थ किया | उन्होंने मेरी कविताओं पर बनाए गए कविता पोस्टरों को पत्र-पत्रिकाओं में छपने हेतु स्वंय  भेज दिया था  और साथ ही मुझे भी डाक से बनाए गए कविता पोस्टर भेज दिए थे , ऐसी थी बी.मोहन जी की सरलता, सहजता |
          श्री नरेन्द्र कठैत जी द्वारा कई हिन्दी कवियों की कविताओं के लगभग 500 गढ़वाली अनुवाद  किए गए हैं और इन गढ़वाली अनुवादों में से  बी0 मोहन जी ने लगभग 200 अनुवादों पर   रेखांकन किया यानि कविता पोस्टर बनाए | यह जुगलबंदी बहुत चर्चित रही है | नरेन्द्र कठैत जी द्वारा हिमवंत कवि चन्द्र कुंवर बर्त्वाल जी की  गढ़वाली अनुवादित लगभग 70 -72 कविताओं पर   बी.मोहन जी ने कविता पोस्टर पोस्टर बनाए  और इन सहित चन्द्र कुंवर बर्त्वाल की रचनाओं पर उन्होंने लगभग 100  कविता पोस्टर बनाए |
        उत्तराखण्ड की  भाषाओं के कविता पोस्टरों की जगह- जगह प्रदर्शनी लगाकर इसके माध्यम से उन्होंने यहां भाषा आन्दोलन में भी सक्रिय व अग्रणीय भूमिका निभाई | उनके बनाए गए कविता पोस्टरों से गढ़वाली-कुमांउनी भाषाओं का खूब प्रचार-प्रसार हुआ ,क्योंकि कविता पोस्टरों को देखकर लोग कवि की पूरी कविता जरूर पढ़ते | अब कई लोगों ने उन से प्रेरित होकर चित्र कला और कविता पोस्टर को अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है  , जिनमें अतुल गुसांईं "जाखी " , दीपक नेगी , आशीष नेगी आदि प्रमुख हैं |
         बी.मोहन जी ने लगभग सौ पुस्तकों व पत्रिकाओं के मुख पृष्ठ यानि पुस्तक आवरण/कवर पेज बनाए हैं | मेरी चारों प्रकाशित गढ़वाली पुस्तकों के मुख पृष्ठ उन्हीं के द्वारा बनाए गए हैं | मेरे निजी संकलन में लगभग 35 पुस्तकें  ऐसी हैं जिनके मुख पृष्ठ बी.मोहन जी द्वारा बनाए गए हैं | उनके द्वारा सबसे पहला मुख पृष्ठ गढ़ गौरव श्रद्धेय नरेन्द्र सिंह नेगी जी की पुस्तक "खुचकण्डी " के लिए बनाया गया था | प्रसिद्ध साहित्यकार श्री नरेन्द्र कठैत जी की प्रकाशित सभी 14 पुस्तकों के मुखपृष्ठ   बी.मोहन जी द्वारा ही बनाए गए हैं |
              मेरा  बी.मोहन जी से आमने-सामने परिचय सन् 2008 में श्री विमल नेगी जी के सम्पादकत्व में प्रकाशित होने वाले गढ़वाली पाक्षिक " उत्तराखण्ड खबरसार" के पौड़ी अवस्थित कार्यालय में हुआ था | बाद में पौड़ी ,श्रीनगर रोड़ के नीचे उनके निवास पर भी कई बार जाने का मौका मिला | उनके निवास पर जाने पर उनकी कलाकृति या रचना धर्मिता व साहित्य प्रेम उनके निवास के प्रवेश द्वार  पर ही दिख जाता है | उनके हाथों से बहुत सुन्दर ढंग से लिखी हुईं तारादत्त गैरोला द्वारा रचित "सदेई " की ये पंक्तियां - " हे ऊंची डांड्यो तुम निसी ह्वावा "  गेट के सामने याने प्रवेश द्वार के अन्दर  की दाईं तरफ वाली दीवार पर लिखी हुईं हैं |
        गढ़वाली भाषा-साहित्य की दुर्लभ और पुरानी पुस्तकों व रचनाओं ,बहुत पहले बंद हो चुके अखबारों के पहले अंको का उन्होंने संग्रह किया ,उन्हें सहेज कर रखा | साथ ही अपनी चित्रकारी व रेखांकन से कई दुर्लभ रचनाओं को नया कलेवर देकर प्रचार-प्रसार करने के साथ ही कई दुर्लभ रचनाअों को लुप्त होने से बचाया |
       सन्  2013 में  गढ़वाली गद्य की पुस्तक "गढ़वाली भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा " ( सन 2014 में प्रकाशित) लेखन के दौरान  जब कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाने मैं उनके आवास पर गया तो उन्होंने मुझे भीमराज सिंह कठैत द्वारा लिखित गढ़वाली उपन्यास "शेरू " की फोटो स्टेट व बाइंड की हुई  प्रति भेंट की | इस उपन्यास की प्रतियां उन्होंने स्वयं फोटो स्टेट की थीं एवं स्वयं बाइंड करके कई साहित्यकाराें को मुफ्त में भेंट की थी | गढ़वाली साहित्य की  पहली  गढ़वाली कथा "गढ़वाळि ठाठ " ( सदानन्द कुकरेती जी द्वारा लिखित) जोकि सन् 1913 में "विशाल कीर्ति" मासिक पत्र में प्रकाशित हुई थी, उस कथा का आधा भाग मैंने बी0मोहन जी के घर में उनके नये-पुराने गढ़वाली साहित्य के संकलन में शामिल "विशाल कीर्ति " के "अगस्त-सितम्बर-अक्टूबर, सन् 1913" के अंक में स्वयं देखा व पढ़ा | उसका उद्धरण /संदर्भ मैंने अपनी पुस्तक में भी दिया है  | ऐसे ही अनगिनत दुर्लभ पत्र-पत्रिकाओं एवं  पुस्तकों  का उन्होंने रख रखाव किया था |
          बी.मोहन जी के संकलन में  मैंने  गढ़वाली भाषा में छपे हुए पॉम्पलेट/पर्चे, पोस्टर ,शादी के कार्ड ,निमंत्रण पत्र देखे जिनमें से कछ-कुछ का जिक्र भी मैंने अपनी पुस्तक (गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा ,सन् 2014 में प्रकाशित)में किया हुआ है |  गढ़वाली भाषा-साहित्य में व्यंग्य चित्रों की शुरुवात भी बी.मोहन जी ने ही की थी |
         उनकी सहजता व सरलता ऐसी थी कि वे सभी के साथ एक जैसा व्यवहार रखते थे -  चाहे कोई वरिष्ठ साहित्यकार हो या नया लेखक /कवि | अपने मजाकिया अंदाज में बी0 मोहन जी नए कवि एवं लेखकों को गम्भीर सीख दे जाते थे | जून 2015 में  जब वे श्रीनगर रेनबो पब्लिक स्कूल के पास एक कोचिंग सैंटर में बच्चों को "पेपरमेसी " सम्बन्धी जानकारी देने आए थे तो उन्होंने वहां पर मुझे भी फोन करके बुला लिया | साथ ही पौड़ी में गढ़वाली कथाकार श्री महेशानन्द जी के एक कथा संग्रह "डडवार" के लोकार्पण अवसर पर बी0मोहन जी के साथ मंच पर बैठने का सौभाग्य  प्राप्त हुआ था |  वे   क्षण भी मेरे लिए अदभुद थे | वास्तव में  बी0मोहन जी एक निष्काम कर्मयोगी , असाधारण प्रतिभा के धनी परन्तु सहज-सरल व संवेदनशील  व्यक्ति थे |    
      उनके अवसान से गढ़वाली भाषा -साहित्य जगत एंव रंग-लेखन /चित्रकला जगत में जो खालीपन आया है उसे भरना फिलहाल बहुत मुश्किल है |  सुकृत्यों के लिए जिनका नाम , यश और कीर्ति होती है ,वे सदैव जीवित रहते हैं | उनके द्वारा बनाए गए  कविता -पोस्टरों , पुस्तकों के बनाए गए मुख पृष्ठों, कोलाजों , रेखांकनों  के रूप में बी.मोहन जी  सदैव जीवित रहेंगे | गढ़वाली भाषा- साहित्य की विकास यात्रा में उनके अतुलनीय एवं अमूल्य योगदान को सदैव याद किया जाएगा |इस महान विभूति को विनम्र श्रद्धांजलि एंव श्रद्धा सुमन अर्पित!

  (नोट - यह आलेख वरिष्ठ गढ़वाली साहित्यकार श्री नरेन्द्र कठैत द्वारा  बी.मोहन नेगी जी पर सम्पादित स्मृति ग्रंथ * सृजन विशेष एवं स्मृति शेष* मे प्रकाशित है | )

© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल  |

  

   

Thursday, October 10, 2019

क्षणिका .."नेता " - © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

               " नेता "

चुनौ का टैम पर -
बसगळ्या मिंढ़का सि ऐ जांदन
चिफळि गिच्ची कैकि
दिन मा गैणा दिखै जांदन
अर ! जन्नि यों तैं तोलो
तन्नि उतड़फळि मारि जांदिन  |
 
     *एक लपाग* बटि © संदीप रावत,न्यू डांग ,
                       श्रीनगर गढ़वाल  |

Monday, September 30, 2019

" समोदर अर पंद्यारु " ©संदीप रावत ,न्यू डांग,श्रीनगर गढ़वाल |

"समोदर अर पंद्यारु "

समोदर -
दिखेणौ बड़ो ,
पर,रूखो अर खारो  |
पंद्यारु -
छ्वटु सि
अर छाळो ,
पण ! न झणि
कतगौं कि
तीस बुझालो |
      
सर्वाधिकार © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

Wednesday, September 4, 2019

शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। महान विचारक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को शत -शत नमन🙏🙏🙏💐💐.---संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

   

   आप सभी को सादर प्रणाम।🙏🙏शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। महान  विचारक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को शत -शत नमन🙏🙏🙏💐💐

      वास्तव में शिक्षक की भूमिका पिछले काफी समय से बिल्कुल बदल गयी है।  वह सिर्फ ज्ञान देने वाला नहीं रहा और आज शिक्षक आज एक महत्वपूर्ण भूमिका में है।मानवीय सन्दर्भदाता की  भूमिका में तो एक शिक्षक हमेशा से ही रहा है। मैं एक शिक्षक जरूर हूँ परन्तु मैं एक 'शिष्य ' और 'बच्चा 'आजीवन रहूँगा।🙏 ' शिष्य ' और  बच्चों में सीखने और कुछ करने की असीम संभावनाएं सदैव रहती हैं। 

      अपने इस जीवन में मैनें जिन भी व्यक्तियों , चीजों , भावों से सीखा शिक्षक दिवस के सुअवसर पर उन सभी व्यक्तियों, गुरुजनों, मित्रों एवं सुधीजनों को हृदय से नमन करता हूँ।🙏🙏हार्दिक आभार एवं हार्दिक धन्यवाद। 

                  " गुरु "

जो नै पौध तैं
फूंजि-फांजिक चमकान्द
अर ! बाटु  बतान्द ,
अपणा चेलों तैं
अफुं से  बि ऐंच द्यखण चान्द ,
अर! बग्त औण परैं
अपणा सिखायां -पढ़ायां
नौन्याळों से हन्न (हरण ) चान्द
वे तैं *गुरु *ब्वल्ये जान्द  |
              © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
(सम्प्रति - प्रवक्ता/रा.इ.कॉ.धद्दी घण्डियाल,टि.ग.)

   

Tuesday, August 20, 2019

गढ़वाली रचना- " जग्वाळ "( © संदीप रावत ,न्यू डांग,श्रीनगर गढ़वाल)

               " जग्वाळ "

कबि घामै चटकताळ
कबि ऐ  बसग्याळ
कब्बि रडी़नि कूड़ी-पठाळ
रै ग्येनि बस ,ढाळ- पंदाळ
संग्ति रै बिकासै जग्वाळ
पर!
खड़ा ह्वे ग्येनि कतगै सवाल |

© संदीप रावत ('एक लपाग 'बटि )न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

गढ़वाली (सरस्वती )वंदना - द्वी आखरूं कु ज्ञान द्ये ( © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल)

   *द्वी आखरूं कु ज्ञान द्ये (गढ़वाळि सरस्वती वंदना)*
                        
  अज्ञानै अँध्यारी रात मा द्वी आखरूं कू ज्ञान द्ये
   घुली जौ रस बाच मा वीणा कि इन तू तान द्ये |

द्यू जगौ सदभाव कु ,चौतर्फां उदंकार हो
चौतर्फां उदंकार हो ,
अभाव मा तू भाव भ्वरी ,सबका जिकड्यूं प्यार हो
माँ ,सबका जिकड्यूं प्यार हो ,
विद्या-बुद्धि संग भला,विद्या बुद्धि संग भला कर्मों कु मिजान द्ये
घुली जौ रस बाच मा ,वीणा कि इन तू तान द्ये |

सुबाटोम् हिटै सदानि ,जीणा कु तू द्ये सगोर
माँ जीणा कु  तू द्ये सगोर
माया-मोहक हटै जिबाळ ,मन कु खैड़-मैल सोर
माँ ,मन कु खैड़-मैल सोर
शब्दों का ब्रह्म कमल खिल्याँ ,शब्दों का ब्रह्म कमल खिल्याँ
हमुतैं इनु वरदान द्ये
घुली जौ रस बाच मा ,वीणा कि इन तू तान द्ये |

सच्चा ध्यो से हम सदानि ,कर्म अपणु करदी जौं
माँ , कर्म अपणू करदी जौं
तेरी अरज हम सदानि ,दीन भौ मा करदी  रौं
माँ ,दीन भौ मा करदी रौंवु
ज्ञान को छै तू समोदर ,ज्ञान को छै तू समोदर
हमु बि जरा तू ज्ञान द्ये
घुली जौ रस बाच मा ,वीणा कि इन तू तान द्ये |
 
©गीतकार एवं कम्पोजर  - संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल
(प्रवक्ता ,रा.इ.कॉ. धद्दी घण्ड्यिाल ,बडियारगढ़,टि.ग. )
                         
                

Wednesday, August 14, 2019

गढ़वाली रचना - "रखड़ी कु त्योहार "(© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल )

                 " रखड़ी कु त्योहार "

रखड़ी - धागू बंधौंणौ जाणा
भैs ,बैण्यू का घार ,
कखी छन बैsणी आणी-जाणी
अपणा भैय्यूं का ध्वार |
          
           द्यो-द्यबतौं से मंगणी बैsणी
           भैय्यूं कि राजि-खुसि अर प्यार ,
           भैs बि , बैण्यूं  रग्सा खातिर
            कन्नाs सौं-करार  |

रखड़ी-धागों रूप मा द्येखा
अयूं छ भलु त्योहार ,
भै-बैण्यूं का बीच खत्येणू
संग्तिs प्यार -उल्यार  |
     -ऐग्ये रखड़ी कु त्योहार ,ऐग्ये रखड़ी कु त्योहार..
         © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

       
    

Monday, August 12, 2019

गढ़वाली कविता - *आजौ मनखी *(© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल)

              *आजौ मनखी*

आज,
बुबा-अपणा लड़िक बिटीक
लड़िक- ब्वे बुबा बिटीक
मनखी- परिवार बिटीक
परिवार- समाज बिटीक
अलग होणू छ ,
किलैकि !
वो
आजौ  मनखी छ |
              © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

Thursday, August 8, 2019

समीक्षा - 'उदरोळ 'गढ़वाली कथा संग्रह

          हिन्दी की प्रतिष्ठित  मासिक प्रत्रिका  ' हलन्त ' के  अगस्त-2019 के अंक में संदीप रावत जी की गढ़वाली  कथा संग्रह  "उदरोळ " की समीक्षा  साहित्यकार ,विचारक व समीक्षक डॉ. चरणसिंह केदारखंडी जी द्वारा ------

**पहाड़ी लोकजीवन का साहित्यिक इंद्रधनुष है 'उदरोळ' **
                                - डॉ. चरणसिंह केदारखंडी
   
      श्रीनगर गढ़वाल में बसे और पेशे से रसायन विज्ञान के शिक्षक श्री संदीप रावत गढ़वाली भाषा, समालोचना ,कहानी और काव्य विधा के उदीयमान नक्षत्र हैं। वे शिक्षा और साहित्य के साथ साथ गढ़संस्कृति की सराहनीय सेवा कर रहे हैं। युवा पीढ़ी के इस लिख्वार की प्रतिभा ने गढ़ साहित्य के वेहद प्रतिष्ठित नामों जैसे दिवंगत भगवती प्रसाद नौटियाल, व्यंग्यकार भाई नरेंद्र कठैत,डॉ अचलानंद जखमोला, भीष्म कुकरेती ,गीतकार नेगी दा, श्रीमती बीना बेंजवाल और कवि ओमप्रकाश सेमवाल को सम्मोहित किया है। उनकी अभी तक प्रकाशित रचनाओं ने बौद्धिक जगत में व्यापक सराहना पायी है, जिसने निश्चित रूप में रावत जी को बेहतर करने के लिए प्रेरित किया होगा। पहाड़ में रहकर जिन लोगों की स्वासों में पहाड़ के दुःख दर्द, भूख नांग, बेकारी और विडंबनाएं सकारात्मक संभावनाओं का स्पर्श पाती हैं, संदीप रावत उनमे से एक हैं। एक ऐसे समय में जब आर्थिक और शैक्षिक रूप से समृद्ध उत्तराखंड की नयी पीढ़ी अपनी बोली भाषा, तीज त्यौहार ,संस्कृति और सरोकारों से निरंतर दूर होती जा रही है, ऐसे में प्रोफेसर दाता राम पुरोहित और संदीप रावत होने के गहरे निहितार्थ हैं।
      अपने व्यवहार और आचरण में पहाड़ी सरलता और खुशबू का एहसास लिए संदीप जी की सृजन यात्रा पहली कृति 'एक लपाग' से शुरू हुई। दूसरी कृति के रूप में उन्होंने 'गढ़वळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा' लिखी जो अब तक रचे गए गढ़वाली साहित्य की समालोचनात्मक मीमांसा है ।संदीप जी 'रंत रैबार' ,'खबर सार' ,डाँडी-कांठी सहित गढ़वाली को स्थान देने वाली हिंदी की सम्मानित पत्रिकाओं (जैसे हलंत,युगवाणी और रीजनल रिपोर्टर ) में भी खूब छपते हैं ।उनकी तीसरी रचना 'लोक का बाना' इसी तरह के प्रकाशित/अप्रकाशित गढ़वाली आलेख और निबंधों का संग्रह है।
अब रावत जी अपनी चौथी और नवीनतम कृति 'उदरोल' लेकर हमारे बीच आये हैं जो उनकी 34 गढ़वाली कथाओं का संग्रह है। उदरोल शब्द घपरोल के करीब है जिसका अर्थ है विघ्न पैदा करना, दूसरों को लड़ाना, उनके काम में खलल डालना। उदरोल्या आदमी "tall poppy syndrome"  की बीमारी से ग्रसित होता है और "हो त हो नैतर भौ ही खो" के दर्शन को मानता है। मुश्किल ये है कि हम सबके भीतर एक उदरोय्या बैठा हुआ है !
      चौतीस कहानियों 86 पृष्ठओं के इस लघु संग्रह को उनके आकार के बजाय आखर और सन्देश की गहराई से मापकर ही हम उसके साथ न्याय कर सकेंगे। गढ़वाली व्यंग्य और कहानी में बेहद प्रतिष्ठा हासिल कर चुके शिक्षक/साहित्यकार भाई डॉ प्रीतम अपछयाण ने इस संग्रह की सारगर्भित भूमिका लिखी है। जीवन के रंग अपनी पूरी रौ के साथ संग्रह में इस तरह समाहित हैं कि प्रीतम जी को भूमिका में लिखना पड़ा : " इ 'लघु कथा' नीन बल्कन कथा ही छन जो छवटा रूप मा छन "(पृष्ट 10).
      इस कहानी संग्रह में पहाड़ी लोकजीवन का पूरा इंद्रधनुष समाया हुआ है।इसमें दर्द है(पहली कहानी 'हलचिरु') तो रूहानी प्रेम की इबारतें भी हैं(सैंदाण)। इसमें भुतानुराग है( 'चौक' कहानी ) तो मानवता के श्रेष्ठ किस्से भी पिरोये गए हैं(मनख्यात कहानी पढ़कर आप द्रवित हुए बिना नहीं रह सकेंगे).
     एक लोक साहित्यकार के तौर पर संदीप जी आंचलिक भाषा के लुप्त हो चुके शब्दों, स्वादों, ध्वनियों और एहसासों का कोलाज पाठक के सामने इतने रुचिकर तरीके से रखते हैं कि उनके सम्मोहन से बच पाना असंभव लगने लगता है !
'उदरोल' की ज्यादातर कहानियां दो पृष्ठ की हैं,यानी चाय की प्याली ख़त्म करने से पहले पाठक एक कहानी पूरी पढ़ लेता है लेकिन उसके सन्देश को समझने के लिए पूरा सप्ताह भी कम है।
     पहली कहानी 'हलचिरु' है जो दो भाईचारे (भयात),प्रेम और फिर दुःखद बँटवारे का तफसरा है हालाँकि कहानी उनके मिलन में संपन्न होती है इसलिए 'हलचिरु' इतना नहीं चुभता। लेखक समाज के दुःख दर्दों ,उसकी बीमारियों और विकृतियों का दृष्टा होने के साथ साथ समाज का वैचारिक अगुआ और मार्गदर्शक भी होता है। पहाड़ी समाज आज भी बहुत सारी कुरीतियों के फेर में है जिसकी वजह से भोला भाला आदमी अपनी गाढ़ी कमाई को तांत्रिकों और 'बक्या' लोगों के हवाले कर देता है। इसी आलोक में लिखी गई है 'बक्या' कहानी जो समकालीन समय के लिए आईना है। 'चौक' कहानी में पाठक पहाड़ों के लिए अभिशाप बन चुके पलायन के दर्द पर आधारित  है । पूरे बीस साल बाद जब कहानी का नायक संजू अपने गांव लौटता है तो चौक की हालत देखकर अवाक् रह जाता है :
"आज वे चौक कि हालात देखिक वे कि आँखयूँ मा अंशुधरि ए ग्येनि।पैली कन आबाद रानु छो यो चौक !  ये चौक मा पैली कन घपल चौदस मचीं रांदि छै ,पर आज सब्या कुछ बदलि ग्ये छो"(पृष्ठ 32)।
    संग्रह की 12वीं कहानी 'मनख्यात' यानी मानवता युद्ध के दर्शन पर आधरित है। भक्ति और अंध राष्ट्रवाद के सतही जोश के अतिरिक्त भी युद्ध की एक भयावह और ज़मीनी सच्चाई होती है । युद्ध कोई नहीं चाहता।मरना कोई नहीं चाहता : ये दुनियां एक सैनिक को भी बहुत भाती है; जान को कौड़ियों के मोल कोई नहीं बिकाना चाहता है। लेखक ने इस दिशा में सही चिंतन किया है :
"लड़े कब्बि बि कैका वास्ता भली नि रै। चाहे वो अपूणु ह्वा या पर्यावु ,लड़े त लड़े होंद जैमा सदानि ल्वे कि खतरि होंद"(41).
     आदिवासी कबीलों की तरह आपस में एक दूसरे को मिटाने को आतुर आज के देशों के लिए कितना बड़ा सन्देश है ! 'सैंदाण' का अर्थ 'प्रेम की निशानी या समौण से है जिसे हम सौवेनिर भी कहते हैं। ये मोहन और मधु के रूहानी और अफलातूनी प्रेम का अफसाना है जिसमे दिवंगत पत्नी की निशानी (बेटी मोनी) की ख़ातिर नायक जीवन समर्पित कर देता है। 'रामु चकडै़त' दोस्तों के बीच होने वाले लोभ ,स्वार्थ और धोखे के प्रति सावधान करती कहानी है। वही शीर्षक कहानी 'उदरोळ ' में "मुस्या" चंट की दास्ताँ हैं जिसका काम लोगों के हँसते खेलते परिवारों में विग्रह पैदा करना है। गांव इस तरह के खुरापातियों के मुख्यालय बने हुए हैं जहाँ मामूली चीज़ों के लिए आप लोगों को उलझते देख सकते हैं...
कुल मिलाकर मुझे उदरोळ समकालीन पहाड़ी जनजीवन का बोलता आईना प्रतीत होता है।अपनी बोली भाषा और समाज संस्कृति से जुड़े हर संवेदनशील आदमी को इस किताब को पढ़ना और खरीदना चाहिए।
  © समीक्षक - डॉ. चरणसिंह केदारखंडी                 
                पुस्तक - उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह)
                               कथाकार - संदीप रावत
                          प्रकाशक - उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ
                             
  नोट -  पुस्तक प्राप्ति स्थान -
            (1) उत्कर्ष प्रकाशन / फ्लिफ कार्ड
      (2) अनूप सिंह रावत ,रावत डिजिटल ,नई दिल्ली
        (3 ) विद्या बुक डिपो ,नई दिल्ली  |
         (4) भट्ट ब्रदर्स ,बसंत विहार ,देहरादून  |
     (5) ट्रांस मीडिया ,निकट रेनबो स्कूल ,श्रीनगर गढ.
     (6) सरस्वती पुस्तक भंडार ,श्रीनगर गढ़वाल |