" जग्वाळ "
कबि घामै चटकताळ
कबि ऐ बसग्याळ
कब्बि रडी़नि कूड़ी-पठाळ
रै ग्येनि बस ,ढाळ- पंदाळ
संग्ति रै बिकासै जग्वाळ
पर!
खड़ा ह्वे ग्येनि कतगै सवाल |
© संदीप रावत ('एक लपाग 'बटि )न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
मेरी प्रकाशित पुस्तकें :-
" जग्वाळ "
कबि घामै चटकताळ
कबि ऐ बसग्याळ
कब्बि रडी़नि कूड़ी-पठाळ
रै ग्येनि बस ,ढाळ- पंदाळ
संग्ति रै बिकासै जग्वाळ
पर!
खड़ा ह्वे ग्येनि कतगै सवाल |
© संदीप रावत ('एक लपाग 'बटि )न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
*द्वी आखरूं कु ज्ञान द्ये (गढ़वाळि सरस्वती वंदना)*
अज्ञानै अँध्यारी रात मा द्वी आखरूं कू ज्ञान द्ये
घुली जौ रस बाच मा वीणा कि इन तू तान द्ये |
द्यू जगौ सदभाव कु ,चौतर्फां उदंकार हो
चौतर्फां उदंकार हो ,
अभाव मा तू भाव भ्वरी ,सबका जिकड्यूं प्यार हो
माँ ,सबका जिकड्यूं प्यार हो ,
विद्या-बुद्धि संग भला,विद्या बुद्धि संग भला कर्मों कु मिजान द्ये
घुली जौ रस बाच मा ,वीणा कि इन तू तान द्ये |
सुबाटोम् हिटै सदानि ,जीणा कु तू द्ये सगोर
माँ जीणा कु तू द्ये सगोर
माया-मोहक हटै जिबाळ ,मन कु खैड़-मैल सोर
माँ ,मन कु खैड़-मैल सोर
शब्दों का ब्रह्म कमल खिल्याँ ,शब्दों का ब्रह्म कमल खिल्याँ
हमुतैं इनु वरदान द्ये
घुली जौ रस बाच मा ,वीणा कि इन तू तान द्ये |
सच्चा ध्यो से हम सदानि ,कर्म अपणु करदी जौं
माँ , कर्म अपणू करदी जौं
तेरी अरज हम सदानि ,दीन भौ मा करदी रौं
माँ ,दीन भौ मा करदी रौंवु
ज्ञान को छै तू समोदर ,ज्ञान को छै तू समोदर
हमु बि जरा तू ज्ञान द्ये
घुली जौ रस बाच मा ,वीणा कि इन तू तान द्ये |
©गीतकार एवं कम्पोजर - संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल
(प्रवक्ता ,रा.इ.कॉ. धद्दी घण्ड्यिाल ,बडियारगढ़,टि.ग. )
" रखड़ी कु त्योहार "
रखड़ी - धागू बंधौंणौ जाणा
भैs ,बैण्यू का घार ,
कखी छन बैsणी आणी-जाणी
अपणा भैय्यूं का ध्वार |
द्यो-द्यबतौं से मंगणी बैsणी
भैय्यूं कि राजि-खुसि अर प्यार ,
भैs बि , बैण्यूं रग्सा खातिर
कन्नाs सौं-करार |
रखड़ी-धागों रूप मा द्येखा
अयूं छ भलु त्योहार ,
भै-बैण्यूं का बीच खत्येणू
संग्तिs प्यार -उल्यार |
-ऐग्ये रखड़ी कु त्योहार ,ऐग्ये रखड़ी कु त्योहार..
© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
*आजौ मनखी*
आज,
बुबा-अपणा लड़िक बिटीक
लड़िक- ब्वे बुबा बिटीक
मनखी- परिवार बिटीक
परिवार- समाज बिटीक
अलग होणू छ ,
किलैकि !
वो
आजौ मनखी छ |
© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
हिन्दी की प्रतिष्ठित मासिक प्रत्रिका ' हलन्त ' के अगस्त-2019 के अंक में संदीप रावत जी की गढ़वाली कथा संग्रह "उदरोळ " की समीक्षा साहित्यकार ,विचारक व समीक्षक डॉ. चरणसिंह केदारखंडी जी द्वारा ------
**पहाड़ी लोकजीवन का साहित्यिक इंद्रधनुष है 'उदरोळ' **
- डॉ. चरणसिंह केदारखंडी
श्रीनगर गढ़वाल में बसे और पेशे से रसायन विज्ञान के शिक्षक श्री संदीप रावत गढ़वाली भाषा, समालोचना ,कहानी और काव्य विधा के उदीयमान नक्षत्र हैं। वे शिक्षा और साहित्य के साथ साथ गढ़संस्कृति की सराहनीय सेवा कर रहे हैं। युवा पीढ़ी के इस लिख्वार की प्रतिभा ने गढ़ साहित्य के वेहद प्रतिष्ठित नामों जैसे दिवंगत भगवती प्रसाद नौटियाल, व्यंग्यकार भाई नरेंद्र कठैत,डॉ अचलानंद जखमोला, भीष्म कुकरेती ,गीतकार नेगी दा, श्रीमती बीना बेंजवाल और कवि ओमप्रकाश सेमवाल को सम्मोहित किया है। उनकी अभी तक प्रकाशित रचनाओं ने बौद्धिक जगत में व्यापक सराहना पायी है, जिसने निश्चित रूप में रावत जी को बेहतर करने के लिए प्रेरित किया होगा। पहाड़ में रहकर जिन लोगों की स्वासों में पहाड़ के दुःख दर्द, भूख नांग, बेकारी और विडंबनाएं सकारात्मक संभावनाओं का स्पर्श पाती हैं, संदीप रावत उनमे से एक हैं। एक ऐसे समय में जब आर्थिक और शैक्षिक रूप से समृद्ध उत्तराखंड की नयी पीढ़ी अपनी बोली भाषा, तीज त्यौहार ,संस्कृति और सरोकारों से निरंतर दूर होती जा रही है, ऐसे में प्रोफेसर दाता राम पुरोहित और संदीप रावत होने के गहरे निहितार्थ हैं।
अपने व्यवहार और आचरण में पहाड़ी सरलता और खुशबू का एहसास लिए संदीप जी की सृजन यात्रा पहली कृति 'एक लपाग' से शुरू हुई। दूसरी कृति के रूप में उन्होंने 'गढ़वळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा' लिखी जो अब तक रचे गए गढ़वाली साहित्य की समालोचनात्मक मीमांसा है ।संदीप जी 'रंत रैबार' ,'खबर सार' ,डाँडी-कांठी सहित गढ़वाली को स्थान देने वाली हिंदी की सम्मानित पत्रिकाओं (जैसे हलंत,युगवाणी और रीजनल रिपोर्टर ) में भी खूब छपते हैं ।उनकी तीसरी रचना 'लोक का बाना' इसी तरह के प्रकाशित/अप्रकाशित गढ़वाली आलेख और निबंधों का संग्रह है।
अब रावत जी अपनी चौथी और नवीनतम कृति 'उदरोल' लेकर हमारे बीच आये हैं जो उनकी 34 गढ़वाली कथाओं का संग्रह है। उदरोल शब्द घपरोल के करीब है जिसका अर्थ है विघ्न पैदा करना, दूसरों को लड़ाना, उनके काम में खलल डालना। उदरोल्या आदमी "tall poppy syndrome" की बीमारी से ग्रसित होता है और "हो त हो नैतर भौ ही खो" के दर्शन को मानता है। मुश्किल ये है कि हम सबके भीतर एक उदरोय्या बैठा हुआ है !
चौतीस कहानियों 86 पृष्ठओं के इस लघु संग्रह को उनके आकार के बजाय आखर और सन्देश की गहराई से मापकर ही हम उसके साथ न्याय कर सकेंगे। गढ़वाली व्यंग्य और कहानी में बेहद प्रतिष्ठा हासिल कर चुके शिक्षक/साहित्यकार भाई डॉ प्रीतम अपछयाण ने इस संग्रह की सारगर्भित भूमिका लिखी है। जीवन के रंग अपनी पूरी रौ के साथ संग्रह में इस तरह समाहित हैं कि प्रीतम जी को भूमिका में लिखना पड़ा : " इ 'लघु कथा' नीन बल्कन कथा ही छन जो छवटा रूप मा छन "(पृष्ट 10).
इस कहानी संग्रह में पहाड़ी लोकजीवन का पूरा इंद्रधनुष समाया हुआ है।इसमें दर्द है(पहली कहानी 'हलचिरु') तो रूहानी प्रेम की इबारतें भी हैं(सैंदाण)। इसमें भुतानुराग है( 'चौक' कहानी ) तो मानवता के श्रेष्ठ किस्से भी पिरोये गए हैं(मनख्यात कहानी पढ़कर आप द्रवित हुए बिना नहीं रह सकेंगे).
एक लोक साहित्यकार के तौर पर संदीप जी आंचलिक भाषा के लुप्त हो चुके शब्दों, स्वादों, ध्वनियों और एहसासों का कोलाज पाठक के सामने इतने रुचिकर तरीके से रखते हैं कि उनके सम्मोहन से बच पाना असंभव लगने लगता है !
'उदरोल' की ज्यादातर कहानियां दो पृष्ठ की हैं,यानी चाय की प्याली ख़त्म करने से पहले पाठक एक कहानी पूरी पढ़ लेता है लेकिन उसके सन्देश को समझने के लिए पूरा सप्ताह भी कम है।
पहली कहानी 'हलचिरु' है जो दो भाईचारे (भयात),प्रेम और फिर दुःखद बँटवारे का तफसरा है हालाँकि कहानी उनके मिलन में संपन्न होती है इसलिए 'हलचिरु' इतना नहीं चुभता। लेखक समाज के दुःख दर्दों ,उसकी बीमारियों और विकृतियों का दृष्टा होने के साथ साथ समाज का वैचारिक अगुआ और मार्गदर्शक भी होता है। पहाड़ी समाज आज भी बहुत सारी कुरीतियों के फेर में है जिसकी वजह से भोला भाला आदमी अपनी गाढ़ी कमाई को तांत्रिकों और 'बक्या' लोगों के हवाले कर देता है। इसी आलोक में लिखी गई है 'बक्या' कहानी जो समकालीन समय के लिए आईना है। 'चौक' कहानी में पाठक पहाड़ों के लिए अभिशाप बन चुके पलायन के दर्द पर आधारित है । पूरे बीस साल बाद जब कहानी का नायक संजू अपने गांव लौटता है तो चौक की हालत देखकर अवाक् रह जाता है :
"आज वे चौक कि हालात देखिक वे कि आँखयूँ मा अंशुधरि ए ग्येनि।पैली कन आबाद रानु छो यो चौक ! ये चौक मा पैली कन घपल चौदस मचीं रांदि छै ,पर आज सब्या कुछ बदलि ग्ये छो"(पृष्ठ 32)।
संग्रह की 12वीं कहानी 'मनख्यात' यानी मानवता युद्ध के दर्शन पर आधरित है। भक्ति और अंध राष्ट्रवाद के सतही जोश के अतिरिक्त भी युद्ध की एक भयावह और ज़मीनी सच्चाई होती है । युद्ध कोई नहीं चाहता।मरना कोई नहीं चाहता : ये दुनियां एक सैनिक को भी बहुत भाती है; जान को कौड़ियों के मोल कोई नहीं बिकाना चाहता है। लेखक ने इस दिशा में सही चिंतन किया है :
"लड़े कब्बि बि कैका वास्ता भली नि रै। चाहे वो अपूणु ह्वा या पर्यावु ,लड़े त लड़े होंद जैमा सदानि ल्वे कि खतरि होंद"(41).
आदिवासी कबीलों की तरह आपस में एक दूसरे को मिटाने को आतुर आज के देशों के लिए कितना बड़ा सन्देश है ! 'सैंदाण' का अर्थ 'प्रेम की निशानी या समौण से है जिसे हम सौवेनिर भी कहते हैं। ये मोहन और मधु के रूहानी और अफलातूनी प्रेम का अफसाना है जिसमे दिवंगत पत्नी की निशानी (बेटी मोनी) की ख़ातिर नायक जीवन समर्पित कर देता है। 'रामु चकडै़त' दोस्तों के बीच होने वाले लोभ ,स्वार्थ और धोखे के प्रति सावधान करती कहानी है। वही शीर्षक कहानी 'उदरोळ ' में "मुस्या" चंट की दास्ताँ हैं जिसका काम लोगों के हँसते खेलते परिवारों में विग्रह पैदा करना है। गांव इस तरह के खुरापातियों के मुख्यालय बने हुए हैं जहाँ मामूली चीज़ों के लिए आप लोगों को उलझते देख सकते हैं...
कुल मिलाकर मुझे उदरोळ समकालीन पहाड़ी जनजीवन का बोलता आईना प्रतीत होता है।अपनी बोली भाषा और समाज संस्कृति से जुड़े हर संवेदनशील आदमी को इस किताब को पढ़ना और खरीदना चाहिए।
© समीक्षक - डॉ. चरणसिंह केदारखंडी
पुस्तक - उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह)
कथाकार - संदीप रावत
प्रकाशक - उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ
नोट - पुस्तक प्राप्ति स्थान -
(1) उत्कर्ष प्रकाशन / फ्लिफ कार्ड
(2) अनूप सिंह रावत ,रावत डिजिटल ,नई दिल्ली
(3 ) विद्या बुक डिपो ,नई दिल्ली |
(4) भट्ट ब्रदर्स ,बसंत विहार ,देहरादून |
(5) ट्रांस मीडिया ,निकट रेनबो स्कूल ,श्रीनगर गढ.
(6) सरस्वती पुस्तक भंडार ,श्रीनगर गढ़वाल |
* जिन्दगी का पन्ना *
जब खुल्दन कैsकी
जिन्दगी का पन्ना
किताबि का जन्ना
त ! यां का भित्र छुप्यां होंदन
राज कन-कन्ना ,
कैsका त भ्वरे जांदिन
अर ! कैका क्वारा हि रै जांदिन
जिन्दगी का पन्ना |
© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
( ' एक लपाग ' बटि )
अलगवादी अर आतंकी तत्वों फर एक *चटगताल*
धारा - 370
ह्वे ग्ये धारा तीन सौ सत्तर, जे. एण्ड के. मा खतम
कन पड़ि चटगताल बड़ी ,अब 'आतंक ' पर चट्टम |
मर्जी नी अब चलण 'तुमारि ',ल्यावा चुसणा चूसा
हत्थ बांधिक राखा, द्याखा ,बैठ्यां रावा वखम |
सब्या धाणि ,लाणू - खाणू ,रैणू जब यखा कु छौ
क्यांकि छै फिर सुद्दि कि सेक्खी , पत्त प्वड़ौ पत्तम |
नि छौ 'देस'से बड़ाे कब्बि क्वी बि ,य बात किलै भुलै ? रावा अंक्वैकि 'तुम' निथर,नि रौण ये जुगता वे जुगतम |
© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल 05 अगस्त 2019 (जे.के.मा धारा 370 खतम होण परैं )
*सळ्ळि - सयाणा *
" बल, बगच्छट बण्या
सळ्ळि सयाणा
त्रिभुज- चतुर्भुज बणैकि
फिर झट्ट एक ह्वे जाणा
अर! वख तक पौंछणा खुणी
तीड़- तिकड़म भिड़ाणा
भैर - भैर द्विफंडी- तिफंडी
अर! भितरै - भितर
एक गौळा पाणि ह्वे जाणा |"
© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल
" पहाड़ "
पहाड़ रड़णा छन
लोग उंदू सरकणा छन
जो छन यख
वू पाणी को तरसणा छन,
नीस घाट्यों मा
ब्वगणी छ गंगा
पर! पाणी-पाणी सारि-सारि कि
यख मुण्डळी खुर्स्येणी छन |
© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
* देखी सक्दि त देखी ले *
मन कि आँख्यून अफुथैं अफूं देखी सक्दि त देखी ले
घुप अँध्यरा मा बि उज्याळु देखी सक्दि त देखी ले |
भितर अपणू ल्वे बगद कै$न कब्बि नि देखी रे
भितर तेरा कतगा सक्या परेखी सक्दि परेखी ले |
फेल-पास से कुछ नि होंद सबसे बड़ी करमों कि जात
हो आज मा तू भोळ अपणू देखी सक्दि त देखी ले |
अपणा हिस्सा को द्यू अफ्वीं यख बळण पड़द मेरा दिदा
कै$का सारा कब तै रैलू अफूं हिटीक त देखी ले |
दुख कि घाण दिक्क -पराण जीवन का हिस्सा -किस्सा छन
हो पीड़ मा बि आस देखी सक्दि छैयी त देखी ले |
Copiright रचनाकार व कम्पोजर/गीतकार © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |