मेरी प्रकाशित पुस्तकें :-


(1) एक लपाग ( गढ़वाली कविता-गीत संग्रह)- समय साक्ष्य, (2) गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा (गढ़वाली भाषा साहित्य का ऐतिहासिक क्रम )-संदर्भ एवं शोधपरक पुस्तक - विन्सर प्रकाशन, (3) लोक का बाना (गढ़वाली आलेख संग्रह )- समय साक्ष्य, (4) उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह )- उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ


Showing posts with label गढ़वाली भाषा. Show all posts
Showing posts with label गढ़वाली भाषा. Show all posts

Monday, October 21, 2019

आलेख - **भारत में आम जन जीवन की एक आदर्श स्तिथि * * © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

आलेख- *भारत में आम जनजीवन की एक आदर्श स्तिथि *
                  
            © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
    
         यहां पर अपने देश में  सभी के जीवन की आदर्श स्तिथि के बारे में कुछ लिखने की शुरुआत सभी लोगों की मँगल कामना हेतु मैं अपनी ही गढ़वाली रचना की दो पंक्तियों से करता हूं -

**ना भूखू रौवु ना तीसू क्वी ,ना नांगू ना रूदों रुफड़ाणू क्वी ,
मेरी जन्मभूमि हे भारत माता ! गौ-गँगा माता ईं धरती मा**
        
       जब हम जिंदगी के एक आदर्श स्तिथि की बात करते हैं तो सोच-विचार करना लाजमी है |  हर एक हाथ को काम यानि रोजगार ,सभी के लिए शिक्षा ,सबके लिए स्वास्थ्य सुविधा , सबके लिए अच्छा सा  घर (छोटा हो या बड़ा ,  ये प्रश्न नहीं ),सबकी सुरक्षा , शांति और साथ-साथ कुछ उम्मीदें |
         हमारे देश ने  विज्ञान ,टेक्नोलॉजी एवं औद्योगिकीकरण में काफी उपलब्धियां हासिल कर ली हैं ,परन्तु अभी भी कई चुनौतियां शेष हैं |  हर किसी की जुबान पर आज *विकास* शब्द है और देश से लेकर राज्य तक ,शहर से लेकर गाँव तक विकास की चर्चा होती है | साथ ही इस शब्द के साथ उम्मीदें जग रही हैं और उम्मीदें बढ़ रही हैं | इस दिशा में पूरे देश में प्रयास हो रहे हैं  और देश में विकास कुछ हद तक हो भी रहा है ,परन्तु सभी के सपने साकार होने में वक्त लग सकता है | देश के प्रत्येक नागरिक को अपने सपनों में मानवीयता एवं संवेदनाओं को भी जगह देने की आवश्यकता है और साथ ही  प्रत्येक नागरिक द्वारा राष्ट्र की मजबूती के लिए नि:स्वार्थ भाव से योगदान देने की आवश्यकता है |
       यह भी सोचना आवश्यक है कि -अपने देश में विभिन्न वर्गों के  क्या सभी परिवारों में विकास हो रहा होगा ? क्या सभी लोगों की सोच में परिवर्तन हो रहा है ? क्या  पूरे देश, हर राज्य , हर शहर एवं घर-गाँवों में महिलाओं की स्तिथि वास्तव में बेहतर हो चुकी है? क्या देश में अभी भी सभी जगह स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो पा रही हैं?
         यह माना जा रहा है कि  भारत एक सबसे युवा देश है  और युवा शक्ति हमारे देश की उम्मीद है | परन्तु नई पीढ़ी के प्रति उत्तरदायित्व भी बहुत हैं |  जो समाज अपनी नई पीढ़ी के प्रति उत्तरदा़यित्वों का सही ढंग से निर्वाह नहीं करेगा तो उस समाज की गतिशीलता कम होती जाएगी और वह समाज  पिछड़ सकता है  | आज के समय में शिक्षा की सर्वांगीणता, गुणवत्ता एवं उपयोगिता बढ़ाने की आवश्यकता  है | नई पीढ़ी को पथभ्रष्ट होने से बचाना होगा और उसको अपनी जड़ों से जोड़ना भी आवश्यक है |
       आज हमारे देश में शिक्षा का ग्राफ काफी बढ़ा है | परन्तु सामने यह सवाल भी खड़ा है कि जो अपनी शिक्षा पूर्ण कर चुके हैं ,क्या उन्हें काम मिल गया है? रोजगार मिल गया है? वास्तविकता यह है कि यहां बढती हुई जनसंख्या के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार नहीं बढ़े हैं | सभी सरकारी नौकरी की चाह रखते हैं ,परन्तु यह संभव भी नहीं कि सभी को सरकारी नौकरी के अवसर मिल जाएं |
        निजी क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की आज आवश्यकता है |उद्योगों को बढ़ाने की बहुत आवश्यकता है , परन्तु अत्यधिक मुनाफाखोरी पर लगाम भी आवश्यक है | देश की प्रगति के लिए सभी को स्वार्थ से किनारा करना आवश्यक है | जिसका भी अपना रोजगार है ,उसे अपने रोजगार हेतु संसाधन उपलब्ध हो सकें यह आवश्यक है | हमारे देश में जो अन्नदाता (किसान) हैं उनकी समस्याओं की ओर भी ध्यान देना उतना ही जरूरी है ,जितनी अन्य बातें |
            कभी गर्मी में लू बहुत जिन्दगियां लील जाती है | अब सर्दी का आगमन हो चुका है , दिसम्बर-जनवरी  माह में ठण्ड का प्रकोप बढ़ जाता है | यह बिडम्बना है कि कई बेघर लोगों के लिए ठण्ड जानलेवा साबित हो जाती है | अत: सभी के लिए बुनियादी आवश्यकताओं की मांग को नकारा नहीं जा सकता | अतीत से सबक लेना आवश्यक है और सभी का साथ-साथ  चलना आवश्यक है ,उदारवाद की आवश्यकता है |
        अति भौतिकता की चकाचौंध में वस्तुओं को जोड़ते-जोड़ते ,इकट्ठा करते-करते हम लोग ही इक सामान बन गए हैं | ईश्वर तक को इक सामान मान चुके हैं |सांसारिक जंजाल बढ़ चुका है और अति लोभ के कारण हम सभी वस्तुओं का गुलाम बनते जा रहे हैं | वस्तुओं  के अनियंत्रित उपभोग पर नियंत्रण भी आवश्यक है तभी मानसिक शांति आ पाएगी | इस संदर्भ में महाकवि गोपालदास नीरज की ये पंक्तियां याद आती हैं-      

"जितना कम सामान रहेगा
उतना सफर आसान रहेगा |
जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू  हैरान रहेगा |
          सब खुशहाल रहें ,सभी आगे बढ़ें , आवो साथ चलें |
      © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

        

Thursday, August 8, 2019

समीक्षा - 'उदरोळ 'गढ़वाली कथा संग्रह

          हिन्दी की प्रतिष्ठित  मासिक प्रत्रिका  ' हलन्त ' के  अगस्त-2019 के अंक में संदीप रावत जी की गढ़वाली  कथा संग्रह  "उदरोळ " की समीक्षा  साहित्यकार ,विचारक व समीक्षक डॉ. चरणसिंह केदारखंडी जी द्वारा ------

**पहाड़ी लोकजीवन का साहित्यिक इंद्रधनुष है 'उदरोळ' **
                                - डॉ. चरणसिंह केदारखंडी
   
      श्रीनगर गढ़वाल में बसे और पेशे से रसायन विज्ञान के शिक्षक श्री संदीप रावत गढ़वाली भाषा, समालोचना ,कहानी और काव्य विधा के उदीयमान नक्षत्र हैं। वे शिक्षा और साहित्य के साथ साथ गढ़संस्कृति की सराहनीय सेवा कर रहे हैं। युवा पीढ़ी के इस लिख्वार की प्रतिभा ने गढ़ साहित्य के वेहद प्रतिष्ठित नामों जैसे दिवंगत भगवती प्रसाद नौटियाल, व्यंग्यकार भाई नरेंद्र कठैत,डॉ अचलानंद जखमोला, भीष्म कुकरेती ,गीतकार नेगी दा, श्रीमती बीना बेंजवाल और कवि ओमप्रकाश सेमवाल को सम्मोहित किया है। उनकी अभी तक प्रकाशित रचनाओं ने बौद्धिक जगत में व्यापक सराहना पायी है, जिसने निश्चित रूप में रावत जी को बेहतर करने के लिए प्रेरित किया होगा। पहाड़ में रहकर जिन लोगों की स्वासों में पहाड़ के दुःख दर्द, भूख नांग, बेकारी और विडंबनाएं सकारात्मक संभावनाओं का स्पर्श पाती हैं, संदीप रावत उनमे से एक हैं। एक ऐसे समय में जब आर्थिक और शैक्षिक रूप से समृद्ध उत्तराखंड की नयी पीढ़ी अपनी बोली भाषा, तीज त्यौहार ,संस्कृति और सरोकारों से निरंतर दूर होती जा रही है, ऐसे में प्रोफेसर दाता राम पुरोहित और संदीप रावत होने के गहरे निहितार्थ हैं।
      अपने व्यवहार और आचरण में पहाड़ी सरलता और खुशबू का एहसास लिए संदीप जी की सृजन यात्रा पहली कृति 'एक लपाग' से शुरू हुई। दूसरी कृति के रूप में उन्होंने 'गढ़वळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा' लिखी जो अब तक रचे गए गढ़वाली साहित्य की समालोचनात्मक मीमांसा है ।संदीप जी 'रंत रैबार' ,'खबर सार' ,डाँडी-कांठी सहित गढ़वाली को स्थान देने वाली हिंदी की सम्मानित पत्रिकाओं (जैसे हलंत,युगवाणी और रीजनल रिपोर्टर ) में भी खूब छपते हैं ।उनकी तीसरी रचना 'लोक का बाना' इसी तरह के प्रकाशित/अप्रकाशित गढ़वाली आलेख और निबंधों का संग्रह है।
अब रावत जी अपनी चौथी और नवीनतम कृति 'उदरोल' लेकर हमारे बीच आये हैं जो उनकी 34 गढ़वाली कथाओं का संग्रह है। उदरोल शब्द घपरोल के करीब है जिसका अर्थ है विघ्न पैदा करना, दूसरों को लड़ाना, उनके काम में खलल डालना। उदरोल्या आदमी "tall poppy syndrome"  की बीमारी से ग्रसित होता है और "हो त हो नैतर भौ ही खो" के दर्शन को मानता है। मुश्किल ये है कि हम सबके भीतर एक उदरोय्या बैठा हुआ है !
      चौतीस कहानियों 86 पृष्ठओं के इस लघु संग्रह को उनके आकार के बजाय आखर और सन्देश की गहराई से मापकर ही हम उसके साथ न्याय कर सकेंगे। गढ़वाली व्यंग्य और कहानी में बेहद प्रतिष्ठा हासिल कर चुके शिक्षक/साहित्यकार भाई डॉ प्रीतम अपछयाण ने इस संग्रह की सारगर्भित भूमिका लिखी है। जीवन के रंग अपनी पूरी रौ के साथ संग्रह में इस तरह समाहित हैं कि प्रीतम जी को भूमिका में लिखना पड़ा : " इ 'लघु कथा' नीन बल्कन कथा ही छन जो छवटा रूप मा छन "(पृष्ट 10).
      इस कहानी संग्रह में पहाड़ी लोकजीवन का पूरा इंद्रधनुष समाया हुआ है।इसमें दर्द है(पहली कहानी 'हलचिरु') तो रूहानी प्रेम की इबारतें भी हैं(सैंदाण)। इसमें भुतानुराग है( 'चौक' कहानी ) तो मानवता के श्रेष्ठ किस्से भी पिरोये गए हैं(मनख्यात कहानी पढ़कर आप द्रवित हुए बिना नहीं रह सकेंगे).
     एक लोक साहित्यकार के तौर पर संदीप जी आंचलिक भाषा के लुप्त हो चुके शब्दों, स्वादों, ध्वनियों और एहसासों का कोलाज पाठक के सामने इतने रुचिकर तरीके से रखते हैं कि उनके सम्मोहन से बच पाना असंभव लगने लगता है !
'उदरोल' की ज्यादातर कहानियां दो पृष्ठ की हैं,यानी चाय की प्याली ख़त्म करने से पहले पाठक एक कहानी पूरी पढ़ लेता है लेकिन उसके सन्देश को समझने के लिए पूरा सप्ताह भी कम है।
     पहली कहानी 'हलचिरु' है जो दो भाईचारे (भयात),प्रेम और फिर दुःखद बँटवारे का तफसरा है हालाँकि कहानी उनके मिलन में संपन्न होती है इसलिए 'हलचिरु' इतना नहीं चुभता। लेखक समाज के दुःख दर्दों ,उसकी बीमारियों और विकृतियों का दृष्टा होने के साथ साथ समाज का वैचारिक अगुआ और मार्गदर्शक भी होता है। पहाड़ी समाज आज भी बहुत सारी कुरीतियों के फेर में है जिसकी वजह से भोला भाला आदमी अपनी गाढ़ी कमाई को तांत्रिकों और 'बक्या' लोगों के हवाले कर देता है। इसी आलोक में लिखी गई है 'बक्या' कहानी जो समकालीन समय के लिए आईना है। 'चौक' कहानी में पाठक पहाड़ों के लिए अभिशाप बन चुके पलायन के दर्द पर आधारित  है । पूरे बीस साल बाद जब कहानी का नायक संजू अपने गांव लौटता है तो चौक की हालत देखकर अवाक् रह जाता है :
"आज वे चौक कि हालात देखिक वे कि आँखयूँ मा अंशुधरि ए ग्येनि।पैली कन आबाद रानु छो यो चौक !  ये चौक मा पैली कन घपल चौदस मचीं रांदि छै ,पर आज सब्या कुछ बदलि ग्ये छो"(पृष्ठ 32)।
    संग्रह की 12वीं कहानी 'मनख्यात' यानी मानवता युद्ध के दर्शन पर आधरित है। भक्ति और अंध राष्ट्रवाद के सतही जोश के अतिरिक्त भी युद्ध की एक भयावह और ज़मीनी सच्चाई होती है । युद्ध कोई नहीं चाहता।मरना कोई नहीं चाहता : ये दुनियां एक सैनिक को भी बहुत भाती है; जान को कौड़ियों के मोल कोई नहीं बिकाना चाहता है। लेखक ने इस दिशा में सही चिंतन किया है :
"लड़े कब्बि बि कैका वास्ता भली नि रै। चाहे वो अपूणु ह्वा या पर्यावु ,लड़े त लड़े होंद जैमा सदानि ल्वे कि खतरि होंद"(41).
     आदिवासी कबीलों की तरह आपस में एक दूसरे को मिटाने को आतुर आज के देशों के लिए कितना बड़ा सन्देश है ! 'सैंदाण' का अर्थ 'प्रेम की निशानी या समौण से है जिसे हम सौवेनिर भी कहते हैं। ये मोहन और मधु के रूहानी और अफलातूनी प्रेम का अफसाना है जिसमे दिवंगत पत्नी की निशानी (बेटी मोनी) की ख़ातिर नायक जीवन समर्पित कर देता है। 'रामु चकडै़त' दोस्तों के बीच होने वाले लोभ ,स्वार्थ और धोखे के प्रति सावधान करती कहानी है। वही शीर्षक कहानी 'उदरोळ ' में "मुस्या" चंट की दास्ताँ हैं जिसका काम लोगों के हँसते खेलते परिवारों में विग्रह पैदा करना है। गांव इस तरह के खुरापातियों के मुख्यालय बने हुए हैं जहाँ मामूली चीज़ों के लिए आप लोगों को उलझते देख सकते हैं...
कुल मिलाकर मुझे उदरोळ समकालीन पहाड़ी जनजीवन का बोलता आईना प्रतीत होता है।अपनी बोली भाषा और समाज संस्कृति से जुड़े हर संवेदनशील आदमी को इस किताब को पढ़ना और खरीदना चाहिए।
  © समीक्षक - डॉ. चरणसिंह केदारखंडी                 
                पुस्तक - उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह)
                               कथाकार - संदीप रावत
                          प्रकाशक - उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ
                             
  नोट -  पुस्तक प्राप्ति स्थान -
            (1) उत्कर्ष प्रकाशन / फ्लिफ कार्ड
      (2) अनूप सिंह रावत ,रावत डिजिटल ,नई दिल्ली
        (3 ) विद्या बुक डिपो ,नई दिल्ली  |
         (4) भट्ट ब्रदर्स ,बसंत विहार ,देहरादून  |
     (5) ट्रांस मीडिया ,निकट रेनबो स्कूल ,श्रीनगर गढ.
     (6) सरस्वती पुस्तक भंडार ,श्रीनगर गढ़वाल |
                                        

Wednesday, August 7, 2019

गढ़वाळि कविता - जिन्दगी का पन्ना © संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल ('एक लपाग 'बटि )

                  * जिन्दगी का पन्ना *

जब खुल्दन कैsकी
जिन्दगी का पन्ना
किताबि का जन्ना
त ! यां का भित्र छुप्यां होंदन
राज कन-कन्ना ,
कैsका त भ्वरे जांदिन
अर ! कैका क्वारा हि रै जांदिन
जिन्दगी का पन्ना |
               © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
                              ( ' एक लपाग ' बटि )

Monday, August 5, 2019

अलगवादी अर आतंकवादी तत्वों फर इक चटगताल -© संदीप रावत

     अलगवादी अर आतंकी तत्वों फर एक *चटगताल*
          धारा - 370

ह्वे ग्ये धारा तीन सौ सत्तर, जे. एण्ड के. मा खतम
कन पड़ि चटगताल बड़ी ,अब 'आतंक ' पर चट्टम |
मर्जी नी अब चलण 'तुमारि ',ल्यावा चुसणा चूसा
हत्थ बांधिक राखा, द्याखा ,बैठ्यां रावा वखम |
सब्या धाणि ,लाणू - खाणू ,रैणू  जब यखा कु छौ
क्यांकि छै फिर सुद्दि कि सेक्खी , पत्त प्वड़ौ पत्तम |
नि छौ 'देस'से बड़ाे  कब्बि क्वी बि ,य बात किलै भुलै ? रावा अंक्वैकि 'तुम' निथर,नि रौण ये जुगता वे जुगतम |
              
© संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल 05 अगस्त 2019 (जे.के.मा धारा 370 खतम होण परैं )

Thursday, August 1, 2019

गढ़वाली कविता - "सळ्ळि -सयाणा " ©संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

        *सळ्ळि - सयाणा *

" बल,  बगच्छट बण्या
सळ्ळि सयाणा
त्रिभुज- चतुर्भुज बणैकि
फिर झट्ट एक ह्वे जाणा
अर! वख तक पौंछणा खुणी
तीड़- तिकड़म भिड़ाणा
भैर - भैर द्विफंडी- तिफंडी
अर! भितरै - भितर
एक गौळा पाणि ह्वे जाणा |"
                  © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल
 

Monday, July 29, 2019

गढ़वाली कविता - पहाड़ -1 ( ©संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल)

              " पहाड़ "

पहाड़ रड़णा छन
लोग उंदू सरकणा छन
जो छन यख
वू पाणी को तरसणा छन,
नीस घाट्यों मा
ब्वगणी छ गंगा
पर! पाणी-पाणी सारि-सारि कि
यख मुण्डळी खुर्स्येणी छन |
              © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |

गढ़वाली सरस्वती वंदना.."तेरु ही शुभाशीष च "के बारे में

https://youtu.be/bln8Zw25B30

Friday, June 28, 2019

गढ़वाली सरस्वती वंदना (तेरू ही शुभाशीष च), गढ़वाली गीत ( मि वे मुल्क कु छौं)

गढ़वाली  कवि एवं गीतकार संदीप रावत (श्रीनगर गढ़वाल ) की रचनाएं -

(1) गढ़वाली सरस्वती वंदना -
                  *तेरू ही शुभाशीष च *
तेरू ही शुभाशीष च हे जो कुछ बि पायि मिन
माता सरस्वती हे माँ , माता सरस्वती हे माँ
माता भगवती हे माँ .....

गीत, शब्द, लय ,ताल ,छन्द त्वेसे ही औंदन
मिठ्ठी वाणी,मिठ्ठा बोल कण्ठ त्वेसे ही औंदन
मेरा कण्ठ -कलम मा वास हो , कण्ठ -कलम मा वास हो
माता सरस्वती हे माँ..
तेरू ही शुभाशीष च हे जो कुछ बि पायि मिन..

मि निराट अग्यानी छौ ,खोटु छौ मि भारी माँ
कुबट्ट बटि सुबाटोम् त्वेन ही मी राखी माँ
सत का बाटाें हिटदी रौंवु , सच सदानि लिखदी रौंवु
माता सरस्वती हे माँ....
तेरू ही शुभाशीष च हे जो कुछ बि पायि मिन
     © संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल

(2)गीत-
            *मि वे मुल्क कु छौं *

मि वे मुल्क कु छौंऊँ जख डांडी काँठी बच्यान्द
हवा गीत लगान्द अर डाळी साज बजान्द।

मुण्ड मा हिमालै कु मुकुट सज्यूं पैतळ्यूं हरि -हरद्वार
बनी- बनी की छन जैड़ी -बूटी, बनी -बनी फूल-फुल्यार
सडक्यूं का उंचा-निसा घूम पुंगडी पठाली भली सुहान्द
मी वे मुल्क कु छौऊँ जख डांडी -काँठी बच्यान्द।

द्वादश ज्योतिर्लिंग मा केदार , जख भू बैकुंठ धाम
ऋषि मुनि द्यो- द्यबतौं की धरती जै देव भूमि बोलदान
गंगा जमुना कु मैत जख ,ज्योत अखंड जगी रान्द
मी वे मुल्क कु छोऊँ जख डांडी- काँठी बच्यान्द।

हिंसोळा किनगोड़ा,तिमला,काफळ करहिंस्वाळी कि मिठास
छ्युतम्यळि,आडू,-अखोड़, सीमळा कु कनु भलु चलमुळु स्वाद
बारा बनी की रस्याळ सक्या मनख्यूं की बढान्द
मी वे मुल्क कु छौंऊँ जख डांडी काँठी बच्यान्द।

लगदा मंडाण, नचदन पण्डौं झमकदो झुमैलो झुमान्द
भला -भला गीतों का.झमकों मा मनखी खैरी अपणी भुलान्द
कफू, हिलाँस का सुर सुणेंदा घुर -घुर घुघुती घुरान्द
मी वे मुल्क कु छौंऊँ जख डांडी -काँठी बच्यान्द।

मन कुंगळा मनख्यों का अर क्वांसो छन पराण
सेवा -सौंळी न्यूत- ब्यूंत की रीत मा जख रस्याण
मिठ्ठी -मयळदी बोली -भाषा जिकुड़्यूं छ्पछ्पी लान्द
मी वे मुल्क कु छौंऊँ जख डांडी- काँठी बच्यान्द |
© संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल |
      
              
     
            

Friday, June 14, 2019

गढ़वाली रचना - देखी सक्दि त देखी ले

                  * देखी सक्दि त देखी ले *
मन कि आँख्यून अफुथैं अफूं देखी सक्दि त देखी ले
घुप अँध्यरा मा बि उज्याळु  देखी सक्दि त देखी ले  |

भितर  अपणू ल्वे   बगद  कै$न कब्बि नि देखी रे
भितर तेरा कतगा सक्या परेखी  सक्दि परेखी ले  |

फेल-पास से कुछ नि होंद  सबसे बड़ी करमों कि जात
हो आज मा तू भोळ अपणू  देखी  सक्दि  त देखी ले  |

अपणा हिस्सा को द्यू अफ्वीं यख बळण पड़द मेरा दिदा
कै$का  सारा कब   तै रैलू अफूं हिटीक त देखी ले  |

दुख कि घाण दिक्क -पराण जीवन का हिस्सा -किस्सा छन
हो पीड़ मा बि  आस देखी सक्दि छैयी त देखी ले  |
    
Copiright रचनाकार व कम्पोजर/गीतकार © संदीप  रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |