मेरी प्रकाशित पुस्तकें :-


(1) एक लपाग ( गढ़वाली कविता-गीत संग्रह)- समय साक्ष्य, (2) गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा (गढ़वाली भाषा साहित्य का ऐतिहासिक क्रम )-संदर्भ एवं शोधपरक पुस्तक - विन्सर प्रकाशन, (3) लोक का बाना (गढ़वाली आलेख संग्रह )- समय साक्ष्य, (4) उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह )- उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ


Thursday, February 25, 2021

** भारत सरकार के 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा )'में पौड़ी जनपद में 'लोकपाल ' पद पर प्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार, समालोचक, समाज वैज्ञानिक एवं 'आखर ' समिति के मार्गदर्शक डॉ.अरुण कुकसाल की नियुक्ति **

श्रीनगर गढ़वाल - 
           बहुत ही हर्ष का विषय है कि - प्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार, समालोचक, समाज वैज्ञानिक एवं  'आखर ' समिति  के मार्गदर्शक श्रद्धेय डॉ.अरुण कुकसाल जी को भारत सरकार  के प्रतिनिधि के रूप में ' महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ' से सम्बद्ध शिकायतों के निवारण एवं उनके अनुश्रवण के लिए चयन समिति की संस्तुति के आधार पर उत्तराखंड के जनपद पौड़ी (गढ़वाल) में 'लोकपाल ' के  महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया गया है।
       सर्वविदित है कि समाज वैज्ञानिक, प्रशिक्षक, लेखक और घुमक्कड़ डाॅ. अरुण कुकसाल का पैतृक गांव 'चामी '( असवालस्यूं )  पौड़ी गढ़वाल में  है। वे अर्थशास्त्र विषय में पीएच.डी. हैं। हिमालयी समाज के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मुद्दों पर पत्र - पत्रिकाओं तथा सोशियल मीडिया में नियमित लेखन करते हैं। डाॅ. कुकसाल की उद्यमिता विकास, यात्रा साहित्य तथा सांस्कृतिक विषयक 7 पुस्तकें प्रकाशित हैं। उद्यमिता शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए 'राष्ट्रीय उद्यमी उत्प्रेणा प्रशिक्षक सम्मान' प्राप्त है। 
      अनगिनत पुस्तकों का  गहन अध्ययन कर उनकी समलोचना करने वाले डॉ. अरुण कुकसाल जी     आकाशवाणी के नियमित वार्ताकार हैं। विद्यालयी शिक्षा, उत्तराखंड की पाठ्यचर्या में उद्यमिता विकास पाठ्यक्रम के समावेश में महत्वपूर्ण योगदान है।
 
       'गिरी विकास अध्ययन संस्थान 'उ.प्र., लखनऊ ( जीआईडीएस ),  उद्यमिता विकास संस्थान उ.प्र., लखनऊ ( आईईडीयूपी ), राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, उत्तराखंड ( एससीईआरटी ) तथा राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्, उत्तराखंड ( यूकाॅस्ट ) में महत्वपूर्ण पदों पर प्रशंसनीय एवं महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

     वर्ष-2016 में स्वैच्छिक सेवा - निवृत्ति के बाद वर्तमान में आदरणीय डाॅ. अरुण कुकसाल जी  अपने पैतृक गांव ' चामी' में बच्चों, युवाओं और महिलाओं के लिए पुस्तकालय संचालन, कम्प्यूटर प्रशिक्षण तथा कैरियर मार्गदर्शन के कार्य में सक्रिय हैं। साथ ही बतौर समाज सेवी के रूप में  अभी तक 15 बार रक्तदान कर चुके हैं। डॉ. कुकसाल जी का  सानिध्य, मार्गदर्शन  एवं आशीर्वाद आखर ' समिति को सदैव  मिला है। 

         'लोकपाल' जैसे इस महत्वपूर्ण पद पर चयनित होने पर आदरणीय डॉ.अरुण कुकसाल जी को  मेरी एवं  'आखर ' परिवार  की ओर से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ।
                                            संदीप रावत 
                                   अध्यक्ष - 'आखर 'समिति 
                                        श्रीनगर गढ़वाल।

Sunday, February 21, 2021

श्रीनगर गढ़वाल- 'आखर समिति ' ने मनाया अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (संदीप रावत )

"आखर समिति ने मनाया अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस "

श्रीनगर गढ़वाल - आखर समिति ने 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर शगुन वेडिंग प्वाइंट (यूनिटी स्क्वायरभवन) में कार्यक्रम आयोजित किया। इस अवसर पर वक्ताओं ने मातृभाषा के पक्ष में, गढ़वाली को बढ़ावा देने एवं इस भाषा के विकास हेतु अपनी-अपनी बात रखी और इस बात पर जोर दिया कि - "आम जन को अपनी मातृभाषा के विकास व संरक्षण हेतु आगे आना ही होगा एवं नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोड़ने का संकल्प लेना ही होगा ,क्योंकि हमारी मातृभाषा हमारी पहचान है और यह हमारी अस्मितता से जुड़ी है। "
    आखर समिति द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत अथितियों द्वारा दीप प्रज्वलन एवं नवोदित कवयित्री कंचन पंवार द्वारा गढ़वाली सरस्वती वंदना से हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद डॉ.विष्णुदत्त कुकरेती ने की। कार्यक्रम में प्रसिद्ध समाजसेवी व आन्दोलनकारी श्री अनिल स्वामी ,श्री डी. पी.खंडूड़ी ,डॉ0 अरुण कुकसाल, शिक्षक व रा. शि. संघ के पूर्व मण्डलीय महामंत्री श्री शिव सिंह नेगी विशिष्ट अथिति के रूप मे उपस्थित थे। श्रीमती आरती पुंडीर ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत किया।
    डॉ. अरुण कुकसाल ने कहा कि - "हमें मातृभाषा बचाने की पहल अपने घर से करनी होगी। साथ ही मातृभाषा के सम्बर्धन हेतु इस तरह के प्रयास बहुत आवश्यक हैं। "                कार्यक्रम अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.विष्णुदत्त कुकरेती  ने कहा कि - " अपनी मातृभाषा के संरक्षण एवं सम्बर्धन हेतु उसे अपने दैनिक जीवन में प्रयाेग करना होगा, सभी को इसे व्यवहार में लाना होगा । " श्री शिव सिंह नेगी ने कहा कि - "मातृभाषा के संरक्षण में संदीप रावत और आखर समिति के प्रयास व योगदान प्रेरणादायी हैं । गढ़वाली भाषा के संरक्षण एवं सम्बर्धन हेतु नई पीढ़ी को इससे जोड़ना होगा। "
     प्रसिद्ध समाजसेवी श्री अनिल स्वामी ने इस अवसर पर कहा कि - " इस तरह के कार्य समाज के लिए प्रेरणादायी हैं।गढ़वाली भाषा के संरक्षण हेतु 'आखर ' का यह प्रयास प्रेरक व सराहनीय है। "
      श्रीकृष्ण उनियाल, श्री विजय मेवाड़, शगुन रेस्टोरेंट के श्री प्रमोद उनियाल , श्री अरुणेश मैठाणी, श्री कमलेश बडोनी, डॉ.सुभाष पांडेय , श्री विभोर बहुगुणा,
श्रीमती आरती पुण्डीर ,श्रीमती बबीता थपलियाल मैठाणी, श्रीमती रेखा चमोली, , श्रीमती अंशी कमल, श्रीमती अनिता काला, श्रीमती राधा मैंदोली, श्रीमती सायिनी उनियाल, कंचन पंवार, श्वेता पंवार आदि गणमान्य लोग शामिल थे।
       इस अवसर पर कार्यक्रम में गढ़वाली कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। साथ ही उपस्थिति समस्त अन्य अतिथियों ने भी अपने -अपने विचार गढ़वाली में रखे।
गढ़वाली भाषा-साहित्य के लिए समर्पित 'आखर 'समिति के अध्यक्ष संदीप रावत ने कहा कि - "आखर समिति उत्तराखण्ड मातृभाषा अभियान ' द्वारा उत्तराखण्ड की मातृभाषाओं के पक्ष में लगभग पिछले एक महीने से अलग-अलग क्षेत्र एवं अलग- अलग पेशे से जुड़े व्यक्तियों के वीडियो के माध्यम से भी सोशल मीडिया पर इस अभियान को चला रही है। इस अभियान की संकल्पना एवं विचार गुजरात सूरत में रहने वाले 'आखर 'के सक्रिय एवं वैचारिक सदस्य गीतेश नेगी की है। इस कार्यक्रम का मुख्य मकसद ये है कि - अपनी मातृभाषा के प्रति यहाँ का समाज जागरूक हो। "
     कार्यक्रम का संचालन आखर की सक्रिय सदस्य कवयित्री एवं मोटिवेशनल स्पीकर श्रीमती बविता थपलियाल ने किया। अंत मे 'आखर' के अध्यक्ष संदीप रावत ने उपस्थित सभी अथितियों का आभार व्यक्त किया।  

Monday, February 1, 2021

#उत्तराखण्ड मातृभाषा अभियान मा आखर#*21 फरवरी खुणी अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस परैं आखर समिति द्वारा आयोजित होलु कार्यक्रम*

श्रीनगर गढ़वाल - #उत्तराखण्ड मातृभाषा अभियान  मा आखर#
*21 फरवरी खुणी  अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस परैं आखर समिति द्वारा उर्ये जालो कार्यक्रम*
       श्रीनगर का  शगुन रेस्टोरेंट मा  गढ़वाळि भाषा- साहित्य तैं समर्पित  "आखर " कि बैठक  ह्वे , जै मा आखर द्वारा चलाए जाण वळा "उत्तराखंड मातृभाषा अभियान " परैं चर्चा  ह्वे।  ये अभियानै  संकल्पना युवा गढ़वाळि साहित्यकार अर  ' आखर ' का सक्रिय सदस्य सूरत (गुजरात ) मा रौण वळा  गीतेश नेगी कि छ जै मा उत्तराखंड का  सब्बि  रैबासी - प्रवास्यों अर संस्थाओं से ये अभियान मा शामिल होंणै धै- धाद  लगाये जाणि छ। मातृभाषा परैं सामाजिक चिन्तन अर गम्भीरता से वूं का संरक्षण संवर्धन अर अपणा  दैनिक जीवन मा वूं को व्यवहारिक प्रयोग परैं जोर दीणै कोसिस करे जाणि च।
         'आखर ' दगड़ि समाज की हौरि बि प्रबुद्ध संस्था ,बुद्विजीवियों अर साहित्यकारों भौत बढ़िया वैचारिक सहयोग ईं दिशा मा मिलणू  छ अर भौत सारी  संस्था 21 फरवरी,  अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस  परैं  कार्यक्रम आयोजित कन्नै तैयारी कन्नी छन। 
         ईं  बैठक मा य बात  तै ह्वे  कि  21फरवरी  खुणी आखर समिति  'अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस ' परैं कार्यक्रम आयोजित कारलि।  बैठक मा ईं बात परैं बि  भाैत नाराजगी व्यक्त कर्ये गे कि -  अब्बि तक उत्तराखंड का गौरव , गढ़वाळि गीत -संगीत का युगपुरुष अर कालजयी रचनाकार श्रद्धेय" श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी " तैं  क्वी "पद्म "सम्मान किलै नि दिए गे। 
          आखर कि ईं  बैठक मा  पिछला मैना दिवंगत होंण वळा   वरिष्ठ  गढ़वाळि कथाकार श्री बृजेन्द्र कुमार नेगी जी तैं बि श्रद्धांजलि अर्पित कर्ये ग्ये।  बैठक मा श्री मुकेश काला, श्री प्रभाकर बाबुलकर, श्री राकेश जिर्रवाण,  संदीप रावत ,  श्रीमती अनीता काला , श्रीमती बवीता थपलियाल मैठाणी,  श्रीमती आरती पुंडीर, श्रीमती रेखा चमोली छा। 
                                                संदीप रावत
                                         अध्यक्ष - आखर समिति 
                                             श्रीनगर गढ़वाल ।

Friday, January 22, 2021

भावों का दगड़ा विचारों कि मजबूत जमीन कि उपज च "घुर घुघुती घुर " - संदीप रावत

समीक्षा - कविता संग्रै " घुर घुघुती घूर "
             
                कवि - गीतेश नेगी
      प्रकाशक -धाद प्रकाशन, वर्ष 2017 में प्रकाशित 
 समीक्षक - संदीप रावत, श्रीनगर गढ़वाल ,वर्ष - 2018

   
भावों का दगड़ा विचारों कि मजबूत जमीन कि उपज च "घुर घुघुती घुर " - संदीप रावत
          सक्रिय गढ़वाळि कविता तैं आज लगभग 113  साल ह्वे ग्येनि । आज गढ़वाळि कविता भौत सुन्दर ढंग से रच्येणी बि छन ,पढ़ेणी बि छन त मंचों पर्बि प्रस्तुत होणी छन। कुल मिलैकि आज गढ़वाळि कविता समाज मा भौत बढ़िया ढंग से स्थापित ह्वे ग्ये। गढ़वाळि साहित्य मा  अबारि बि सबचुले जादा  कविता ही लिख्येणी छन पर असरदार अर परिपक्व  रचना यानि जौं कवितौं प्रभाव पढ़ण- सुणणा का बाद बि रै जावु ,  कुछ -कुछ ही लिख्येणी छन।
          अबारि गढ़वाळि कवितौं तैं जै ढंग से अगन्या बढ़ण चैंद वा अन्वार अर कलेवर गढ़वाळि काव्य संग्रै   *घुर घुघुती घुर * मा बखूबी द्यिखेंद। यो  गढ़वाळि  काव्य संग्रै परदेस मा रैकि बि  अपणि थाति अर अपणि मातृभाषा मा अपणो आत्म सम्मान द्यखण वळा, गढ़वाळि भाषा-साहित्य का प्रति सदानि चितळो , नै छ्वाळि का हुणत्याळा लिख्वार,गद्य अर पद्य द्विया विधौं कु हिट्वाक गीतेश नेगी कु छ। माना कि "घुर घुघुती घुर " गातेश नेगी कि पैली प्रकाशित  गढ़वाळि पुस्तक  छ  पर  ये कवि कि   गढ़वाळि कविता , गजल , गीत ,व्यंग बर्सूं  पैलि  बटि पत्र-पत्रिकौं मा प्रकाशित होणी छन।
              जैं काव्य पोथि कि पवांण ,इंटरनेट पर गढ़वाळि भाषा-साहित्य का भीष्म पितामह आदरणीय भीष्म कुकरेती जीक लेखीं होवुन त फेर वीं पोथिक बारा मा ,वीं पोथिक रचनाकार का बारा मा लिखण सौंगु नि रै जांद। फिर्बि  "घुर घुघुती घुर "काव्य पोथि तैं पढ़ीक मि तैं  जन मैसूस ह्वे,जु विचार म्येरा दिल-दिमाग मा ऐनि  वु विचार इख मा फ्वळणै कोसिस करी।
             "घुर घुघुती घुर " काव्य संग्रै कि माळा मा गीतेश नेगी का उणसठ (59) काव्य रूपी बनि-बन्या फूल गैंठsयां छन। ईं माळा मा यो फूल छ्वट्टि -बड़ी कवितौं का रूप मा,क्वी गीत अर एक-द्वी गजल का  का रूप मा छन। ये काव्य संग्रै कि  जादातर रचना वेका अपणा गौं-गुठ्यार,अपणि थाति यानि पहाड़ से जुड़ीं  गम्भीर भाव वळि छन जो कि पढ़दरा का भितर यानि जिकुड़ि तक पौंछण मा सुफल होणी छन। ईं पोथिक कविता परिपक्व छन अर सैsर-बजारों मा रौण वळाें का दगड़ा पहाड़ मा छुट्यां सब्या लोगूं कि अन्वार दिखौंदन ,सच्चै तैं उजागर कर्दन।
           "घुर घुघुती घुर "काव्य संग्रै कि कविता आस जगौंदन । ईं पोथिक शुर्वात बि *आस कु पंछी * कविता से होंद, जै मा कवि बोल्द-
    " क्या पता ह्वे जावु इक दिन
       वूं थैं मेरी पीड़ा कु एहसास
       अर वू सैद बौड़िक आला म्यारा ध्वार
       अपणा घार ,अपणा पहाड़ "
     वास्तौ मा इक आस त सदानि लगीं रांद ,चाहे कुछ बि ह्वे जावु। आज सैर्या पहाड़ पलायनै पीड़ा  सैsणू छ। पर क्या कन्न ?  पहाड़ौ मानवीकरण कवि कु भौत बढ़िया ढंग से कर्यूं छ। चुप राैण वळा पहाड़ दगड़ा आज बिज्यां छेड़छाड़ बि त ह्वे ग्ये। पहाड़ कि दशा पर *पहाड़* रचना मा पहाड़ को मानवीकरण द्यखण लैक च अर दगड़ा -दगड़ि य रचना पहाड़ का भितरै पीड़ा तैं ये तरौं से भली कैरी छलकाणी छ -
      " म्यारू मुंडरू म्यारू उकताट
         अर मेरी पीड़ा साख्यूं कि
          जु अब बणी ग्याई मी जन
           म्यार ही पुटूग ,एक ज्वालामुखी सी
            जु कब्बि बि फुट सकद। "
       ईं पोथिक कतगै रचना चखुला,गोर ,फ्यूंली-बुरांस ,डाळि-बोट्यूं दगड़ा मनखीक रिस्तौं तैं उजागर कन्नी छन। कवितौं मा जख आम बोलचाल का गढ़वाळि शब्द ,मुहावरा छन त दुसरी तर्फां कवितौं मा अलंकार ,प्रतीक अर बिम्बों को सफल प्रयोग होयूं छ ,जो कि कवितौं तैं असरदार अर मजबूत बणौणी छन। * त्वे औण प्वाड़लु* रचना मा कवि  इन बोल्दु-
       " बसगळया  गदन्यूं का रौळियाण से पैली
          डाळ्यूं मा चखल्यूं का चखुल्याण से पैली
          त्वे आण प्वाड़लु "
* जग्वाळ * जनि रचनौं मा उपमाओं कु भौत अच्छु प्रयोग होयूं छ -
      " धुरपळी को द्वार सी ,बसगळ्या नयार सी
         द्यखणी छन बाटु आँखि
         कन्नी उळर्या जग्वाळ सी "
       उत्तराखण्ड बणणा 17-18 साल बाद बि यख पहाड़ या  आम मनखीक स्वीणा ,स्वीणा ही रै ग्येनि। कुछ लोगूं खुणी त मौज-मस्ती रै अर यख चकड़ैतूं कि एक बड़ी फौज खड़ी ह्वे । बिल्कुल सै शुर्वात करी कविन *जय हो उत्तराखण्ड * कविता कि-
        " गलदरूं की , ठेकेदारूं की
           जय हो उत्तराखण्ड त्यारा सम्भलदारूं की |"
       यख विकास का वास्ता क्षेत्रवाद,जातिवाद,भै-भतीजावाद, भिरस्टाचार,बेरोजगारी अर पलायन कि *केर * बंधण भौत जरूरी छ ,इलैई त कवि  छ्वट्टि कविता *केर * मा बोल्द -
"क्षेत्रवाद ,जातिवाद,भ्रस्टाचार ,मैंगै ,बेरोजगारी ,
  अशिक्षा,पलायन
  जरा बांधा धौं केर यूं कि पहाड मा
अगर बांधि सक्दौं त। "
            गीतेश नेगी व्यंगकार बि च , इलै वे कि अधिकतर कविता  व्यंग शैली मा छन । गंडेळ ,घिन्डुड़ी ,बिरळु, कटगळ, विगास, सरकार ,चुनौ ,डाम ,योजना, ख्वींडा सत, ठेकेदारी , गोर आदि कविता व्यंग्यात्मक शैली मा छन। * गोर * कविता कि इक झलक -
       " सब्यूं का छन  अपणा - अपणा ज्यूड़ा
          अपणा- अपणा कीला
         अर अपणा- अपणा गोर  , बंध्यां साख्यूं बटि "
          जख भैर का परवाण बणि जावुंन त कन क्वै होण वखा भलो। ईं बात तैं  छ्वट्टि सि  कविता * परवाण * भलि कैरीक बिंगौंद -
    " वू घार ,वू गौं ,वू समाज ,वू मुल्क ,वू देश
      जखै तखि रै जांदिन ,
      जख थर्पे जांदिन, भैरक बणीक परवाण। "
      य बिडम्बना ही च  कि गढ़वाळ मा रै कि अर गढ़वाळि ह्वेकि बि हमुतैं गढ़वाळि नि आंदि। * किराण * कविता ईं बिडम्बना तैं उजागर कर्द -
       " निर्भगी घुन्ड-घुन्डौं तक फुक्ये ग्यो
          पर किराण अज्यूं तक नि आई ?
           मी तुम्हारी मातृभाषा छौं
           मेरी कदर अर पच्छ्याण
            तुम तैं अज्यूं तक नि ह्वाई। "
       गीतेश नेगी मा बि घुघुती जन मयळदुपन च अर कारिज का प्रति उन्नि एकाग्रता बि छ। परदेस मा रै कि बि वु सदानि अपणि माटि,मातृभाषा से जुड्यूं छ।   अपणि पैली गढ़वाळि पोथि कु नौ *घुर घुघुती घुर * रखीक वेन  ईं बात कि सार्थकता बढ़ै। पहाड़,अपणि बोली-भाषा तैं ज्यूंदो रखणा वास्ता यु मयळदुपन अर या एकाग्रता सब्यूं मा  होण जरूरी छ।   शीर्षक कविता * घुर घुघुती घुर * एक मार्मिक कविता छ। वास्तौ मा आज यख  पहाड़ मा घुघुती वूं सब्यूं खुणी घुरणी छ जो स्यकुंद बौग मारीक चली ग्येनि ,अर फेर बौड़िक नि ऐनि। शीर्षक कविता कि शुर्वात-
       " हैरी डाँड्यूं का बाना, हिंवाळी काँठ्यूं का बाना
          बांजा रै जु स्यारा रौंतेली वूं पुंगड्यूं का बाना
          घुर घुघुती घुर। "
     फ्यूंली,बुरांस अज्यूं बि उन्नि खिलदन ,हिंसोळा-किनगोड़ा-काफळ  अपणा टैम पर अज्यूं बि पकदन पर  वूं तैं जिमण वळा यख अब क्वी-क्वी ही रयांन। इलै ही *त्वे बिना * कविता मा कवि लिख्द-
         " खिल्यां फूल फ्यूंली अर बुरांस का ,
             पंदेरा कि बारामासी छ्वीं-बत्था 
           सब्बि बैठ्यां छन बौग मारीक चुपचाप त्वे बिना " 
         ईं पोथिक आखरी कविता * वूंल बोलि * छ ,ज्वा उत्तराखण्ड कि दशा तैं उजागर कर्द कि पहाड़ौ विकास पहाड़ मा ना बल्कन दिल्ली-देरादूण मा होणू छ। ईं कविता मा कवि का विचार अर भाव ये तरौं छन -
           " हमारू पाणि कनै पैटि
              हमारि सड़क कख बिरड़ि
              हमारा डाक्टर बिमार छन कि व्यवस्था .... "
             ईं बात मा क्वी सक-सुबा नी कि - *घुर घुघुती घुर*  अच्छी रचनौं कि  पोथि छ जै मा भाव पक्ष का दगड़ा विचार पक्ष बि भौत मजबूत छ। शिल्प अर शैली का हिसाबन बि ईं पोथिक अधिकतर रचना बढ़िया छन। बोलि सकदां कि - ईं पोथिक  रचना   पढ़णौ बाद यि रचना पढ़दरा पर बाद तक असर बि डलणी छन   ज्यांका बान यि कविता  रच्ये ग्येनि। ईं पोथिक रचना अनुभव जन्य छन। आदरणीय भीष्म कुतरेती जी ईं पोथिक भूमिका मा ठिक ही लिखदन कि - "गीतेश कि कविता मा कथगै रंग-बिरंगा रस दिख्येंदन। "
      भाषा अर शब्दोंक हिसाब से कुछ एक जगौं पर कमी सि लग्दि। ईं पोथि मा कुछ-कुछ जगौं पर प्रुफ कि गल्ति बि रै ग्येनि जो कि थ्वड़ा भौत अक्सर सब्या गढ़वाळि भाषा कि पोथ्यूं मा रै जांद। गढ़वाळि भाषा कि मजबूती अर विकास का वास्ता अब गढ़वाळि का सब्या लिख्वारूं तैं मानकीकरण कि तर्फां बि बढ्यूं चैंद। वूं शब्दों जादा प्रयोग कन्न चैंद जु सब्यूं का बिंगणा मा आसानि ऐ जावुन। सब्यूं का लेखन मा क्रिया रूप/ क्रियापदों मा बि एकरूपता अब जरूरी छ।
             भला आकार,सुन्दर मुखपृष्ठ का दगड़ा  ठेठ गढ़वाळि शब्दूं को प्रयोग ईं पोथि मा होयूं छ। गढ़वाळि साहित्य पिरेम्यूं तैं, नै छ्वाळि का लिख्वारूं तैं /कविता रंंचदरों तैं , हम सब्यूं तैं हौरि गढ़वाळि किताब्यूं दगड़ा  *घुर घुघुती घुर * जरूर पढ्यूं चैंद  अर ईं पोथिक स्वागत हम सब्यूं तैं कन्न चैंद। गीतेश नेगी तैं गढ़वाळि भाषा कि  ईं सुन्दर  पोथि का वास्ता भौत-भौत बधै अर हार्दिक शुभकामना। 

नोट  - य समीक्षा धाद, रंत रैबार आदि मा प्रकाशित छ (  वर्ष - 2018 )
                                         संदीप रावत 
                                न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल 

                  
                            


Tuesday, January 19, 2021

"गजब कु हुनर छ संगीता तिवाड़ी लखेड़ा जी मा " © संदीप रावत, श्रीनगर गढ़वाल।

  "गजब कु हुनर छ संगीता तिवाड़ी लखेड़ा जी मा "
              © संदीप रावत, श्रीनगर गढ़वाल
     हर मनखि मा कुछ न कुछ हुनर य कला जरूर होंद। बस ! वीं कला य हुनर तैं पछ्याणणा जरूरत होंद, फैलास देणा जरूरत होंद । य 'कला' कबि चीजों, अनुभवाें अर ' कै टैम ' तैं अमर बणे देंद। क्वी बि कला मन तैं खुश करद, आनंद देंद। ' कला ' भावनाओं कि अभिव्यक्ति होंद। 'कला ' कथगै तरों कि होंदन। ' दृश्य कला '(विसुअल आर्ट ) मा पेंटिंग, चित्रकारी को महत्वपूर्ण स्थान छ।
     इन्नी , देहरादून मा रौण वळी, भगवान गोपीनाथ जी कि धरती ' गोपेश्वर ' मा पढ़ीं - लिख्यीं अर एक कुशल गृहणी श्रीमती संगीता तिवाड़ी लखेड़ा जी मा बि गजब कु हुनर छ, गजब कि कला छ। जब वूंन मि तैं मेरु ऐन -सैन 'पेंसिल स्कैच' भेजि त मन खिलपत ह्वे ग्ये।

        सै बात त य बि छ कि  -  वो पेंटिंग बि गजबै बणाैंदन। वूं का माँ सरस्वती जी, भगवान बद्रीविशाल जी , राधा - कृष्ण जी, माँ लक्ष्मी जी, भोलेनाथ जी, श्री राम जी आदि कि भौतै बढ़िया पेंटिंग बणाई छन अर महापुरुषाें, कलाकारों का उम्दा पेंसिल स्कैच बणायां छन । 

   यां का अलावा वूं कि अपणि कलम -कूंचि दार्शनिक पक्षों पर बि चलाईं छ। जन कि - वूं कि 'आँखि ' पर बणाईं पेंटिंग द्यखण लैक छ। ब्वलदन बल - 'वु आँखि आँखि नि छन जो सच तैं नि देखि सक्दि, सच्चै दर्शन नि करोंदिंन।' हमारा सुख- दुख, खुशी सब्या कुछ बतै दिंदन आँखि। 
   वूं कि य पेंटिंग भौत कुछ बिंगाणी छ । 
' साकेत गर्ग ' जी कु बि लेख्युं च -
"सुनो प्यारी नैना
हमेशा खुश ही रहना।
दबना न किसी गलत से,
हमेशा सच को सच ही कहना। "
स्कूल टैम बटि वूं तैं चित्रकारी अर पेंटिंग कु शौक छाै, पर वै टैम परैं प्रचार - प्रसार नि करी छौ अर ना ही वु अपणी ईं कला तैं भैर लै सकनि। वूं कि य कला काॅपी का भितर ही रै गे छै अर फिर दबीं ही रैगे।

    बड़ी बात त य बि छ कि लॉक डाउन मा अब वूंन अपणा ये हुनर तैं हौरि निखारि अर फैलास देणा छन। 

       मेरी ईं स्कैच का वास्ता, मि तैं य 'समूण' देणा वास्ता आपाै भौत -भौत आभार अर धन्यवाद आदरणीय श्रीमती संगीता तिवाड़ी लखेड़ा जी। माँ सरस्वती कि कृपा आप परैं सदानि बणी रौवु अर आपका ये हुनर तैं, ईं कला तैं हौरि फैलास (विस्तार) मिलाे, ईं शुभकामना का दगड़ा ---
                                           संदीप रावत
                               न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल।

Thursday, January 7, 2021

* स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर शास्त्री "प्रमुख "जी की पुण्यतिथि (07 जनवरी) पर " उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित *


*स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर शास्त्री "प्रमुख "जी की पुण्यतिथि(07 जनवरी) पर "सम्मान समारोह "का आयोजन* 

      दिवंगत प्रसिद्ध समाजसेवी, कर्म निष्ठ एवं लगभग 27 साल तक निरंतर कोट ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रहने वाले स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर "प्रमुख "जी की पुण्य तिथि (07 जनवरी ) पर श्रीनगर गढ़वाल में (अंजलि मेडिकल के ऊपर शगुन वेडिंग पॉइंट में )हिलांस" व "देवप्रयाग प्रकाश पुंज" सामाजिक संस्था द्वारा एक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। साथ ही स्व. बाबुलकर जी के चित्र पर माल्यार्पण कर सभी के द्वारा पुष्पांजली एवं श्रद्धांजलि दी गई।  स्व. बाबुलकर 
  जी की धर्मपत्नी श्रीमती चंद्रकांता डबराल बाबुलकर जी ने स्मृति चिह्न प्रदान किए। 
       इस कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विष्णु दत्त कुकरेती जी ने की। विशिष्ट अथिति के रूप में गंगा आरती, श्रीनगर के अध्यक्ष श्री प्रेम बल्लभ नैथानी जी, प्रसिद्ध समाज सेवी श्री अनिल स्वामी जी, प्रसिद्ध आंदोलनकारी  श्री मदन मोहन नौटियाल जी की गरिमामयी उपस्थिति थी। इस अवसर पर  श्री सुभाष चंद्र भट्ट जी, 'आखर ' के अध्यक्ष संदीप रावत, स्व.अनिल काला जी की पत्नी एवं शिक्षिका श्रीमती अनीता काला जी आदि ने भी विचार व्यक्त किए। इस सम्मान समारोह में श्री मुकेश काला जी, स्व. बाबुलकर जी के सुपुत्र श्री आदित्य नारायण बाबुलकर जी एवं 
श्री सुधाकर बाबुलकर जी , श्री मदन लाल  डंगवाल जी, डॉ. सुभाष पांडेय जी, शगुन टैण्ट   हॉउस व शगुन रेस्टोरेंट के श्री उनियाल जी,  श्री राकेश पालीवाल जी  , श्री जय बल्लभ ध्यानी जी  , बैंक ऑफ़ इंडिया के मैनेजर - श्री यमुना प्रसाद डोभाल जी आदि की गरिमामयी उपस्थिति रही। 
      इस सम्मान समारोह में 2020 की इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा में बहुत ही  अच्छा प्रदर्शन  करने के लिए छात्र सिद्धांत कोटियाल व अभिसार काला को सम्मानित किया गया । साथ ही प्रसिद्ध समाज सेवी श्रद्धेय श्री अनिल स्वामी जी एवं प्रसिद्ध आंदोलनकारी श्रद्धेय श्री मदन मोहन नौटियाल जी को भी  सम्मानित किया गया। 
        कार्यक्रम का संचालन स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर "प्रमुख "जी के सुपुत्र पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष श्री प्रभाकर जी ने किया।
          
       स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर "शास्त्री " जी 25 साल की उम्र में   कोट ब्लॉक के  प्रमुख बन गए थे  और 26 - 27 साल तक लगातार वहां के   ब्लाक प्रमुख रहे। (1962 से 1988 तक हुए कोर्ट ब्लॉक की प्रमुख रहे) और उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। उनकी जन्मस्थली एवं कर्मस्थली दोनों ही माता सीता जी के स्थान हैं जो कि दिव्य स्थान हैं। स्व.सुन्दर लाल बाबुल कर जी वर्ष 1960 में अपनी ग्राम सभा मुछीयाली (कोट ब्लॉक ) गांव के प्रधान बने और वर्ष 1962 में जब पहला पंचायत चुनाव हुआ तो वे कोर्ट ब्लॉक के प्रमुख पहली बार में ही चुने गए। कहा जा सकता है कि वे कोट ब्लॉक के प्रथम प्रमुख थे और वर्ष 1988 तक ब्लॉक प्रमुख रहे। स्व. बाबुल कर जी स्व.हेमवती नंदन बहुगुणा जी के निकटस्थ लोगों में से थे। ज्ञातव्य है कि स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर जी उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध दिवंगत साहित्यकार स्व.मोहनलाल बाबुलकर जी के बड़े भाई थे। 
       स्व.सुन्दरलाल बाबुलकर जी सदस्य -जिला परिषद पौड़ी गढ़वाल, सदस्य- श्री बद्रीनाथ /केदारनाथ मंदिर समिति, सदस्य- गढ़वाल विश्वविद्यालय स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति, सदस्य- इंजीनियरिंग कॉलेज घुड़दौडी, सदस्य- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, अध्यक्ष - स्वास्थ्य समिति जिला परिषद पौड़ी गढ़वाल, अध्यक्ष- जनता इंटर कॉलेज भल्ले गांव एवं देहलचौरी, अध्यक्ष- श्री रघुनाथ कीर्ति आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, प्रबंधन समिति देवप्रयाग रहे। 
          कर्मयोगी, स्पष्टवादी, संयमी दिवंगत विभूति सुन्दरलाल बाबुलकर "  "जी को विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत -शत नमन। 🙏🙏🙏🙏               
                                     संदीप रावत 
                               अध्यक्ष - आखर समिति 
                               न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाल। 

Wednesday, January 6, 2021

"लोक का बाना" पुस्तक बटि आलेख-- " लोक बटि हर्चदा जाणू छ लोक साहित्य "©संदीप रावत,न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाळ, मोबैल 09720752367

 " लोक बटि हर्चदा जाणू छ लोक साहित्य "
                    ©संदीप रावत, न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाळ
                                         
      कै बि समाज, क्षेत्र, जाति या देशा जीवन मा लोक साहित्य अर लोक संस्कृत्यो बड़ो महत्व होंद। एक तरौं  यो कै समाजै लोक जीवना बारा मा बतौंदन।   लोकसाहित्यै क्वी निश्चित परिभाषा देण कठिन छ। लोक  को सम्बन्ध आत्मिक होंद अर यो प्रकृति से प्रभावित होंद। अगर लोक बटि प्रकृति तैं हटै द्यूंला त साहित्य अर लोकसाहित्य मा हम फर्क नि करी सकदां। लोक साहित्य लोकमानस कि सहज अर स्वाभाविक अभिव्यक्ति होंद। ये मा दिखलौट बिल्कुल बि नि होंद। यो अलिखित होंद अर अपणि मौखिक या वाचिक परम्परा से एक पीढ़ि बटि हैंका पीढ़ि  मा जाणो रैंद। यु मन्ये जांद कि लोक साहित्य का रचनाकार अज्ञात होंदन।
     मोहनलाल बाबुलकर जीक् अनुसार- ‘लोक कि वु सब्या अभिव्यक्ति जौं मा लोक रचना शक्ति का दर्शन होंदन वु लोक साहित्य  छ।’ वास्तौ मा लोक साहित्य वा मौखिक अभिव्यक्ति छ क्वी न क्वी मनखी रचद,गढ़द पर वे तैं आम लोक समूह अपणु समझद किलैकि वो लोक हृदय मा रचि- बस जांद।  लोक साहित्य कि क्वी एक निश्चित विधा नि होंदि , यो त आचार- बिचार, लोकोक्ति, लोककथा,लोकगाथा, लोक गीत्वूं का  रूप मा एक पीढ़ि बटि हैंकि पीढ़ि मा जाणी रांद।
       प्रसिद्ध समालोचक अर साहित्यकार भगवती प्रसाद नौटियाल जीक् अनुसार-
‘‘लोकसाहित्य कि वास्तविक जैड़  लोक संस्कृत्या भितर होंद। लोक साहित्य केवल साहित्य नी बल्कि यांका अलौ धर्म, इत्यास , समाजशास्त्र,पुराण,आख्यान यानि सब्या कुछ यांका भितर छिप्यूं होंद।  लोकसाहित्य लोकसांस्कृतिक वैविध्य को समग्र रूप छ अर यो लोकजीवन को ऐना होंद।’’
लोकसाहित्य कख्या बि हो ,वो समृद्ध होंद अर वेकि अपणी सक्या होंद। हमारो लोक साहित्य बि भौत समृद्ध छ अर येको भण्डार झक्क भ्वर्यूं छ। लोकसाहित्य मा सब्या भावना, खुद को चित्रण, प्रकृति को चित्रण, लोककथा, लोकगाथा-जागर, पवाड़ा, लोक गीत, आणा-पखाणा,भ्वीणा-मैणा, जंत्र-तंत्र, लोक आस्था, सब्या कुछ ऐ जांद। पर लोकसाहित्यौ काम  केवल लोकगीत ,लोककथा या कहावतों तें इकबटोळ कन्न नि होंद बल्कि या त् आदिकाल बटि अनन्त काल तक मनख्यूं कि जीवन जात्राम् संग्ति ब्वगणी वळी धारा छ। लोक साहित्य कि या विशेषता छ कि भाषागत अलग-अलग होण पर्बि भावों कि नजर से सब्या जगौं या एक जन लगद । लोकसाहित्यम् खराब, बुरो अर अमंगल का वास्ता क्वी जगा नी।
      इतिहासकार डाॅ0शिवप्रसाद नैथानीक् अनुसार-‘‘ लोक साहित्य अर लोकसंस्कृति मा ब्वे अर औलादौ रिश्ता होंद।जन औलाद अपणी ब्वे कि बोली याने मातृभाषौ पैलो शब्द सुण्द या सिख्द,ये ही तरौं से साहित्य अपणा जल्मदै ही सबसे पैलि अपणि लोक संस्कृत्यौ परिचय द्येण चांद। पैलि लोक साहित्य वाचिक होंदु छौ,फिर पढ़ेण बैठि अर आज त सुणण अर द्यखणै चीज ह्वेग्ये। देव सिंह पोखरिया भाषा संस्थान उत्तराखण्ड कि शोध पत्रिका ‘उद् गाथा-2010’ मा अपणा लेख मा लिखदन कि-‘‘ लोक साहित्य लोक धर्म तैं दगड़ा लेकि चल्द। जो जंत्र-मंत्र ब्वल्ये जांदा छा पैलि त वां से बिमार आदिम बि ठिक ह्वे जांदो छौ, इथगा शक्ति होंदि छै लोकमंत्रों मा।’’  उत्तराखण्डा उंचा-निसा पयार, पहाड़ै चुलंखी अर नीस गाड-गदिन्या गैरी घाटि, धारा-पंद्यरा,रौंत्येळा डांडा-कांठा,चखुल्यों  च्वींच्याट, सुकेली हव्वा,यखै लैरी-खैरी हमारा जीवन तैं एक अलग द्यखणौ देंदन। अप्रत्यक्ष रूप मा यो सब हमारा जीवन मा समोदर जन गैरै अर धर्ति जन धीरज देंदन, टक्क लगैकि मीनत अर काम कन्नै सक्या देंदन। यखै लोक साहित्य अर परम्परा ये पहाड़ी समाज मा ही ज्यूंदो रैंद, कखि दूर गौं-गौळौंम् ज्यूंदो रैंद। हमारा जीवन कि सब्या अभिव्यक्ति लोकगीत ,लोककथौं या कहावतोंक् रूप मा बिकसित ह्वेनि अर यों से ही फिर हमारि लोक परम्परा, रीति रिवाज बणीन। लोक मा भौत कुछ छिप्यूं या दब्यूं
रैंद,फ्वळ्यूं रैंद पर अब आम लोग पहाड़ बटि स्यकंुद यानि सैर-बजारों तर्फां सटगणा छन त इलै लोक बि हर्चदा जाणू छ अर लोक साहित्य बि  कम होंदा जाणू छ। लोक साहित्य कखि दूर पहाड़ों   अर वख बस्यां गौंम् उपजि,जख मनखीन् भेळ-भंकार अर पाखा द्यखनी, डांग या ढुंगो जन कठोर जमीन मा अभौ का बीच बि हैंसदा-हैंसदा केवल ज्यूंदो नि रै बल्कि जीवन तैं भली कैरिक् जीणो सीख। वख ही लोकरंग,लोक साहित्य अर लोकसंस्कृति को जन्म व्हे । लोक साहित्य पैलि आम लोख्वूं जीवन मा ज्यूंदो छौ,रैंदो छौ,फ्वल्यूं छौ। जन जन समौ बदल्य हर्बि-हर्बि लोकसाहित्य बि कम होंदा ग्ये। आज लोकसाहित्य पढ्येणू छ, दिखाये जाणू छ पर आज यो लोक बटि हर्चदा जाणू छ। अबारि लोक साहित्य बस कखि-कखि ही दूर गौं-गळों  मा जयूंदो छ।
    यो  सब्या जणदन कि गीत,साहित्य कि सर्वव्यापी विधा छ अर गीत लोख्वूं बीच जल्दी प्रचारित-प्रसारित ह्वे जांदिन। इन्नि लोकगीत धर्तीक् उपज होंदन अर यों मा पूरो लोक समाजौ योगदान होंद। यो लोकजीवन मा जल्दी ही प्रचारित ह्वे जांदा छा अर लोकप्रिय बि। हमारा लोक कि सबसे बड़ी खासियत या छ कि-येको हृदय मयळु छ,प्राण क्वांसो छ, यखै धर्ति गीत लगौंद,गाड-गदेरा सब गीत लगौंदन एक तरौं से। लोकमानस कि पीड़ा,यकुलांस,विरह-वेदना,अभौ लोक गीत्वूं रूप मा भैर  ऐनि, उपजिन। यांका बारा मा त हमारा यख प्वथडा़ का प्वथड़ा भ्वर्यां छन,साहित्यकारोंक् बिज्यां लेख्यूं छ लोकगीत्वूं बारा मा। आज यो चिन्ता को विषय छ कि अब लोकगीत्वूं स्वरूप बि बदलेणू छ, लोकगीत
आज अपणा मूल स्वरूप मा नि छन। डाॅ राजेश्वर प्रसाद उनियाल को ब्वन छ कि-‘‘ जब लोकगीत लिखित रूप मा  सामणि औंद अर छपेंद त वेको मूल स्वरूप यानि मौखिक रूप मा थ्वड़ा भौत बदलौ ऐ जांद अर कतिबेर त वेको मूलस्वरूप ही हर्चि जांद। जब अलग-अलग लोग लोकगीत्वूं तैं इकबटोळ कर्दन अर  लिप्यांकन कर्दन त या त लोकगीत अपणा पूर्ण रूप मा नि होंद, अद्धा- अधूरो होंद अर आखरी बि नि होंद।वेको कारण यो छ कि लोकगीत्वूं तैं इकबटोळ कन्नौ टैम अलग-अलग होंद, अलग-अलग जगा होंदन अर जख बटि कै लोकगीतौ सूद-भेद लिये ग्ये वेको स्रोत क्या छ।’’ वास्तौ मा लोकगीत्वूं असली अर ज्यूंदो रूप त लोक मा  प्रवाहित   होणू रांद।
      उत्तराखण्ड का लोकसाहित्य तैं समृद्ध अर बिकसित कन्न मा यखा शिल्पकार भै-बन्धोंन् यानि औजी,धामी, जागरी,बेड़ा-बद्योंन् सबचुले ज्यादा योगदान दे। ऐक तरौं से यों तैं आशु कवि ब्वले जै सकेंद। समसामयिक विषयों पर दिल तैं घैल कन्न वळा,जिकुड़ी मा छपछपी लगौण वळा गीत्वूं कि रचना कन्न वळा सल्लि छा यो। यखै जादातर लोकोक्तियों-मुहावरों याने औखाणा-पखाणौं तैं बि यों ही लोख्वूंन बणैनी। लोक संगीत, लोकगाथा-जागर,पवाड़ा, अर लोकनृत्यों से यों को जुड़ होंदु छौ। ब्वल्ये जै सकेंद कि एक तरौं से  औजी,धामी, जागरी,बेड़ा-बद्योंक् वजौ से ही लोक साहित्य परम्पराओं मा ज्यंदी छै पण आजै समौ मा यों लोख्वूंन उपेक्षा कि वजौ से यों चीजों अर लोक वाद्यों से इक दूरी बणैयालि,यों परम्पराओं तैं छ्वडण पर लग्यां छन। या बि एक वजौ छ जां से हमारो लोक साहित्य बि हर्बि-हर्बि लोक बटि हर्चदा जाणू छ।
      जब लोक बचाणै बात होंद त लोक साहित्यक् सैंक-सम्भाल कन्नै छ्वीं-बत्थ बि होंदन। लोक साहित्य तैं बचैणा वास्ता वे तैं वाचिक परम्परा याने मौखिक परम्परा मा बि ज्यूंदो रखणो जरूरी छ,लोक मा ज्यूंदो रखणो जरूरी छ। केवल किताब्यूं ,आॅडियो-वीडियो सीडी या हौरि आधुनिक उपकरणों भितर समेटिक भौत ज्यादा  कुछ नि होण्या। सबसे पैली बात या छ कि लोकसाहित्य अर लोकसंस्कृति लोक भाषा माध्यम से ही ज्यूंदो रै सकद्।  लोक साहित्य तैं वेका वास्तविक रूप याने लोकम् अपणा मूल रूप मा ज्यूंदो रखण प्वाड़लो, तब जैकि ये कि अर परम्पराओं कि सार्थकता छ,यां से मयळदु अर संवेदनशील समाज बणलु।
लोकसाहित्य तैं सम्मान देणौ जर्वत छ अर अबारि ये तैं स्कूली पाठ्यक्रम मा बि रखणै भारी जर्वत छ ।
      जुगल किशोर पेटशाली भाषा संस्थान,देहरादून कि शोध पत्रिका ‘उद्गाथा-2011,अंक दो मा अपणा लेख- ‘उत्तराखण्ड के लोकसाहित्य की मौखिक परम्परा’ मा ठीक ही लिखदन कि-‘‘ लोकसाहित्य अर जो वेकि विधा छन वो इतगा जीवंत छन कि वो हमारा लोक मा,समाज मा चाहे वो लोक  अब पलायना वजौ से शहर-बजारों मा बसीग्ये पर साख्यूं कि जात्रा बाद बि वो ज्यंूदी छन अर वो अनन्त काल तक लोकमानस का हृदय मा अनन्त काल तक ज्यूंदी रालि।’’ वास्तौ मा कालै उथल-पुथल बि यों तैं खत्म नि कैरी सक्दि। जादातर विद्वान ईं बात से सहमत छन कि - जै टैम पर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान नि छौ,तब बि समाज छौ अर वे टैम पर वे मा केवल लोकसाहित्य ही छौ जैमा आम मनखी अफुतैं द्यख्दो छौ, अपणि सब्बि गाणि-स्याण्यूं तैं वे मा रळै देंदो छौ। आज विज्ञानौ टैम छ अर अज्यूं बि लोक साहित्य कै ना कै रूप मा ज्यूंदो छ अर जब विज्ञान ऐंच टुक्क पर होलु अर वांका बाद पत्त भुय्यां प्वड़ण वळो होलु त तब बि लोक साहित्य कखि ना कखि ज्यूंदो रालो, यो कब्बि खत्म नि ह्वे सक्दु। 

नोट -  अपणि गढ़वाळि आलेखों  पुस्तक "लोक का बाना " बटि।  (पृष्ठ 74-78)
ये आलेख का क्वी बि अंश लेखक कि अनुमति बिना 
नि लिए जै सकदा। 
                   ©संदीप रावत, न्यू डांग, श्रीनगर गढ़वाळ